सरदार सरोवर डैम की वजह से मध्य प्रदेश की करीब 21 हजार हेक्टेयर जमीन पानी में समा गई। 192 गांव उजड़ गए। राज्य सरकार ने गुजरात से 7,669 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा। 30 साल से अटके मामले पर 7 जुलाई को दिल्ली में समाधान हुआ है। मध्य प्रदेश को मुआवजा मिलना तो दूर, उल्टा 231.80 करोड़ रुपए चुकाने पड़ रहे हैं।
सवाल 1: सरदार सरोवर डैम का ‘वन टाइम सेटलमेंट’ क्या है?
जवाब:नर्मदा नदी मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलकर महाराष्ट्र की सीमा छूते हुए गुजरात के भरूच (अरब सागर) तक जाती है। 1961 में तत्कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने गुजरात के नवागाम में ‘सरदार सरोवर डैम’ की नींव रखी थी।शुरुआती दशकों में दोनों राज्यों के बीच विवाद सिर्फ ‘पानी के बंटवारे’ का था। इसे सुलझाने के लिए ‘नर्मदा वॉटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल’ (NWDT) बना।10 साल की बहस के बाद 1979 में पानी का विवाद तो सुलझ गया,
लेकिन 90 के दशक में एंट्री हुई ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की।1995 में विस्थापन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने डैम के काम पर रोक लगा दी। कई सालों तक काम रुका रहा, जिससे प्रोजेक्ट की लागत कई गुना बढ़ गई। इसी बढ़ी हुई लागत और डूब क्षेत्र के मुआवजे को लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच तनाव हो गया।

शुरुआत में जब डैम की ऊंचाई 90 मीटर तय थी, तब मध्य प्रदेश ने गुजरात से मुआवजे के सिर्फ 281 करोड़ रुपए मांगे थे। लेकिन 2014 में जब डैम की ऊंचाई बढ़ाकर 138.68 मीटर कर दी गई, तो डैम के बैकवाटर (पीछे लौटे पानी) से एमपी के 192 गांव और करीब 20,822 हेक्टेयर जमीन हमेशा के लिए डूब गई।डूब क्षेत्र बहुत ज्यादा बढ़ने पर एमपी ने ‘नए भूमि अधिग्रहण कानून’ के तहत नया बिल बनाया और गुजरात से मुआवजे के 7,669 करोड़ रुपए मांगे। लेकिन गुजरात पुराने 281 करोड़ देने पर ही अड़ा रहा।
उल्टा गुजरात ने शर्त रख दी कि डैम बनाने में उसका जो खर्च हुआ है, उसके बदले एमपी पहले अपनी पुरानी देनदारी चुकाए। इसी हिसाब-किताब पर फाइल 30 साल तक अटकी रही।आखिरकार मंगलवार को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों (एमपी, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान) के बीच एकमुश्त समझौता हुआ। तय हुआ कि 30 साल पुरानी इस फाइल को हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए।’वन-टाइम सेटलमेंट’ के तौर पर एमपी ने अपना 7,669 करोड़ का भारी-भरकम दावा छोड़ दिया है और बदले में वह गुजरात को 1500 करोड़ की पुरानी देनदारी की बजाय सिर्फ 231.80 करोड़ रुपए देगा।
सवाल 2: एमपी की ज्यादा जमीन डूबी, फिर वही ₹232 करोड़ का मुआवजा क्यों देगा?
जवाब: इसके पीछे गणित है…’नर्मदा वॉटर डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल’ (1979) का नियम है कि डैम भले ही गुजरात में बना हो, लेकिन जो राज्य इसका पानी या बिजली लेगा, उसे निर्माण का खर्च भी उठाना होगा।फरवरी महीने में अटॉर्नी जनरल ने सुझाव दिया था
कि सरदार सरोवर के विस्थापितों के पुनर्वास पर जो खर्च हुआ है, उसमें मध्य प्रदेश को 31.98% हिस्सा उठाना चाहिए। इस फॉर्मूले के हिसाब से मध्य प्रदेश पर गुजरात की 1500 करोड़ रुपए की देनदारी बन रही थी।दिल्ली समझौते में केंद्र ने एमपी की हिस्सेदारी को 31.98% से घटाकर सीधा 16.17% कर दिया। इससे एमपी को अब 1500 करोड़ की जगह सिर्फ 231.80 करोड़ रुपए ही देने होंगे।

सवाल 3: क्या मोहन सरकार ने घाटे का सौदा कर लिया?
जवाब: कांग्रेस इसे एमपी का बड़ा नुकसान बता रही है। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी और प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने सीएम को ‘सरेंडर और कॉम्प्रोमाइज्ड सीएम’ कहा है।गुरुवार को पटवारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, ‘मुख्यमंत्री जी, आप राजा हरिश्चंद्र नहीं हैं कि जो कह देंगे, जनता सच मान लेगी।’नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी सवाल किया कि ‘अब एमपी की जमीन, आदिवासियों और किसानों के अधिकारों की कीमत कौन देगा?’।
कांग्रेस ने 7669 करोड़ का दावा छोड़ने पर श्वेत पत्र की मांग की है।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसे मध्य प्रदेश की बड़ी जीत’ बताया है।आर्थिक जानकारों के मुताबिक, यह घाटे का सौदा नहीं, व्यावहारिक फैसला है। गुजरात किसी भी कीमत पर 7669 करोड़ रुपए देने को तैयार नहीं था। ऐसे में एमपी ने अपनी 1500 करोड़ की देनदारी को सिर्फ 231.80 करोड़ में निपटाकर खजाने के 1268 करोड़ रुपए की सीधी बचत कर ली है।

सवाल 4: आखिर इस सेटलमेंट से एमपी को हासिल क्या हुआ?
जवाब: डैम गुजरात के आंगन में है, लेकिन उसकी चाबी मध्य प्रदेश के पास है…सरदार सरोवर डैम से जितनी भी हाइड्रो पावर (बिजली) बनती है, उसका 57% हिस्सा सीधे एमपी को मिलता है (महाराष्ट्र को 27% और गुजरात को सिर्फ 16%)।नर्मदा नदी के कुल पानी (28 MAF) में से सबसे ज्यादा 18.25 MAF पानी एमपी के हिस्से में आता है,
जबकि गुजरात को सिर्फ 9 MAF मिलता है।डैम से मिलने वाली यह बिजली बहुत सस्ती होती है। अब तक एमपी को 3900 करोड़ यूनिट बिजली मिल चुकी है, वह भी मात्र 85 पैसे प्रति यूनिट की दर से।सीएम मोहन यादव ने बताया कि प्रदेश की 31 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी मिल रहा है और इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, देवास, धार व कटनी जैसे बड़े शहरों की पेयजल सप्लाई हो रही है।
सवाल 5: अब उन विस्थापितों का क्या होगा, जिनके मुआवजे का पैसा डूब गया?
जवाब: तकनीकी तौर पर विस्थापितों का पैसा डूबा नहीं है।विस्थापितों को मुआवजा देने की पूरी जिम्मेदारी मध्य प्रदेश सरकार के कंधों पर आ गई है। चूंकि गुजरात से 7669 करोड़ रुपए नहीं आ रहे हैं, इसलिए यह पैसा अब राज्य सरकार को अपने खजाने से देना होगा।नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेत्री मेधा से कहा
