
आओ, आज अटल की कविता में आडवाणी की जिंदगी को टटोलते हैं…
इस साल दीपों के पर्व दीपावली का त्योहार 8 नवंबर 2026 को है और यह एक खास संयोग भी है कि भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी 8 नवंबर को 99 वर्ष की आयु पूर्ण कर रहे हैं। दीपावली के इस दिन वह शतायु वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। आडवाणी का जीवन अपने आप में समग्रता से भरा हुआ है। एक मायने में देखा जाए तो शक्तिशाली से अशक्तता का एक पूरा इतिहास आडवाणी के जीवन में सिमटा हुआ है। उपलब्धियों की पूर्णता को यदि आडवाणी के जीवन ने देखा है, तो जीवन की अपूर्णता की पूरी झलक भी आडवाणी देख रहे हैं। हम सामान्य तौर पर शक्तियों के छोटे-छोटे पोखरों को देखकर ही हतप्रभ रह जाते हैं लेकिन यदि भारत रत्न आडवाणी की बात करें तो उन्हें शक्ति के सागर के रूप में महसूस किया जा सकता है। और
वही सागर जब वक्त ने करवट ली तो किस तरह सूखकर रेगिस्तान बन गया, यह भी हम सभी आडवाणी के जीवन में अपनी आँखों से देख रहे हैं। भारत में अगर एक प्रमुख राजनैतिक दल के रूप में अपना स्थान भारतीय जनता पार्टी ने बना पाया है तो उसकी जड़ में आडवाणी और अटल ही हैं। अटल तो प्रधानमंत्री रहकर अपने सपनों का भारत बनाने में सफल रहे लेकिन आडवाणी का प्रधानमंत्री बनने का सपना कभी पूरा नहीं हुआ। और यह मलाल शायद उनके जीवन में अपूर्णता के रूप में हमेशा ही बना रहेगा।
लाल कृष्ण आडवाणी (जन्म 8 नवंबर 1927) एक भारतीय वकील, पत्रकार, ट्रेड यूनियनिस्ट और राजनेता हैं, जिन्होंने 2002 से 2004 तक भारत के 7वें उप प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। 2024 में, उन्हें देश के लिए उनके महान योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वे भारतीय जनता पार्टी के सह-संस्थापकों में से एक हैं और हिंदुत्व संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आजीवन सदस्य हैं। वे 1998 से 2004 तक 6 साल और 64 दिनों तक सेवा करने वाले सबसे लंबे समय तक गृह मंत्री रहे, जब तक कि उनके शिष्य अमित शाह 2025 में उनसे आगे नहीं निकल गए। वे लोकसभा में सबसे लंबे समय तक विपक्ष के नेता भी हैं। साथ ही भाजपा के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले अध्यक्ष भी हैं। वे 1989, 1991 और 2009 के आम चुनावों के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन 2014 में जब उनके ही शागिर्द नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने का बिगुल फूंका, तब सबसे पहले आडवाणी को किनारे कर दिया गया। उसके बाद आडवाणी शायद पिछले 12 साल से घर की चारदीवारी में ही अघोषित तौर पर कैद हैं, यह भारत का हर नागरिक जानता है। और राजनीति में हर सांस लेने वाले आडवाणी की सांसों को अब शायद राजनीति सपने में भी नहीं सुहाती होगी।
खैर, आज हम अटल के शब्दों में आडवाणी की बात करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी की एक कविता का शीर्षक है क्या खोया, क्या पाया जग में…। इस कविता का हर शब्द आज आडवाणी के जीवन को पूरी तरह से व्यक्त करता नजर आ रहा है। आइए यह कविता पढ़ते हैं और अटल जी के साथ आडवाणी को महसूस करते हैं।
क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें।
पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर,
खुद दरवाज़ा खोलें।
जन्म-मरण अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें।
अपने ही मन से कुछ बोलें।
आडवाणी का जन्म कराची में हुआ था और भारत के बंटवारे के समय वे भारत आ गए और बॉम्बे में बस गए, जहाँ उन्होंने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। आडवाणी 1941 में चौदह साल की उम्र में आरएसएस में शामिल हुए और राजस्थान में प्रचारक के तौर पर काम किया। 1951 में, आडवाणी श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा बनाई गई भारतीय जनसंघ पार्टी के सदस्य बने और उन्होंने पार्लियामेंट्री मामलों के सुपरवाइज़र, जनरल सेक्रेटरी और दिल्ली यूनिट के प्रेसिडेंट सहित कई भूमिकाएँ निभाईं। 1967 में, वे पहली दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल के चेयरमैन चुने गए और 1970 तक आरएसएस नेशनल एग्जीक्यूटिव के सदस्य बने। 1970 में, आडवाणी पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने और 1989 तक चार टर्म तक सेवा करते रहे। वे 1973 में जनसंघ के प्रेसिडेंट बने, और 1977 के आम चुनाव से पहले इसका जनता पार्टी में विलय हो गया । चुनावों में जनता पार्टी की जीत के बाद, आडवाणी केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री और राज्यसभा में सदन के नेता बने।
1980 में, लाल कृष्ण, अटल बिहारी वाजपेयी के साथ भाजपा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और उन्होंने तीन बार पार्टी के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। वे 1989 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए जहाँ उन्होंने सात कार्यकाल पूरे किए। 1992 में, उन पर बाबरी मस्जिद के विध्वंस का हिस्सा होने का आरोप लगाया गया था , लेकिन सबूतों के अभाव में अदालतों ने उन्हें बरी कर दिया था। उसी के बाद, वे अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर बनाने के आंदोलन के प्रमुख समर्थकों में से एक थे और इसके बाद 1990 के दशक के अंत में हिंदुत्व , एक हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा का उदय हुआ। उन्होंने दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया है। वे 1998 से 2004 तक गृह मंत्री और 2002 से 2004 तक उप प्रधान मंत्री रहे। उन्होंने 2019 तक भारतीय संसद में सेवा की और उन्हें एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में भाजपा के उदय का श्रेय दिया जाता है। 2015 में, उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया और 2024 में, उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
तो अविभाजित भारत में कराची में जन्मा यह लाल कभी भारत में भाजपा का महत्वपूर्ण आधार स्तंभ बनेगा, यह किसी ने सोचा नहीं होगा। दुःख की बात यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी बीमारी की वजह से सालों अपने निवास की चारदीवारी में कैद होने को मजबूर हुए थे, लेकिन अटल के सबसे खास मित्र आडवाणी को भी मजबूरी में चारदीवारी में कैद होकर जीना पड़ेगा यह न तो उन्होंने और न ही उनके किसी भी समर्थक ने सोचा होगा। दीप पर्व पर
यही शुभकामनाएँ कि भारत रत्न आडवाणी जी शतायु हों और स्वस्थ रहें…।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।