बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की तरह पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से 8 महीने पहले ही टूट के आसार बने हुए हैं। पूर्व CM व जालंधर से सांसद चरणजीत चन्नी के बगावती तेवर देख कांग्रेस हाईकमान एक्टिव हो गया है। दिल्ली से एक सीनियर नेता ने चन्नी को कॉल कर अभी कोई बड़ा कदम न उठाने को कहा है।
चन्नी के करीबी सोर्स के मुताबिक नेता ने भरोसा दिलाया कि राहुल गांधी 7 जुलाई को विदेश से लौट आएंगे, उसके बाद चन्नी की उनसे मीटिंग करा दी जाएगी। दूसरी तरफ कल शुक्रवार को दिल्ली में अमित शाह से मिलकर आए गुरदासपुर सांसद सुखजिंदर रंधावा ने हाईकमान पर ही सवाल खड़े किए।
एक इंटरव्यू में रंधावा ने कहा- लीडरशिप को देखना चाहिए कि ऐसी बातें क्यों हो रही हैं। इतने पदाधिकारियों के बावजूद डैमेज कंट्रोल क्यों नहीं हो रहा। 3-4 मीटिंग के बाद भी ऐसा होना, यह किसका फेलियर है। सीनियर कांग्रेसियों को नजरअंदाज किया जाता है, इसलिए ऐसी बातें होती हैं।

वहीं पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल भी इसको लेकर हरकत में आ गए हैं। वह आज या फिर अगले कुछ ही दिनों में चंडीगढ़ पहुंचकर मौजूदा प्रधान सांसद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व CM सांसद चरणजीत चन्नी से मुलाकात कर सकते हैं।
वहीं शुक्रवार को सांसद अमरिंदर राजा वड़िंग को प्रधान बनाए रखने पर पूर्व CM चरणजीत चन्नी ने कांग्रेस हाईकमान को तीखे तेवर दिखाए। शुक्रवार को अपने घर मोरिंडा में 50 से ज्यादा नेता इकट्ठे कर हाईकमान का फैसला रिजेक्ट कर दिया।
चन्नी गुट ने कहा कि एक हफ्ते के बाद वह हाईकमान से मुलाकात करेंगे और अपना विरोध दर्ज कराएंगे। चन्नी इस वक्त ठीक उसी स्टाइल में पार्टी हाईकमान पर प्रेशर बना रहे हैं, जैसे नवजोत सिद्धू ने प्रधान रहते 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को CM की कुर्सी से हटवा दिया था। हालांकि उसके बाद सिद्धू की जगह चन्नी सीएम बन गए।
पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि चन्नी के इस स्टैप से कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी सड़क पर आ गई है। अब वह हाईकमान पर प्रेशर बनाने में कामयाब होते हैं या नहीं, लेकिन इसका खामियाजा कांग्रेस को विधानसभा चुनाव 2027 में झेलना ही पड़ेगा।
इसे देखते हुए कांग्रेस के पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल भी आज चंडीगढ़ आ सकते हैं। 3 पॉलिटिकल एक्सपर्ट से जानिए, चन्नी के फैसले से कांग्रेस को क्या फायदा और नुकसान होगा…

पॉलिटिकल एक्सपर्ट बोले- चन्नी के फैसले से बढ़ी कांग्रेस की मुश्किलें…
- चन्नी गुट का हाईकमान पर दबाव: पॉलिटिकल एक्सपर्ट व सीनियर जर्नलिस्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि चन्नी गुट ने मोरिंडा में जो मीटिंग की और उसमें हाईकमान के फैसले को सिरे से रिजेक्ट किया, उससे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई सड़क पर आ गई। हाईकमान के फैसले के खिलाफ 25 बड़े नेता और अन्य चन्नी के समर्थन में आए। कई नेता ऐसे हैं जो चन्नी के साथ हैं लेकिन हाईकमान के डर के कारण इस मीटिंग में नहीं आए। जब आर-पार की लड़ाई होगी तो वो भी सामने आ सकते हैं। चन्नी ने शक्ति प्रदर्शन करके हाईकमान पर दबाव बनाने की कोशिश की है। चरणजीत चन्नी गुट के इस शक्ति प्रदर्शन का नुकसान आखिरकार पार्टी को विधानसभा चुनाव में होना ही है।
- हाईकमान फैसला बदलेगा तो दूसरा गुट होगा नाराज: सीनियर जर्नलिस्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि चरणजीत सिंह चन्नी के दबाव में आकर कांग्रेस हाईकमान इस फैसले को बदल देता है तो कांग्रेस का दूसरा गुट यानि राजा वड़िंग गुट नाराज हो जाएगा। राजा वडिंग इस समय प्रधान हैं तो उनके साथ भी काफी नेता हैं। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान को गुटबाजी संकट से बाहर निकलना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
- चन्नी गुट कर सकता है कांग्रेस को गुडबाय: सीनियर जर्नलिस्ट बातिश का कहना है कि चन्नी गुट की बात अगर हाईकमान ने नहीं मानी तो उनके सामने दो विकल्प रह जाएंगे। पहला यह कि वो चुपचाप बैठकर कांग्रेस में बने रहें। दूसरा कि वो पार्टी छोड़कर किसी अन्य दल में शामिल हो जाएंगे या फिर पूरा गुट एक नई पार्टी खड़ी करेगा।

- सिद्धू की राह पर चले चरणजीत सिंह चन्नी: पॉलिटिकल एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा का कहना है कि चरणजीत सिंह चन्नी बिल्कुल उसी पैटर्न पर आ गए हैं जिस पैटर्न पर 2022 विधानसभा चुनाव से पहले सिद्धू काम कर रहे थे। तब सिद्धू प्रधान थे और वो कैप्टन को हटाकर मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। कैप्टन को हटाने के लिए सिद्धू ने कांग्रेस के कई नेताओं को एकजुट किया और कैप्टन को हटा दिया। लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो हाईकमान ने उन्हें किनारे करके चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया। तब सिद्धू ने हाईकमान के फैसले पर विरोध जताया और रिजाइन दे दिया। हाईकमान के मनाने पर सिद्धू ने इस्तीफा वापस लिया। कांग्रेस को तब लगा कि सब कुछ ठीक हो गया लेकिन चुनाव प्रचार शुरू होते ही नवजोत सिंह सिद्धू ने चरणजीत चन्नी के फैसलों पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। उसी तर्ज पर अब चरणजीत सिंह चन्नी राजा वडिंग के प्रधान बनाए रखने का विरोध कर रहे हैं। हाईकमान अब इनकी बात मान भी लेगी तो कांग्रेस में 2022 की तर्ज पर गुटबाजी और बढ़ेगी।
- चन्नी की पावर सेंटर बनने की गेम: पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्यारे लाल गर्ग का कहना है कि राजनीति में इस समय नेता पावर के पीछे भाग रहे हैं। उन्होंने कहा कि चरणजीत सिंह चन्नी ने जो शक्ति प्रदर्शन किया है उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद था कि वो पंजाब कांग्रेस में पावर सेंटर बनें। उनसे पूछकर टिक

चरणजीत चन्नी की दावेदारी के तीन मजबूत पक्ष…
- पंजाब का दलित वोट बैंक: सीनियर जर्नलिस्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि चरणजीत चन्नी के पक्ष में सबसे बड़ा फैक्टर यह है कि पंजाब में करीब 31 प्रतिशत दलित वोट बैंक है, जो किसी भी चुनाव का रुख बदल सकता है। चन्नी राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और इस पूरे वर्ग के सबसे बड़े सियासी चेहरे हैं। ऐसे में कांग्रेस हाईकमान उन्हें नाराज करने का जोखिम लेने से कतराएगी।
- ‘आम आदमी’ की छवि: एक्सपर्ट का कहना है कि चन्नी को भले ही 111 दिनों का छोटा कार्यकाल मिला, लेकिन उन्होंने बिजली-पानी बिल माफी जैसे फसलों से जनता के दिलों में जगह बनाई। वे अपनी सादगी और ‘मिडिल क्लास सीएम’ की छवि के कारण माझा, मालवा और दोआबा के तीनों क्षेत्रों में समान रूप से लोकप्रिय हैं। पार्टी के भीतर वे एकमात्र ऐसे नेता हैं जो पूरे राज्य में वोट खींचने और रैलियों में भीड़ जुटाने का दम रखते हैं।
- नेताओं का मजबूत गुट: एक्सपर्ट पवनदीप शर्मा राजा वड़िंग के खिलाफ इस समय पंजाब कांग्रेस का एक बहुत बड़ा धड़ा चन्नी के पीछे लामबंद हो चुका है। मोरिंडा में ओपी सोनी, भारत भूषण आशू और तृप्त बाजवा जैसे कई पूर्व मंत्रियों और दिग्गजों ने चन्नी के घर जाकर उनके नेतृत्व पर मुहर लगाई है।

- चन्नी को जट्ट सिख नेताओं का भी समर्थन: चरणजीत सिंह चन्नी गुट में दलित नेताओं के अलावा बड़े जट्ट सिख व हिंदू नेता भी शामिल हैं। राणा गुरजीत, तृप्त रजिंदर बाजवा जैसे दिग्गज जट्ट सिख नेता उनके साथ हैं वहीं भारत भूषण आशु, ओपी सोनी जैसे हिंदू नेता भी उनके गुट में शामिल हैं।
राहुल गांधी की धमकी भी बेअसर राहुल गांधी की धमकी भी पंजाब कांग्रेस के नेताओं पर बेसर रही। लुधियाना के रायकोट में रैली के दौरान राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं को साफ कह दिया था कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं है। जिसे यह अहंकार है तो वह अपने बारे में सोच ले। राहुल गांधी की सख्त टिप्पणी के बाद भी पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी खत्म नहीं हुई।
दिल्ली में नेतृत्व परिवर्तन की मीटिंग होने के बाद एक दिन चंडीगढ़ में चरणजीत सिंह चन्नी, राजा वडिंग व सुखजिंदर सिंह रंधावा एक मंच पर दिखे। तब कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी हाईकमान ने दिल्ली में सब कुछ ठीक कर दिया। लेकिन जैसे ही लिस्टें निकली पंजाब कांग्रेस में असंतोष जगजाहिर हो गया।