
‘मोहन’ सरकार का ‘शाही’ प्रेम…
कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित टिप्पणी के मामले में मंत्री शाह फिलहाल विजय के करीब नजर आ रहे हैं। राज्य सरकार ने भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर विवादित बयान देने के मामले में प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी नहीं देने की अनुशंसा की है। कैबिनेट के निर्णय को राज्यपाल को भेजा जाएगा। इसके बाद राज्यपाल के स्तर पर इसमें अंतिम निर्णय लिया जाएगा। इस केस में 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली है। और सुप्रीम कोर्ट सरकार के इस फैसले के प्रति लचर रवैया अपनाती है या सख्त फटकार लगाती है, यह भी जल्द पता लग जाएगा। हालांकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल को पत्र लिखकर शाह के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की अनुमति देने की मांग भी कर डाली है।
समझ में यह नहीं आ रहा है कि जब केंद्र सरकार कॉकरोच जनता पार्टी की मांग पर केंद्रीय मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार कर सकती है, ऐसे समय में मध्य प्रदेश सरकार मंत्री शाह को बचाने में कोई भी कसर छोड़ने को तैयार नहीं है। मोहन सरकार इस बात को लेकर अडिग है कि उनकी कैबिनेट के मंत्री शाह विवादित बयान के मामले में सार्वजनिक तौर पर बार-बार माफी मांग चुके हैं। ऐसे में अब उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई और कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाने की गुंजाइश मोहन सरकार को समझ में नहीं आ रही है। हालांकि यह वही मोहन सरकार है जिसमें एक आदिवासी मंत्री से महत्वपूर्ण विभाग छीनकर उसे निराशा के सागर में डुबो दिया गया था। मामला बहुत तूल पकड़ा था और मंत्री का गुस्सा जगजाहिर हो गया था लेकिन सरकार ने कोई समझौता नहीं किया था। वहीं हाल ही में पिछड़ा वर्ग के एक मंत्री से महत्वपूर्ण विभाग छीनकर उन्हें आनंद करने के लिए छोड़ दिया गया। यह फैसला भी आकस्मिक रूप से लिया गया, जिसमें किसी को भनक तक नहीं लगी। अंततः मंत्री के पास आनंदित होने के अलावा कोई चारा नहीं था। इन मामलों में मोहन अपने नाम को चरितार्थ करते हुए ‘मोह-नहीं’ यानी ‘निर्मोही’ ही नजर आए थे। लेकिन मंत्री विजय शाह के मामले में मोहन सरकार का रवैया शुरू से ही उन्हें बचाने पर केंद्रित रहा है। सुप्रीम कोर्ट सख्ती दिखाता रहा और मोहन सरकार विजय शाह को हमेशा ही सहारा देती नजर आती रही। और अंततः शाह का साथ देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में भी शाह के पक्ष में
दृढ़ता के साथ खड़े रहने को सरकार तैयार है।
गौरतलब है कि मंत्री शाह के खिलाफ यह मामला मई 2025 में महू के एक कार्यक्रम में कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की गई टिप्पणी से जुड़ा है। विवाद बढ़ने के बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया था और एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई।एसआईटी ने जांच पूरी करने के बाद शाह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 196 के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी थी। मामले में अभियोजन स्वीकृति का फैसला लंबे समय से लंबित था। सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी 2026 को राज्य सरकार को इस पर निर्णय लेने को कहा था। इसके बाद मई में भी अदालत ने सरकार की देरी पर कड़ी नाराजगी जताते हुए चार सप्ताह में फैसला लेने के निर्देश दिए थे। अब इस मामले में अगली अहम तारीख 31 अगस्त है। सुप्रीम कोर्ट में इसी दिन सुनवाई प्रस्तावित है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले में कोर्ट ने केस दर्ज कर कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
25 अगस्त को कैबिनेट बैठक में इस मामले में एसआईटी की रिपोर्ट भी कैबिनेट मंत्रियों के सामने रखी गई। बताया गया कि इससे पहले सरकार ने इस प्रकरण में अटॉर्नी जनरल की राय भी ली थी। इसके बाद कैबिनेट ने अभियोजन स्वीकृति नहीं देने का निर्णय लिया। कैबिनेट बैठक के दौरान अधिकांश मंत्रियों का यह तर्क था कि मंत्री विजय शाह अपने बयान के बाद सार्वजनिक रूप से तीन-चार बार माफी मांग चुके हैं, इसलिए अब इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं बनता। और अब 31 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
होनी है, जहां राज्य सरकार हलफनामा देकर यह बताएगी कि एसआईटी की ओर से केस चलाने की मंजूरी मांगे जाने पर उसने क्या कदम उठाया है। कैबिनेट के इस निर्णय के मिनट्स अब मुख्यमंत्री के पास जाएंगे, जो इसे राज्यपाल मंगुभाई पटेल के पास भेजेंगे।
तो इस हाई-प्रोफाइल मामले में आगे क्या होगा, यह काफी हद तक राज्यपाल के निर्णय और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा के अनुसार, वर्ष 2003 के एक अन्य चर्चित मामले (राजेंद्र सिंह प्रकरण) में भी ऐसा ही वाकया सामने आया था, जहां कैबिनेट ने केस की मंजूरी नहीं दी थी लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने इसके उलट फैसला लिया था और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यह माना था कि ऐसे मामलों में राज्यपाल का मत अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
तो अब राज्यपाल मंगुभाई पटेल तय करेंगे कि कैबिनेट के फैसले को बरकरार रखा जाए या अनुमति दी जाए, जिसके बाद 31 अगस्त को सर्वोच्च अदालत में होने वाली सुनवाई इस मामले का भविष्य तय करेगी। यह तो हो गई सैद्धांतिक बात, लेकिन पूरे मामले का व्यावहारिक पहलू यही है कि मोहन सरकार का शाही प्रेम, केंद्रीय नेतृत्व की निगरानी में सुप्रीम कोर्ट का सामना करेगा। और सुप्रीम कोर्ट में ही पता चलेगा कि विजय किसके हिस्से में आती है… लेकिन
यह तय है कि मोहन की निर्णय क्षमता हर स्थिति में सुदृढ़ ही नजर आएगी।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।