उज्जैन में IIT के दो भाइयों का अनोखा देसी घर, 35 टन गोबर-मिट्टी से निर्माण; अर्थ टनल से AC के बिना 4-5 डिग्री ठंडा रहेगा मकान, गांव की पारंपरिक तकनीक से तैयार हो रहा घर

उज्जैन की पॉश कॉलोनी संत नगर में IIT से पढ़े दो भाई पारंपरिक तरीके से घर बनवा रहे हैं। इसकी दीवारों पर पीली मिट्टी और गोबर का लेप किया जा रहा है। छत पर मिट्टी के खपरैल लगाए जा रहे हैं। घर को ठंडा रखने के लिए जमीन के नीचे से हवा पहुंचाने की व्यवस्था भी बनाई गई है।

IIT मुंबई से पढ़े प्रतीक यादव और IIT खड़गपुर से पढ़े उनके भाई ऋतिक यादव का दावा है कि इस तकनीक से घर का तापमान बाहर के मुकाबले 4 से 5 डिग्री तक कम रह सकता है। इससे AC की जरूरत घटाने में मदद मिलेगी।

अपना मकान दिखाते हुए प्रतीक यादव।

गांव का सुकून शहर में लाने की कोशिश

प्रतीक और ऋतिक का बचपन गांव के परिवेश में बीता। उनके दादा कमल यादव और पिता गोपाल यादव दूध का व्यवसाय करते रहे हैं। IIT से पढ़ाई के बाद दोनों भाइयों ने यूरोप, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में काम किया, लेकिन गांव से जुड़ाव बना रहा।

प्रतीक बताते हैं कि दोनों को गांव का सुकून और वहां की जीवन शैली याद आती थी। शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर फार्म-हाउस पर रहना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए उन्होंने संत नगर में ऐसा घर बनाने का फैसला किया, जहां शहर में रहते हुए भी गांव जैसा माहौल मिल सके।

देखिए तस्वीरें

मकान का बाहरी लुक इस तरह रखा गया है।

छत पर खपरैल का यूज किया गया है।

घर का इंटीरियर इस तरह रखा गया है।

कमरों के अंदर डिजाइन भी दी गई है।

बाहरी लुक को एक पारंपरिक डिजाइन दिया गया है।

35 टन गोबर और पीली मिट्टी का इस्तेमाल

करीब पांच महीने से इस घर का निर्माण चल रहा है। इसमें करीब 35 टन गोबर और पीली मिट्टी का इस्तेमाल किया गया है। दीवारों पर मिट्टी, गोबर और चूने का मिश्रण लगाया जा रहा है। इसे तैयार करने में उड़द दाल और गुड़ का भी उपयोग किया गया है।

छत पर गुजरात से मंगाए गए मिट्टी के खपरैल लगाए गए हैं। दीवारों में मध्य प्रदेश से मंगाई गई रेड ब्रिक्स और ब्लैक स्टोन का इस्तेमाल किया गया है। दरवाजे और खिड़कियां पुराने पुश्तैनी मकान की लकड़ी से बनाई जा रही हैं। दीवारों पर केमिकल पेंट के बजाय गेरू से पारंपरिक आकृतियां बनाने की योजना है।

अर्थ टनल से घर तक पहुंचेगी ठंडी हवा

घर को ठंडा रखने के लिए अर्थ टनल बनाई जा रही है। इसके तहत तीन एयर डक्ट के लिए मोटे पाइप लगाए गए हैं। इनका एक सिरा बाहर चौगान में खुलता है। पाइप जमीन में करीब 10 फीट नीचे जाकर लगभग 20 फीट लंबी चैनल से गुजरते हुए कमरों और बैठक में खुलते हैं। इनके मुहानों पर पंखे लगाए जाएंगे।

इस व्यवस्था में बाहर की हवा जमीन के नीचे से गुजरकर घर तक पहुंचेगी। जमीन के भीतर का तापमान अपेक्षाकृत कम होने से हवा ठंडी हो सकती है। ऋतिक के मुताबिक, प्रदेश में इस तकनीक का इस्तेमाल अभी इक्का-दुक्का जगहों पर ही हुआ है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक तरीके से घर को ठंडा रखना और AC पर निर्भरता कम करना है।

निर्माण में जुटे 15 लोग, गांव की महिलाएं कर रहीं लिपाई

घर के निर्माण में रोज करीब 15 लोग काम कर रहे हैं। दीवारों पर मिट्टी और गोबर की लिपाई गांव की महिलाएं कर रही हैं। इससे पारंपरिक निर्माण पद्धति में स्थानीय हुनर और श्रम को भी शामिल किया गया है।

दोनों भाइयों ने उज्जैन में ‘Roots and Rituals Construction’ नाम से कंपनी शुरू की है। वे इसी तरह के प्राकृतिक और पारंपरिक निर्माण के दूसरे प्रोजेक्ट तैयार करना चाहते हैं। इस घर के निर्माण में इंजीनियर अभिषेक चावड़ा और प्रोजेक्ट मैनेजर सौरभ यादव भी शामिल हैं।

कुत्तों के लिए भी बनाया खास हिस्सा

परिवार के पास तीन कुत्ते हैं, जिनमें दो स्ट्रीट डॉग हैं। उनके लिए घर की डिजाइन में अलग जगह रखी गई है। पीली मिट्टी से बने गोलाकार हिस्से में कुत्तों के आने-जाने के लिए छोटा रास्ता बनाया गया है।

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