
24 महीने में बहुत कुछ बदल गई है सरकार…
सागर से बालाघाट की दूरी 355 किलोमीटर है। अगस्त 2024 से अगस्त 2026 तक दो साल यानी चौबीस महीने बीत चुके हैं। और इन चौबीस में महीनों में सरकार की सोच ने भी बहुत दूरी तय कर ली है। अगस्त 2024 में सागर जिले में एक धार्मिक कार्यक्रम (शिवलिंग निर्माण) के दौरान जर्जर मकान की दीवार ढह गई थी। मध्य प्रदेश के सागर जिले के शाहपुर में एक दर्दनाक हादसे के दौरान दीवार गिरने से बच्चों सहित नौ लोगों की मौत होने पर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कलेक्टर दीपक आर्य और एसपी अभिषेक तिवारी समेत अन्य अधिकारियों को पद से हटा दिया था। और तब आईपीएस अभिषेक तिवारी छुट्टी लेकर विदेश गए हुए थे। फिलहाल मध्य प्रदेश कैडर के 2013 बैच के आईपीएस अधिकारी अभिषेक तिवारी ने जनवरी 2026 में अपने पद से वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के लिए इस्तीफा दे दिया है। और सागर से 355 किलोमीटर दूर बालाघाट में अगस्त 2026 में दो दर्जन से ज्यादा बच्चों की मौत के बाद भी आनन-फानन में किसी को पद से हटाने जैसा कोई दृश्य सामने नहीं आया। 29 बच्चों की मौत के बाद आदिवासी समुदाय में भारी आक्रोश देखा गया। 3 सितंबर 2026 को बालाघाट पूरी तरह बंद रहा। इस दौरान दुकानें बंद रहीं और बस सेवाएं भी ठप रहीं। हालांकि, स्कूल और आपातकालीन सेवाएं चालू रहीं। और इस बीच में खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बालाघाट में जन विश्वास अभियान में शिरकत की और पीड़ित परिवारों से भी मिले। बालाघाट को विकास कार्यों की बड़ी सौगात दी। लेकिन मौतों के नाम पर अफसरों पर गाज नहीं गिरी। अगर पुरानी सोच पर अमल होता तो हो सकता है कि कलेक्टर, स्वास्थ्य विभाग और महिला बाल विकास विभाग सहित अन्य विभागों के अफसरों पर एक साथ गाज गिर सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और ऐसा न होने का राज मध्य प्रदेश सरकार द्वारा तय किए गए 24 महीने के फासले में छिपा है। हालांकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के जन विश्वास अभियान के दौरान बालाघाट के पहले 3 जिलों में निलंबन का सिलसिला लगातार चल रहा था लेकिन बालाघाट में मुख्यमंत्री अलग ही अंदाज में नज़र आए थे। यहाँ विकास पर ही उनका पूरा फोकस था।
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में 29 आदिवासी बच्चों की मौत के बाद आदिवासी समुदाय में भारी आक्रोश है। खसरे और मलेरिया से हुई इन मौतों के विरोध में आदिवासी समुदाय ने 3 सितंबर को बालाघाट में बंद का आह्वान किया। बंद की वजह से जिले में बस सेवाएं ठप हो गईं और बाजार पूरी तरह से सुनसान रहे। सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। हालांकि, आम जनता की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए केवल इमरजेंसी सेवाओं को बंद से मुक्त रखा गया। विरोध प्रदर्शन के दौरान समुदाय ने उस जगह पर एक बैठक की जहां सदस्य 21 अगस्त से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर बैठे हैं। प्रतिनिधियों ने कहा कि 29 बच्चों की मौत के बाद भी सरकार इस मामले को गंभीरता से लेती नहीं दिख रही है, इसीलिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। बैगा इलाके में आदिवासी बच्चों की मौत ने स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदिवासी समुदाय का कहना है कि समय पर सही इलाज न मिलने और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण इन मासूमों की जान गई है।जिले के बैहर और परसवाड़ा आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीनों में खसरा, मलेरिया, त्वचा की बीमारियों, डायरिया और दूसरी बीमारियों की वजह से 29 मासूम आदिवासी बच्चों की मौत हो चुकी है। फिर भी इन बीमारियों का फैलना अभी कम नहीं हुआ है। रोजाना बीमार बच्चे अस्पतालों में आ रहे हैं। यह चिंता की बात है। आदिवासी इलाके में बीमारी फैलने और बच्चों की मौत के बीच एक बड़ा फैसला लिया गया है। सीएमएचओ डॉ. परेश उपलप को उनके पद से हटा दिया गया है। डॉ. मनोज पांडे बालाघाट के नए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) होंगे।आदिवासी संगठन लगातार सीएमएचओ को हटाने की मांग कर रहे थे, क्योंकि बीमारी फैलने और बच्चों की मौत के मामलों में उनके कामकाज पर सवाल उठ रहे थे।
और 3 सितंबर को ही उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने बालाघाट जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, उपलब्धता और डिलीवरी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए विभागों के बीच समन्वित एवं परिणाम आधारित कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि बालाघाट की भौगोलिक एवं दुर्गम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य सेवाओं की योजना और मानव संसाधन का निर्धारण वास्तविक आवश्यकता एवं क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप किया जाए। बैठक में लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, महिला एवं बाल विकास के साथ एनएचएम विभाग के अफसर मौजूद रहे। मंत्री ने बालाघाट के दूरस्थ एवं कठिन पहुंच वाले क्षेत्रों के लिए माइक्रो प्लानिंग तैयार करने के निर्देश दिए।
बालाघाट में बदली हुई सरकार के पीछे की बड़ी वजह यह मानी जा सकती है कि कांग्रेस और नेता प्रतिपक्ष ने इसे विपक्ष के नजरिए से तूल देने की कोशिश की थी। और बालाघाट के जरिए विपक्ष पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कवायद में था। इसीलिए, सरकार ने अपना नजरिया ही बदल दिया। खैर सोच कुछ भी रहे लेकिन मध्य प्रदेश स्वास्थ्य के मामले में
आदिवासियों और गरीबों की उम्मीद की किरण बन सके, सबकी यही उम्मीद है… फिलहाल तो बालाघाट के सन्दर्भ में यही कहा जा सकता है कि 24 महीने में बहुत कुछ बदल गई है सरकार…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।