क्या नरोत्तम के आंसू भाजपा की हार की वजह बनेंगे? टिकट कटने के बाद बगावत, सहानुभूति और डैमेज कंट्रोल के बीच दतिया का बदला चुनावी समीकरण

15 साल दतिया के विधायक रहे नरोत्तम मिश्रा टिकट कटने के बाद मंच पर भावुक नजर आए। इसके बाद गुरुवार को आशुतोष तिवारी की मौजूदगी में अपने कार्यकर्ताओं से कहा- लोग कहने लगे हैं कि आशुतोष ने टिकट काट दिया। उसकी क्षमता है टिकट काटने की? टिकट काटने वाले कोई और हैं।

जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह ने प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और राष्ट्रीय अध्यक्ष को सामूहिक इस्तीफा भेज दिया। इसमें जिला पंचायत अध्यक्ष, जनपद अध्यक्ष, नगर पालिका और नगर परिषद के पदाधिकारियों के नाम भी शामिल थे। समर्थकों ने ग्वालियर-झांसी हाईवे पर करीब 8 किलोमीटर लंबा जाम लगा दिया था। यानी सिर्फ कार्यकर्ता नहीं, संगठन का पूरा स्थानीय ढांचा एक साथ बगावत पर उतर आया।

  • यह इसलिए हुआ, क्योंकि दतिया में पिछले 15 सालों से भाजपा का मतलब ही नरोत्तम मिश्रा रहे हैं। यहां चुनावी सेटअप कैडर बेस नहीं, बल्कि लीडर बेस है- यानी वोट पार्टी के नाम पर नहीं, नेता के निजी नेटवर्क के दम पर आता है।
  • राजनीतिक विश्लेषक देव श्रीमाली बताते हैं कि जो प्रबंधन एक नेता 15 साल में खुद के लिए खड़ा करता है, वह रातोंरात किसी और के लिए ट्रांसफर नहीं हो सकता। ऐसे में अगर यह टीम मैदान से हट जाए, तो चुनाव के दिन बूथ पर बैठने वाले एजेंट जुटाना ही आशुतोष के लिए चुनौती बन सकता है।

भाजपा इस जोखिम से अनजान नहीं है। इस्तीफों और नाराजगी के बीच ही पार्टी ने डैमेज-कंट्रोल की माइक्रो-प्लानिंग शुरू कर दी थी। इसमें जातिगत मोर्चाबंदी से लेकर संघ (RSS) का बूथ मैनेजमेंट तक शामिल है।

टिकट कटने के बाद नरोत्तम के समर्थकों ने ग्वालियर-झांसी हाईवे पर करीब 8 किलोमीटर लंबा जाम लगा दिया था।

सवाल 2: तो क्या नरोत्तम के आंसू भाजपा की हार का कारण बन सकते हैं?

जवाबः सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन ऐसा होने की 4 वजहें नजर आ रही हैं…

1. ‘जिसने रुलाया, उसे रोने लायक बना देंगे’: मंच पर नरोत्तम का गला भर आना महज एक भावुक पल नहीं था। स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार रवि भदौरिया बताते हैं कि इसके बाद समर्थकों के बीच चर्चा चली कि ‘जिसने नरोत्तम को रुलाया, उसे रोने लायक बना देंगे।’ यह गुस्सा कांग्रेस के खिलाफ नहीं, बल्कि पार्टी और नए प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के खिलाफ है।

2. नरोत्तम के समर्थक, आशुतोष के नहीं हो सकते: दतिया बुंदेलखंड का वह हिस्सा है, जहां राजनीति पार्टी लाइन पर कम, गांव की चौपालों पर ज्यादा चलती है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण दीक्षित यहां की आल्हा संस्कृति की एक कहावत का हवाला देते हैं- ‘जाको बैरी सुखते सोवे, वाके जीवे को धिक्कार’ यानी जिसका दुश्मन आराम में है, उसकी जिंदगी बेकार है। पंद्रह साल से गांव-गांव विरोधियों से लड़ते आए कार्यकर्ता के लिए एक फरमान पर यह लड़ाई को छोड़ना आसान नहीं होगा।

3. कांग्रेस के पक्ष में वोट-शिफ्टिंग: कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह की छवि दतिया में बेदाग मानी जाती है, और नरोत्तम समर्थकों से उनकी कोई पुरानी दुश्मनी भी नहीं है। 2013 और 2018 के चुनावों में दोनों खेमों के बीच एक अंदरूनी तालमेल भी रहा था, जिसमें नरोत्तम ने सेवढ़ा सीट पर मदद का भरोसा दिया था और बदले में घनश्याम सिंह ने दतिया में साथ दिया था। इस पुराने तालमेल की वजह से गुस्साए समर्थकों का वोटबैंक अब रिवेंज वोटिंग के जरिए कांग्रेस की तरफ मुड़ सकता है। अगर नरोत्तम का महज 10-15% नाराज वोट भी घनश्याम सिंह की तरफ शिफ्ट हुआ, तो भाजपा की हार का मार्जिन बढ़ सकता है।

4. लोगों में नरोत्तम के प्रति सहानुभूति डेवलप हुई: एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालिया घटनाक्रम ने जो सिंपैथी वेव यानी सहानुभूति की लहर बनाई है, वह टिकट कटने से पहले मौजूद नहीं थी। तब नरोत्तम के हारने की भी आशंका जताई जा रही थी। यानी आंसुओं ने अकेले ही दतिया के चुनाव को भाजपा बनाम कांग्रेस से बदलकर नरोत्तम के वफादार बनाम भाजपा बना दिया है।

नामांकन के आखिरी दिन आशुतोष तिवारी के लिए वोट मांगते समय नरोत्तम की आंखों में आंसू आ गए।

सवाल 3: क्या नरोत्तम पर आशुतोष को जिताने का दबाव है?

जवाबः इसके तीन संकेत दिख रहे हैं…

1. 9 घंटे का हाईवे जाम और उसका नतीजा: टिकट कटते ही नरोत्तम समर्थकों ने दतिया हाईवे 9 घंटे जाम रखा और पुलिस की गाड़ियों में तोड़फोड़ की। यह घटना दिल्ली तक सीधी अनुशासनहीनता के तौर पर पहुंची, और इसके फौरन बाद नरोत्तम को स्टार प्रचारक बना दिया गया। यानी समर्थकों की लगाई आग बुझाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं को सौंप दी गई।

2. सीएम और संगठन महामंत्री के साथ बैठक: अंदरखाने चर्चा है कि टिकट कटने के बाद सीएम मोहन यादव और क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल के साथ नरोत्तम की एक अहम बैठक हुई। यह बैठक बताती है कि पार्टी इस मसले को सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि टॉप लेवल पर मॉनिटर कर रही है। रवि भदौरिया के मुताबिक इसमें नरोत्तम को साफ संदेश दिया गया कि दतिया जीतना जरूरी है और जवाबदेही उन्हीं की होगी।

3. नरोत्तम के मिजाज में बदलाव: 2023 विधानसभा चुनाव हारने के बाद नरोत्तम ने कार्यकर्ताओं से कहा था- ‘समंदर का पानी उतरता देख, किनारे पर घर मत बना लेना, मैं लौटकर आऊंगा ये वादा है।’ वहीं टिकट कटने के ठीक बाद दिल्ली से लौटकर उन्होंने कहा- ‘अब बना ले कोई भी आदमी घर…।’

इसे बड़े कैनवस पर देखें तो नरोत्तम का टिकट काटना और फिर उन्हीं से प्रचार करवाना एक स्ट्रैटेजी के तहत किया गया है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, गोपाल भार्गव जैसे प्रदेश के अन्य दिग्गजों के लिए भी एक संदेश माना जा रहा है कि अब पावर सेंटर पार्टी से बड़े नहीं होंगे।

हंगामे के बाद कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा था- पार्टी के अंदर डेमोक्रेसी है, कार्यकर्ता अपनी अभिव्यक्ति करता है। पर भाजपा का कार्यकर्ता इतना अनुशासित है कि जब हम उसे बिठाकर बात कर लेंगे, तो सब बैठ जाएंगे। आशुतोष तिवारी भारी वोटों से जीतेंगे।

नरोत्तम, आशुतोष और सीएम मोहन यादव के साथ नामांकन फॉर्म जमा करने पहुंचे थे।

सवाल 4: ब्राह्मण का टिकट काटकर ब्राह्मण को ही देना- क्या यह कार्ड चलेगा?

जवाबः भाजपा का ब्राह्मण कार्ड चलना मुश्किल लग रहा है। इसके दो कारण नजर आ रहे हैं…

1. दतिया में सबसे बड़ा ब्लॉक अकेले ब्राह्मण वोट का नहीं, बल्कि SC और OBC मिलाकर बनता है। यह वर्ग अब तक नरोत्तम के सर्वजातीय और व्यक्तिगत रसूख की वजह से भाजपा से जुड़ा रहा, जो नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के पास फिलहाल नहीं है। यानी सिर्फ सवर्ण कार्ड के सहारे यह सीट निकालना मुश्किल है।

2. दूसरी दिक्कत खुद सवर्ण वोटरों के भीतर से उठ रही है। ग्राउंड पर सवाल पूछा जा रहा है कि जब वोट ब्राह्मण को ही देना था, तो सरकार में नंबर-2 रहे नेता को क्यों हटाया गया। इसमें आशुतोष का अनजान चेहरा होना भी जुड़ता है। साथ ही उनके भाई (बुआ के लड़के) की पुरानी कार्यशैली को लेकर स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकंबेंसी भी मौजूद है।

दरअसल, आशुतोष तिवारी के भाई सुरेन्द्र बुधौलिया जब भाजपा के जिलाध्यक्ष व स्थानीय संगठन की कमान संभाल रहे थे, तब उन पर केवल अपने करीबी गुट को तरजीह देने और दतिया के मूल व जमीनी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेलने के आरोप लगे थे। संगठन चलाने की उनकी एकतरफा शैली से स्थानीय नेताओं का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से नाराज चल रहा था।

सवाल 5: तो क्या दतिया से भाजपा का हारना तय है?

जवाबः ऐसा साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता। भाजपा नाराजगी और इस्तीफों के बीच भी जमीन पर चुपचाप डैमेज-कंट्रोल में जुटी रही है, और कांग्रेस की अपनी कमजोरियों ने भी मुकाबले को करीब-करीब 50-50 पर ला दिया है। इसे 4 फैक्टर्स से समझ सकते हैं…

1. शहर में कांग्रेस, गांव में भाजपा मजबूत: दतिया शहर में भाजपा को लेकर गुस्सा है और घनश्याम सिंह आगे दिख रहे हैं, लेकिन गांवों में तस्वीर उलट है। घनश्याम सिंह पिछले 15 साल सेवढ़ा इलाके की राजनीति करते रहे इतने अरसे बाद दतिया के गांवों में लौटे तो वहां का पुराना जुड़ाव कमजोर पड़ चुका है। इसके अलावा गांवों में सक्रिय आजाद समाज पार्टी भी कांग्रेस का ही वोट काट रही है।

2. बड़ी रैलियां नहीं, मोहल्लों में जाति की सेटिंग: भाजपा ने प्रचार का तरीका बदल दिया है। बड़े मंच की जगह अब जातिगत माइक्रो-टारगेटिंग हो रही है।

  • बसई इलाके में लोधी वोट ज्यादा हैं तो विधायक प्रीतम लोधी वहां 3 दिन से डेरा डाले हैं।
  • किला चौक जैसे ब्राह्मण इलाकों में मंत्री राकेश शुक्ला रूठों को मनाने में जुटे हैं।
  • यादव, रावत और कुशवाहा वोटों के लिए भी उन्हीं की जाति के मंत्री-सांसद गांव-गांव भेजे गए हैं।

3. संघ का माइक्रो मैनेजमेंट सिस्टम: आशुतोष तिवारी भले अनजान चेहरा हों, लेकिन वे लंबे समय से संघ से जुड़े हैं और यही कनेक्शन अब भाजपा के काम आ रहा है। संघ ने चुनाव कार्यालय और बूथ प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है, साथ ही आईटी सेल ने दर्जनों नए वॉट्सऐप ग्रुप बनाकर माहौल बदलने की कोशिश शुरू कर दी है। इसके मुकाबले कांग्रेस का मीडिया-आईटी सेल फिलहाल कमजोर नजर आ रहा है।

4. कांग्रेस की गुटबाजी का फायदा: कांग्रेस ने टिकट देने में देरी की, जिससे ब्राह्मण नेता अवधेश नायक अब भी नाराज हैं और पार्टी उन्हें मना नहीं पाई। चर्चा है कि नायक भाजपा में वापसी कर सकते हैं। जो भाजपा के लिए सीधा फायदा बन सकता है।