29 अक्टूबर को शिवपुरी में रामकथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने कहा, ‘हमारे राम सीधे हैं, तुम्हारे कृष्ण टेढ़े।’ वीडियो वायरल हुआ तो मथुरा-वृंदावन के संतों और कृष्ण भक्तों ने नाराजगी जताई। इसके बाद शास्त्री ने हाथ जोड़कर माफी मांगी। लेकिन मामला नहीं थमा। आगरा के वकील अजय प्रताप सिंह ने खुद को मां की ओर से श्रीकृष्ण का वंशज बताते हुए कोर्ट में आपराधिक मानहानि का परिवाद दायर कर दिया। मामले में 14 दिसंबर को सुनवाई है।
भगवान पर टिप्पणी से किसी व्यक्ति की मानहानि कैसे हो सकती है? माफी के बाद भी केस क्यों, अब आगे क्या होगा; समझते हैं आज के मध्य प्रदेश एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: श्रीकृष्ण को ‘टेढ़ा’ कहने की बात कहां से आई? क्या उनके स्वरूप या लीलाओं में ऐसा कोई संदर्भ मिलता है?
जवाब- परिवाद में दर्ज बयान के मुताबिक धीरेंद्र शास्त्री ने कथा में कृष्ण भक्तों से हाथ उठवाकर कहा था कि ‘तुम्हारे वाले तो बहुत टेढ़े हैं।’
बयान में क्या-क्या कहा गया
नाम पर टिप्पणी: उन्होंने कहा कि कृष्ण के नाम में भी टेढ़ापन है, क्योंकि ‘क’ के नीचे लगा ‘र’ (रकार) मछली पकड़ने के कांटे जैसा है, जिसमें फंसकर कोई नहीं निकलता।
मुद्रा पर टिप्पणी: ‘खड़े भी होते हैं तो तीन जगह से टेढ़े।’
तुलनाएं: उन्होंने अयोध्या और वृंदावन के नाम की तुलना भी की, और एक गीत गाया, जिसके बोल थे कि बांसुरी बजाना खेल है, पर धनुष चलाना खेल नहीं।
यह रामकथा का मंच था, और पूरी बात राम और कृष्ण की तुलना के अंदाज में कही गई थी। धीरेंद्र शास्त्री ने बाद में कहा कि वे ब्रज की भक्ति और प्रेम की बात कर रहे थे, और उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया।
‘तीन जगह से टेढ़े’ का धार्मिक संदर्भ, त्रिभंग मुद्रा: कृष्ण की बांसुरी बजाती मूर्तियों और चित्रों में शरीर तीन जगह से झुका दिखता है- गर्दन, कमर और घुटने। भारतीय मूर्ति, चित्र और नृत्य कला में इसे ‘त्रिभंग’ मुद्रा कहते हैं।

सवाल 2: खुद को श्रीकृष्ण का वंशज बताने वाले अजय प्रताप सिंह को इस बयान से क्या आपत्ति है?
जवाब- हमने परिवाद दायर करने वाले अजय प्रताप सिंह से बात की, उनका दावा है कि उनकी मां जादौन वंश से हैं, और जादौनों को कृष्ण का वंशज माना जाता है।
परिवाद में उन्होंने दो ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया है-
मथुरा गजेटियर: परिवाद में दिए उद्धरण के मुताबिक इसमें लिखा है कि जादौन या यादव राजपूत चंद्रवंशी राजा यदु से अपनी उत्पत्ति का ‘दावा करते हैं’, और श्रीकृष्ण यदु के वंशज थे। बता दें कि गजेटियर खुद इसे ‘दावा’ कहता है, स्थापित तथ्य नहीं।
अलेक्जेंडर कनिंघम की ‘रिपोर्ट ऑफ ए टूर इन ईस्टर्न राजपूताना 1882-83’: भारतीय पुरातत्व विभाग के पहले महानिदेशक की इस रिपोर्ट के उद्धरण में करौली और ग्वालियर क्षेत्र के जादौनों को यदुवंशियों के हिंदू वंशज बताया गया है।
परिवाद में जादौन के अलावा जडेजा और भाटी वंशों का भी जिक्र है। ये तीनों वंश परंपरागत रूप से खुद को यदुवंशी मानते हैं।
अजय प्रताप सिंह ने भास्कर से कहा, ‘वंशज होने के नाते यह बयान मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला है। यह व्यक्तिगत है, उसमें मेरा कुल है। अगर बाकी कुल वालों को समस्या नहीं है तो कोई बात नहीं, मुझे व्यक्तिगत रूप से समस्या है।’
सवाल 3: भगवान पर टिप्पणी से उनके वंशज की मानहानि कैसे हो सकती है? क्या कानून में ऐसा केस बनता है?
जवाब- इसे समझने के लिए पहले समझते हैं…
मानहानि क्या है: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के मुताबिक मानहानि तब होती है, जब कोई ऐसा आरोप या बात कही जाए, जिससे किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचे, और कहने वाले का इरादा या जानकारी भी ऐसी हो। कानून यह भी कहता है कि किसी की प्रतिष्ठा तभी गिरी मानी जाएगी, जब दूसरों की नजरों में उसकी इज्जत कम हो।
धारा 356 की दो व्याख्याएं इस केस से जुड़ती हैं…
दिवंगत व्यक्ति के बारे में टिप्पणी: यह भी मानहानि हो सकती है, अगर उससे उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता (वह जीवित होता तो) और उसका इरादा परिवार या करीबी रिश्तेदारों की भावनाएं आहत करना हो।
किसी समूह के बारे में टिप्पणी: यह भी मानहानि हो सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में कह चुका है कि वह समूह साफ तौर पर पहचाने जाने लायक होना चाहिए।
भोपाल के क्रिमिनल लॉयर शुभांक दीक्षित कहते हैं, ‘मानहानि तभी बनती है, जब बयान से किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा समाज की नजर में नीचे जाए। भगवान पर टिप्पणी का मामला धार्मिक भावनाएं आहत करने का बनता है, व्यक्तिगत मानहानि का नहीं।’
उनके मुताबिक शिकायतकर्ता को पहले यह साबित करना होगा कि वह सच में वंशज है। सिर्फ शपथपत्र में कह देना काफी नहीं होगा। वे यह भी कहते हैं, ‘किताब को सबूत माना जाए या सिर्फ राय, यह कोर्ट के विवेक पर होगा।’
धार्मिक भावनाएं आहत करने का अलग कानून: इसके लिए BNS की धारा 299 है, जिसमें 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। यह गैर-जमानती अपराध है।
अजय प्रताप सिंह का कहना है कि यह केस सरकार की ओर से चलता है, इसलिए उन्होंने मानहानि का रास्ता चुना। कानूनी स्थिति यह है कि धारा 299 में FIR कोई भी करा सकता है, लेकिन अदालत इसमें केंद्र या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना सुनवाई शुरू नहीं कर सकती (BNSS धारा 217)।
शिकायतकर्ता को क्या साबित करना होगा
- वह सच में श्रीकृष्ण का वंशज है।
- बयान का निशाना उस पर या पहचाने जाने लायक समूह पर था।
- बयान से समाज में उसकी अपनी प्रतिष्ठा गिरी।
- कहने वाले का इरादा नुकसान पहुंचाने का था।

सवाल 4: धीरेंद्र शास्त्री माफी भी मांग चुके हैं, फिर भी केस… क्या माफी मांगने से मामला खत्म नहीं हो सकता?
जवाब- धीरेंद्र शास्त्री दो बार माफी मांग चुके हैं।
माफी में क्या कहा: उन्होंने कहा कि राम और कृष्ण एक ही हैं, और उनका दोनों में भेद करने का इरादा नहीं था। वे भागवत कथा भी करते हैं और कृष्ण में उनकी पूरी आस्था है। उन्होंने यह भी कहा कि भाव में बोल गए, गलती हो गई, और अगर किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो वे हाथ जोड़कर क्षमा चाहते हैं।
माफी से केस अपने आप खत्म नहीं होता: माफी मांगना और कानूनी तौर पर केस खत्म होना, दो अलग बातें हैं।
केस आपसी समझौते से खत्म हो सकता है: आपराधिक मानहानि ‘समझौता योग्य’ (कंपाउंडेबल) अपराध है। यानी जिसकी मानहानि का दावा है, वह चाहे तो समझौता करके केस खत्म कर सकता है, या अपनी शिकायत वापस ले सकता है।
माफी आरोपी के पक्ष में जा सकती है: शुभांक दीक्षित के मुताबिक मानहानि के मामलों में माफी एक मजबूत बचाव होती है, और कोर्ट बिना शर्त माफी को आरोपी के पक्ष में देख सकता है।
अजय प्रताप सिंह कहते हैं, ‘हम कोर्ट से सीधा दंडित करने की कार्रवाई चाह रहे हैं। उन्होंने व्यास गद्दी पर बैठकर यह बात बोली है। ऐसे नहीं चलेगा कि पहले बोल दें और फिर माफी मांग लें। कोर्ट में आकर अपना जवाब रखें।’
सवाल 5: क्या इस मामले में धीरेंद्र शास्त्री को सजा हो सकती है? कोर्ट में अब आगे क्या होगा?
जवाब- फिलहाल मामला बिल्कुल शुरुआती चरण में है।
अब तक क्या हुआ: परिवाद 4 नवंबर को आगरा के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के न्यायालय में दायर हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुनवाई सिविल जज (जूनियर डिवीजन) कंचन कुमारी की अदालत में हुई। कोर्ट ने परिवाद दर्ज कर अगली तारीख 14 दिसंबर तय की है।
शिकायत, संज्ञान और समन में फर्क..
परिवाद दर्ज होना: कोर्ट ने शिकायत रिकॉर्ड पर ले ली है।
बयान: कोर्ट शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करता है।
आरोपी की सुनवाई: नए कानून (BNSS धारा 223) के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का मौका देना अनिवार्य है। यानी धीरेंद्र शास्त्री को अपनी बात रखने का मौका इसी चरण में मिलेगा।
संज्ञान और समन: कोर्ट को लगे कि मामला बनता है, तो वह संज्ञान लेकर समन जारी करेगा। तभी असल मुकदमा शुरू होगा।
धीरेंद्र शास्त्री के पास क्या विकल्प
वे इस बात पर सवाल उठा सकते हैं कि शिकायतकर्ता कानून की नजर में ‘पीड़ित व्यक्ति’ है या नहीं। BNSS के तहत मानहानि की शिकायत वही कर सकता है, जिसकी खुद की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई हो। वे हाईकोर्ट में शिकायत रद्द कराने की अर्जी भी दे सकते हैं।
दोष साबित होने पर धारा 356(2) के तहत दो साल तक की साधारण कैद, जुर्माना, दोनों, या सामुदायिक सेवा की सजा हो सकती है। यह जमानती अपराध है।