“मोर संगी मोर तंबूरा, महाभारत के कथा गावत हंव… सुनव भईया…” कौशल किशोर चतुर्वेदी

“मोर संगी मोर तंबूरा, महाभारत के कथा गावत हंव… सुनव भईया…”
छत्तीसगढ़ की पंडवानी संस्कृति को लोक तक ले जाने वाली आवाज 5 जुलाई 2026 को विराट मौन में लीन हो गई है। एक ऐसा किरदार जिसका जन्म ही पंडवानी लोक संस्कृति को पूरी दुनिया में नई पहचान दिलाने के लिए हुआ था। गनियारी गाँव में तीज के दिन जन्म होने के कारण नाम तीजन पड़ गया। जब बच्चों की खेलने कूदने की उम्र होती है, तब गरीब परिवार की तीजन ने 13 साल की उम्र में नाना से पंडवानी गायन सीखना शुरू कर दिया। और पंडवानी में भी पुरुषों की विरासत मानी जाने वाली शैली में गायन की नई इबारत लिखना शुरू कर दी। और विरोध करने वालों की कभी कोई परवाह नहीं की। समझौता जैसा शब्द शायद तीजन के शब्दकोष में ही नहीं था। मंच पर पंडवानी की प्रस्तुति करते समय पति ने अपमान किया तो पति को ही छोड़ा लेकिन पंडवानी का सम्मान बरकरार रखा। प्रस्तुति की ऐसी शैली, जिससे पूरी दुनिया ही तीजन की कायल हो गई। गरीब परिवार में जन्मी तीजन ने पद्म विभूषण सम्मान पाने तक की अपनी यात्रा पंडवानी गायन के प्रति समर्पण की कठोरतम यात्रा के साथ उतनी ही सहजता, सरलता और विनम्रता से जारी रखी, जितनी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। दुनिया की कोई भी ताकत तीजन को तोड़ नहीं पाई, लेकिन दो बेटों के असमय काल के गाल में समाने से एक मां पूरी तरह से टूटकर चकनाचूर हो गई। और पंडवानी में महाभारत युद्ध का वर्णन वीर रस के साथ ओजपूर्ण तरीके से सुनाकर सबका दिल जीतने वाली तीजन अंततः लंबी बीमारी के साथ शांत रस के महासागर में समा गई। महाभारत युद्ध का कापालिक शैली में वर्णन करते हुए तीजन का तंबूरा सारे किरदार निभाने में सक्षम था। डॉ. तीजन बाई के पंडवानी गायन का जादू उनके तंबूरे की थाप, उनके चेहरे के बदलते भावों और छत्तीसगढ़ी बोली के अनूठे संवादों में बसता था। तीजन मंच पर यह कहकर तंबूरे का मान बढ़ाने से नहीं चूकती थीं कि “मोर संगी मोर तंबूरा, महाभारत के कथा गावत हंव… सुनव भईया…।” पर अब तीजन के मुंह से यह कभी नहीं सुना जा सकेगा। और शायद ही तंबूरा इतने किरदार एक साथ निभाने में सफल हो सके। आइए हम तीजन की कुछ बात करते हैं और तीजन से कुछ बात करते हैं।
पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई की कला कोई लिखित पटकथा या बंधे-बंधाए ‘डायलॉग्स’ पर आधारित नहीं होती थी। छत्तीसगढ़ी पंडवानी (महाभारत की कथाओं) का गायन करते समय, वे ‘कापालिक शैली’ में गाते-गाते अचानक विभिन्न किरदारों (जैसे भीम, दुर्योधन या द्रौपदी) में ढल जाती थीं और उस पल के भावों के अनुसार मौखिक संवाद (डायलॉग्स) रचती थीं। उनके प्रसिद्ध प्रसंगों (जैसे ‘दुशासन वध’, ‘किचक वध’, या ‘गीता उपदेश’) में उनके द्वारा बोले जाने वाले कुछ सबसे लोकप्रिय संवाद और बोल पर एक नजर डालते हैं। दुशासन वध (महाभारत युद्ध के दौरान) जब वे भीम का अभिनय करती थीं, तो उनकी दहाड़ और संवाद बेहद प्रभावशाली होते थे। युद्ध के मैदान में कौरवों को चुनौती देते हुए उनका संवाद कुछ इस प्रकार होता था:
“आज तो मैं दुशासन के सीने का खून पीकर ही शांत होऊंगा। छोड़ूंगा नहीं, आज कौरवों का नाश निश्चित है!”
तो गीता उपदेश (श्री कृष्ण और अर्जुन संवाद) के समय जब वे अर्जुन की असमंजस की स्थिति और भगवान कृष्ण के उपदेश का वर्णन करती थीं, तो वे अपनी आवाज में भारी और शांत भाव लाती थीं: “पार्थ, उठो! ये युद्ध तुम्हारा धर्म है। कर्म करो, फल की चिंता मत करो।”
वहीं मंच पर तंबूरे को ढाल या गदा बनाकर बजाते हुए, वे अपने गायन के बीच अक्सर यह गीत गाती थीं जो उनकी पहचान बन गया।
“मोर संगी मोर तंबूरा, महाभारत के कथा गावत हंव… सुनव भईया!”
और जब लोग महिलाओं के पंडवानी गाने (विशेषकर खड़े होकर कापालिक शैली में करने) का विरोध करते थे, तो वे अपने तंबूरे की झंकार के साथ जवाब देती थीं: “अगर पुरुष गा सकते हैं, तो नारी क्यों नहीं? महाभारत किसी एक की जागीर नहीं है।”
तीजनबाई (जन्म- 24 अप्रैल 1956) भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के पंडवानी लोक गीत-नाट्य की पहली महिला कलाकार हैं। देश-विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन करने वाली तीजनबाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी लिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है। वे सन 1988 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री और 2003 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से अलंकृत की गयीं। उन्हें 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा 2007 में नृत्य शिरोमणि से भी सम्मानित किया जा चुका है। 2019 में तीजन बाई को पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।
भिलाई के गाँव गनियारी में जन्मी तीजनबाई के पिता का नाम हुनुकलाल परधा और माता का नाम सुखवती था। नन्हीं तीजन अपने नाना ब्रजलाल को महाभारत की कहानियाँ गाते सुनाते देखतीं और धीरे धीरे उन्हें ये कहानियाँ याद होने लगीं। उनकी अद्भुत लगन और प्रतिभा को देखकर उमेद सिंह देशमुख ने उन्हें अनौपचारिक प्रशिक्षण भी दिया। 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला मंच प्रदर्शन किया। उस समय में महिला पंडवानी गायिकाएँ केवल बैठकर गा सकती थीं जिसे वेदमती शैली कहा जाता है। पुरुष खड़े होकर कापालिक शैली में गाते थे। तीजनबाई पहली महिला थीं जिन्होंने कापालिक शैली में पंडवानी का प्रदर्शन किया। एक दिन ऐसा भी आया जब प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना और तबसे तीजनबाई का जीवन बदल गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से लेकर अनेक अतिविशिष्ट लोगों के सामने देश-विदेश में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। प्रदेश और देश की सरकारी व गैरसरकारी अनेक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत तीजनबाई मंच पर सम्मोहित कर देने वाले अद्भुत नृत्य नाट्य का प्रदर्शन करती थीं। ज्यों ही प्रदर्शन आरंभ होता था, उनका रंगीन फुँदनों वाला तंबूरा अभिव्यक्ति के अलग अलग रूप ले लेता था। कभी दुःशासन की बाँह, कभी अर्जुन का रथ, कभी भीम की गदा तो कभी द्रौपदी के बाल में बदलकर यह तंबूरा श्रोताओं को इतिहास के उस समय में पहुँचा देता था, जहाँ वे तीजन के साथ-साथ जोश, होश, क्रोध, दर्द, उत्साह, उमंग और छल-कपट की ऐतिहासिक संवेदना को महसूस करते थे। उनकी ठोस लोकनाट्य वाली आवाज़ और अभिनय, नृत्य और संवाद उनकी कला के विशेष अंग थे।
इसी गायिका से प्रभावित होकर देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था, “आप बहुत अच्छा महाभारत करती हैं।” यह सुनकर तीजन ने तपाक से जवाब दिया, “महाभारत नहीं करती हूँ, महाभारत की कथा सुनाती हूँ।” तीजन बाई छत्तीसगढ़ की पहली महिला कलाकार थीं जिन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
तीजन बाई ने पंडवानी का पहला सार्वजनिक मंचन चंदखुरी गांव के सतीचौरा चौक पर किया था। तब उनकी उम्र मात्र तेरह वर्ष थी। इस कार्यक्रम का आयोजन चंदखुरी गांव के मालगुज़ार और कला का समर्थन करने वाले भूषण लाल देशमुख ने किया था, जिन्हें तीजन बाई स्नेह से ‘दाऊ’ कहा करती थीं। तीजन बाई को वाद्ययंत्रों के साथ पंडवानी गायन का हुनर उमेद सिंह देशमुख ने सिखलाया. तीजन बाई उन्हें सदैव गुरु का सम्मान देती रहीं। वह उन्हें प्रेम से ‘ दद्दा’ कहा करती थीं।चंदखुरी गांव में पंडवानी की कथा के कार्यक्रम से आसपास के गांवों में उनकी पहचान बनी। उन्हें सबसे पहले शहर जाकर गाने का आमंत्रण भिलाई में एक कार्यक्रम के लिए मिला। फिर धीरे-धीरे भोपाल, दुर्ग, रायपुर आदि शहरों में उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। इसी दौरान उन्हें भोपाल के भारत भवन से पंडवानी गाने का न्यौता मिला। यहां उनकी मुलाक़ात हबीब तनवीर से हुई। पंडवानी गायन के दौरान हबीब तनवीर तीजन बाई के अभिनय, गायन और गर्जन को देखकर काफ़ी प्रभावित हुए और देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने उन्हें पंडवानी गाने का मौक़ा दिलवाया। जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपने धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के लिए आमंत्रित किया। इस तरह तीजन बाई की कला घर-घर तक पहुंची। तीजन बाई की प्रतिभा को देखते हुए भिलाई स्टील प्लांट ने उन्हें साल 1986 में नौकरी दी।
वास्तव में तीजन, पंडवानी गायन का पर्याय बन चुकी हैं। और यह भी तय है कि जब भी कोई पंडवानी गायन का साक्षी बनेगा, तब उसे निश्चित तौर पर तीजन याद आएंगी। कुछ कलाकार ‘भूतो न भविष्यति’ के रूप में आते हैं और उनमें से एक तीजन बाई भी हैं। तीजन बाई को कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं

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