कैडर बेस्ड पार्टी का करिश्मा… दिग्गजों को कार्यकर्ता बनाने का सफल प्रयोग जारी… कौशल किशोर चतुर्वेदी

कैडर बेस्ड पार्टी का करिश्मा… दिग्गजों को कार्यकर्ता बनाने का सफल प्रयोग जारी…
भारतीय जनता पार्टी को ऐसे ही कैडर बेस्ड पार्टी नहीं कहा जाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय शुरू हुआ कैडर बेस्ड पार्टी का करिश्मा लगातार जारी है। भारतीय जनता पार्टी को सतह से शिखर तक ले जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज कब बड़े नेता से कार्यकर्ता बन गए, कोई समझ नहीं पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कैडर बेस्ड पार्टी की व्याख्या करते हुए कहा था कि भाजपा में कार्यकर्ता ही जनता का फीडबैक सरकार तक पहुंचाता है और सरकार उसी के अनुरूप योजनाएं बनाती है। तो कार्यकर्ता ही सत्ता और संगठन के बीच में समन्वय बनाने का काम करता है। यानी कार्यकर्ता ही भाजपा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। और इसीलिए भाजपा में अब बड़े-बड़े दिग्गज, दबंग और खुद को पार्टी के लिए विशेष मानने वाले नेताओं को कार्यकर्ता बनाने का सफल प्रयोग लगातार जारी है। मध्य प्रदेश में, हालांकि पहले भी मार्गदर्शक मंडल में जाने वाले नेताओं की बड़ी सूची है। लेकिन उनका विशेष ख्याल भी पार्टी ने हमेशा किया है। पर अब नव मार्गदर्शक मंडल के साथ यह स्थिति भी लागू नहीं होती है। 2023 में मध्य प्रदेश में एक साधारण कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री बनाने का एक प्रयोग भाजपा ने किया था। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी ऐसा ही देखने को मिला था। और हाल ही में रजनीश अग्रवाल और महेश केवट जैसे सामान्य कार्यकर्ताओं को राज्यसभा भेजकर भाजपा ने कैडर बेस्ड पार्टी होने को सार्थक किया था। और इसी की विपरीत धारा के रूप में दिग्गजों को कार्यकर्ता बनाने का प्रयोग पार्टी कर रही है। इसी कड़ी में नरोत्तम मिश्रा का नाम जुड़ गया है। और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने यह साफ कर दिया है कि नरोत्तम मिश्रा के मार्गदर्शन में ही भाजपा दतिया में अपने प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को भारी बहुमत से जीत दिलाएगी। यानि मार्गदर्शक मंडल में जबरदस्ती भेजकर भी पार्टी नरोत्तम मिश्रा को चैन से रहने का कोई अवसर नहीं दे रही है। अब नरोत्तम के दिल पर क्या गुजर रही है, यह तो वही महसूस कर सकते हैं। 2023 विधानसभा चुनाव में हार के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि सागर को उतरता देख किनारे पर घर मत बना लेना, मैं लौटकर आऊंगा यह मेरा वादा है। और अब उपचुनाव में टिकट कटने के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा को कहना पड़ रहा है कि सभी लोग किनारे पर घर बनाएं। यानि मोदी-शाह के नेतृत्व में कैडर बेस्ड पार्टी कितने सख्त अनुशासन के साथ आगे बढ़ रही है, यह महसूस किया जा सकता है। भाजपा के हर नेता को यह गांठ बांधकर चलना पड़ेगा कि वह सिर्फ कार्यकर्ता भाव में जिए। खुद को कार्यकर्ता से ज्यादा कुछ समझने की भूल कभी न करें।
वैसे डॉ. नरोत्तम मिश्रा के मामले में बहुत कुछ समझने की जरूरत भी है। शायद पार्टी यह समझने की कोशिश कर रही थी कि बिना टिकट की घोषणा के डॉ. मिश्रा ने किस अधिकार से दतिया में चुनाव प्रचार की शुरुआत कर दी थी। और नामांकन पत्र तक लेने का कदम आख़िर किसकी सहमति से उठाया था। 2023 के बाद के कार्यकाल में और यूं कहा जाए कि ‘मोहन युग’ में कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल जैसे दिग्गज नेताओं का हाल किसी से छिपा नहीं है। फिर नरोत्तम ने आखिर कुछ समझने की जरूरत क्यों नहीं समझी? नरोत्तम के मामले में सर्वे को खाली ढाल बनाया गया है। 2013 के विधानसभा चुनाव में भी सर्वे को आधार बनाया जाता तो डॉ. नरोत्तम मिश्रा को दतिया से टिकट देने से पार्टी इंकार कर देती। और सीट परिवर्तन के लिए दबाव बनाती। राजधानी में एक प्रमुख दैनिक अखबार के राजनैतिक संवाददाता होने के नाते मैंने दिग्गज नेताओं पर आधारित एक स्टोरी छापी थी जिसमें नरोत्तम मिश्रा की दतिया सीट भी शामिल थी। लेकिन सीट नहीं बदली गई थी और डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने जीत दर्ज कर अपना कद और सत्ता संगठन में अपना रुतबा बढ़ाया था। 2018 में भी उन्होंने दतिया सीट पर जीत दर्ज कर खुद की स्थिति और भी ज्यादा मजबूत की थी। 2020 में कांग्रेस सरकार गिराने में प्रमुख किरदार निभाने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री के दावेदार बन गए थे। और यहीं से सत्ता की नजर में वह खटक रहे थे। 2023 विधानसभा चुनाव में उनकी हार को भी इससे जोड़कर देखा गया था। खैर, डॉ नरोत्तम मिश्रा की कार्यशैली को लेकर भी लगातार सवालिया निशान उठाए जाते रहे, लेकिन बिना किसी की परवाह किए
उनकी सफल राजनैतिक यात्रा जारी थी। लेकिन 2023 के बाद भाजपा सरकार और संगठन ने पूरी तरह से उनसे किनारा कर लिया था। लोकसभा चुनाव 2024 में उनकी दावेदारी को सिरे से खारिज किया गया। प्रदेश अध्यक्ष के लिए भी डॉ नरोत्तम मिश्रा का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा था। राज्यसभा के लिए भी डॉ. नरोत्तम मिश्रा की दावेदारी मानी जा रही थी। लेकिन उनके हाथ लगातार खाली रहे और इस बीच जब उपचुनाव का बिगुल बज गया तो अपनी कार्यशैली के मुताबिक ही दतिया में चुनाव प्रचार की शुरुआत उन्होंने कर दी थी। शायद यही उनकी सबसे बड़ी भूल बन गई। और पार्टी ने से अनुशासनहीनता मानते हुए टिकट की उम्मीद लगाए आशुतोष तिवारी को मैदान में उतार दिया।
डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद दतिया में उनके समर्थकों के आक्रोश को भाजपा संगठन ने फिलहाल बड़ी सहजता और उदार भाव से ही लिया है। एक दिन बाद ही मिश्रा को भोपाल तलब कर लिया गया और उन्होंने फरमान के मुताबिक ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक हेमंत खंडेलवाल एवं क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल से मुख्यमंत्री निवास में सौजन्य भेंट की।
बैठक में दतिया विधानसभा उपचुनाव की तैयारियों एवं संगठनात्मक विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। इस अवसर पर यह तय हुआ कि पार्टी सर्वोपरि है और सभी कार्यकर्ता संगठन के निर्णय के साथ पूर्ण प्रतिबद्धता से खड़े हैं। दतिया उपचुनाव के संबंध में कुछ कार्यकर्ताओं ने भावावेश में इस्तीफे दिए थे वो प्राप्त नहीं हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी संगठन ने तय किया है कि किसी भी कार्यकर्ता का इस्तीफा स्वीकार नहीं होगा। सभी कार्यकर्ता पूर्ण एकजुटता, उत्साह और समर्पण के साथ पार्टी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को प्रचंड मतों से विजयी बनाने के लिए पूरी ताकत से चुनाव प्रचार में जुटे। भाजपा दतिया उपचुनाव में डॉ. नरोत्तम मिश्रा के मार्गदर्शन में रिकॉर्ड मतों से विजय दर्ज करेगी। सीएम हाउस के इस दृश्य की कल्पना की जा सकती है और यह अनुमान किया जा सकता है कि एक दिग्गज नेता को कार्यकर्ता भाव महसूस कराने का भाजपा के प्रयोग से गुजरने वाले नेता पर आखिर क्या बीतती होगी।
खैर कैडर बेस्ड पार्टी भाजपा में संगठन सर्वोपरि है, यह संदेश साफ है। हो सकता है भाजपा केंद्रीय संगठन में स्थान देकर डॉ. नरोत्तम मिश्रा को जीवनदान देने का मन बना ले। पर यह तय है कि कैडर बेस्ड पार्टी के इस करिश्मे के दौर से गुजरने वाले मध्यप्रदेश के नेताओं की भी एक लंबी सूची है जो समय-समय पर सामने दिखती रहेगी। भाजपा में दिग्गजों को कार्यकर्ता बनाने का सफल प्रयोग जारी है और रहेगा, इसमें कहीं कोई भ्रम नहीं है…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं