कर्नल सोफिया कुरैशी पर विवादित बयान वाले मामले में मध्य प्रदेश सरकार ने साफ कर दिया है कि वह मंत्री विजय शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं देगी। मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में अभियोजन स्वीकृति नहीं दिए जाने का फैसला हुआ- वह भी तब, जब बयान की जांच करने वाली SIT खुद केस चलाने की सिफारिश कर चुकी है, और सुप्रीम कोर्ट कई बार सरकार को फटकार लगाकर फैसला लेने को कह चुका है
सवाल 1- SIT ने केस चलाने की मंजूरी मांगी, फिर मुकदमा क्यों शुरू नहीं हुआ?जवाब- यह पूरा मामला एक साल से ज्यादा वक्त से लटका है, इसकी टाइमलाइन समझना जरूरी है।
- 11 मई 2025 को इंदौर जिले के महू स्थित रायकुंडा गांव में एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री विजय शाह ने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे कर्नल सोफिया कुरैशी पर सीधा निशाना माना गया, भले ही उन्होंने नाम नहीं लिया था। बयान भारतीय सेना की एक महिला अधिकारी की गरिमा से जुड़ा होने के कारण बेहद संवेदनशील माना गया, और विवाद बढ़ते ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लेकर FIR दर्ज करने के निर्देश दिए।
- बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामले की जांच के लिए SIT बनी। जांच पूरी होने के बाद SIT ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(a) के तहत शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी, यह मंजूरी देने का अधिकार सिर्फ राज्य सरकार के पास होता है। यहीं मामला अटक गया। कोर्ट ने जनवरी 2026 में दो हफ्ते, फिर मई 2026 में चार हफ्ते का वक्त दिया, लेकिन जुलाई 2026 तक भी सरकार ने कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किए थे।
- आखिरकार मंगलवार को कैबिनेट बैठक हुई। अटॉर्नी जनरल की राय ली गई, ऊपर बताई गई पूरी गोपनीय प्रक्रिया चली, और तय हुआ कि मंजूरी नहीं दी जाएगी। यह फैसला अब राज्यपाल मंगुभाई पटेल के पास भेजा जा चुका है।
सवाल 2- ‘अभियोजन स्वीकृति’ आखिर है क्या, और सरकार की मंजूरी क्यों जरूरी है?
जवाब- यह भारतीय कानून का एक पुराना सुरक्षा-कवच है, अभी BNSS की धारा 197 में है, पहले CrPC की धारा 197 में था।
- सीधी भाषा में समझें तो मकसद यह है कि कोई भी मंत्री या अफसर अपने पद पर रहते हुए किया गया कोई काम करे, तो उसे लेकर हर किसी को मनमाने ढंग से कोर्ट-कचहरी में घसीटने की छूट न मिल जाए। इसलिए जब तक सरकार खुद मंजूरी नहीं देती, अदालत ऐसे मामले में केस शुरू ही नहीं कर सकती।
- लेकिन यहीं एक बड़ी शर्त छिपी है। संविधान विशेषज्ञ और वकील दीपेश जोशी बताते हैं कि यह सुरक्षा-कवच सिर्फ तभी मिलता है जब लोक सेवक ने वह काम अपनी ‘ऑफिशियल ड्यूटी’ के तहत किया हो। जोशी के मुताबिक, विजय शाह का बयान किसी मंत्री-ड्यूटी का हिस्सा नहीं था, बल्कि निजी हैसियत से दिया गया विवादित बयान था, इसलिए यह कानूनी सवाल भी उतना ही बड़ा है जितना ‘मंजूरी मिली या नहीं’। अगर आगे कोर्ट यह माने कि यहां मंजूरी की जरूरत ही नहीं थी, तो पूरा मामला बिना सरकार की इजाजत के भी आगे बढ़ सकता है।

सवाल 3- शाह कई बार माफी मांग चुके हैं, तो क्या माफी से केस खत्म हो सकता है?
जवाब- कानूनी तौर पर नहीं, लेकिन सरकार के अंदर यही सबसे बड़ी दलील रही।
- कैबिनेट बैठक में आधे मंत्रियों ने कहा कि शाह तीन-चार बार सार्वजनिक तौर पर माफी मांग चुके हैं, इसलिए आगे मुकदमे का कोई औचित्य नहीं बनता।
- सुप्रीम कोर्ट खुद इस दलील को जनवरी 2026 में ही खारिज कर चुका है, कोर्ट ने कहा था कि माफी मांगने में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। कानूनन भी माफी किसी अपराध की जांच या मुकदमा रोकने का आधार नहीं होती, ज्यादा से ज्यादा सजा तय करते वक्त नरमी की एक वजह बन सकती है, वह भी तभी जब पहले मुकदमा चले और दोष साबित हो।
- राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई इसमें एक फर्क बताते हैं। उनके मुताबिक, अगर विजय शाह खुद अदालत में पेश होकर कहते कि उनकी मंशा गलत नहीं थी, तो यह एक सामान्य कानूनी बचाव होता।
- पूरी कैबिनेट का इकट्ठा होकर सिर्फ यह कहना कि माफी काफी बार मांगी जा चुकी है, किदवई की नजर में यह राजनीतिक ढिठाई (जनता और कानून की परवाह न करना) है, क्योंकि अभियोजन मंजूरी का प्रावधान इसलिए बना था ताकि जनप्रतिनिधियों को छोटी-मोटी शिकायतों पर परेशान न किया जाए, न कि किसी गंभीर मामले में बचाव की ढाल बनाया जाए।
सवाल 4- सुप्रीम कोर्ट का दबाव था, फिर भी सरकार ने केस चलाने से क्यों इनकार किया?
जवाब- कोर्ट ने सरकार को फैसला लेने के लिए कहा था, लेकिन मंजूरी देनी है या नहीं, इसका फैसला सरकार के अधिकार क्षेत्र में था।
- मंगलवार की कैबिनेट बैठक में इसी मुद्दे पर बंद कमरे में चर्चा हुई। ज्यादातर अधिकारियों को बाहर कर दिया गया। मुख्य सचिव, दो अपर मुख्य सचिव और विधि विभाग के सचिव की मौजूदगी में चर्चा हुई। विजय शाह को भी अपनी सफाई रखने के लिए बुलाया गया, फिर उन्हें बाहर भेज दिया गया। करीब 45 मिनट की चर्चा के बाद कैबिनेट ने अभियोजन की मंजूरी नहीं देने का फैसला किया। हालांकि, बैठक के बाद मीडिया ब्रीफिंग में मंत्री राकेश सिंह ने इस मामले पर चर्चा होने से ही इनकार किया।
- सरकार की ओर से मंजूरी रोकने के पीछे शाह की ओर से बार-बार मांगी गई सार्वजनिक माफी को आधार बताया गया है। हालांकि, मंजूरी नहीं देने का विस्तृत कानूनी आधार क्या है, यह सरकार के सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाले एफिडेविट से साफ होगा।
- वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा का कहना है कि 31 अगस्त की सुनवाई में यही महत्वपूर्ण होगा कि सरकार ने किस आधार पर अभियोजन की मंजूरी नहीं दी। उनके मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट सरकार के फैसले की समीक्षा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उसमें हस्तक्षेप भी कर सकता है।
सवाल 5- सरकार विजय शाह के साथ क्यों खड़ी हुई, इसके पीछे वोट बैंक है या कोई और वजह?
जवाब- विजय शाह के आदिवासी वर्ग से आने की वजह से वोट बैंक की चर्चा जरूर है।
- राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई इसे मुख्य वजह नहीं मानते। विजय शाह जनजातीय कार्य मंत्री भी हैं। उनके मुताबिक, इसे वोट बैंक से ज्यादा पार्टी की राजनीतिक छवि के नजरिए से देखना चाहिए।
- किदवई के अनुसार, सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अपने मंत्री के खिलाफ राजनीतिक या सार्वजनिक दबाव में झुकती हुई नहीं दिखेगी। उनके मुताबिक, इस मामले को सिर्फ आदिवासी वोट बैंक के चश्मे से देखना सही नहीं होगा।
- फैसले के कुछ घंटों बाद ही मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर दी। उन्होंने इसे मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास का शर्मनाक अध्याय बताते हुए मुख्यमंत्री और पूरे मंत्रिमंडल की जवाबदेही पर सवाल उठाए।
-
सवाल 6- अगर सरकार मंजूरी नहीं देती, तो क्या यह मामला यहीं खत्म हो जाएगा?
जवाब- नहीं, मंजूरी नहीं मिलने के बाद भी आगे के 3 रास्ते खुले हैं।
1. राज्यपाल का फैसला अभी आना बाकी है कैबिनेट की सिफारिश अब राज्यपाल के पास है। सांसद विवेक तन्खा बताते हैं कि, 2003 में एक मंत्री के खिलाफ लोकायुक्त ने अभियोजन की मंजूरी मांगी थी। तब कैबिनेट ने मंजूरी देने से इनकार किया, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने कैबिनेट की सलाह के उलट जाकर मंजूरी दे दी थी। तन्खा के मुताबिक, उस मामले में अदालत ने माना था कि मंत्री से जुड़े मामलों में कैबिनेट का फैसला उसी मंत्री के पक्ष में झुक सकता है, इसलिए राज्यपाल की स्वतंत्र राय महत्वपूर्ण हो जाती है।
2. सुप्रीम कोर्ट सरकार का फैसला पलट सकती है अगर राज्यपाल भी अभियोजन की मंजूरी नहीं देते हैं, तो मामला फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा के मुताबिक, कोर्ट सरकार के फैसले की समीक्षा कर सकता है और जरूरत पड़ने पर उसे पलट भी सकता है।
3. SIT चाह ले तो केस आगे बढ़ सकता है वकील दीपेश जोशी के मुताबिक, SIT यह दलील रख सकती है कि विजय शाह का विवादित बयान उनकी सरकारी ड्यूटी का हिस्सा था ही नहीं। अगर अदालत इस तर्क को स्वीकार करती है, तो अभियोजन स्वीकृति की जरूरत ही नहीं होने का सवाल उठ सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई भी मानते हैं कि मंत्री या विधायक होना किसी को हर स्थिति में कानूनी सुरक्षा नहीं देता। मंजूरी न मिलने से मामला लंबा जरूर खिंच सकता है, लेकिन इसे अपने आप खत्म मान लेना सही नहीं होगा।
यानी 31 अगस्त की सुनवाई सिर्फ सरकार के फैसले पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी अहम होगी कि उस फैसले के बाद मामले को आगे बढ़ाने का कौन-सा रास्ता खुलता है।
