अक्षय तृतीया का विषेश महत्व ,शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है

पंडित दिनेश गुरूजी
अक्षय तृतीया का विषेश महत्व
शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है

अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं।
इस वर्ष 2021 में अक्षय तृतीया 14 मई 2021 दिन शुक्रवार को होगी।

तो आइए जानें 25 बातों से अक्षय तृतीया का महत्व…

1.“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्।
न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।”

वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है।

2 .अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।

3. धरती पर भगवान विष्णु ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था।

4. इस दिन धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है।

5.शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है।

6. नया वाहन लेना या गृह प्रवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं। मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है। इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं…

7. वैशाख मास की विशिष्टता इसमें आने वाली अक्षय तृतीया के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण तथा भविष्य पुराण आदि में मिलता है।

8.यह समय अपनी योग्यता को निखारने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए उत्तम है।

9. यह मुहूर्त अपने कर्मों को सही दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। शायद यही मुख्य कारण है कि इस काल को ‘दान’ इत्यादि के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।

10. ‘वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आखातीज के रुप में मनाया जाता है भारतीय जनमानस में यह अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्ध है।

11.पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान,दान,जप,स्वाध्याय आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है इस तिथि में किए गए शुभ कर्म का फल क्षय नहीं होता है इसको सतयुग के आरंभ की तिथि भी माना जाता है इसलिए इसे’कृतयुगादि’ तिथि भी कहते हैं ।

12.यदि इसी दिन रविवार हो तो वह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है।

13. मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा संतान भी अक्षय बनी रहती है।

14.दीन दुखियों की सेवा करना, वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्म की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन व अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है।

15. कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म में समृद्धि, ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है।

16. भविष्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार शाकल नगर रहने वाले एक वणिक नामक धर्मात्मा अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान ध्यान व दान कर्म किया करता था जबकि उसकी पत्नी उसको मना करती थी,मृत्यु बाद किए गए दान पुण्य के प्रभाव से वणिक द्वारकानगरी में सर्वसुख सम्पन्न राजा के रुप में अवतरित हुआ।

17. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर सामर्थ्य अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पंखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है।

18. दान को वैज्ञानिक तर्कों में ऊर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है। दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है।

19. यदि अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है, ऐसी मान्यता है। किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी।

20. इस दिन प्राप्त आशीर्वाद बेहद तीव्र फलदायक माने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। सतयुग, त्रेता और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ और इसी तिथि को द्वापर युग समाप्त हुआ था।

21.रेणुका के पुत्र परशुराम और ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। इस दिन श्वेत पुष्पों से पूजन कल्याणकारी माना जाता है।

22.धन और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। धन प्राप्ति के मंत्र, अनुष्ठान व उपासना बेहद प्रभावी होते हैं। स्वर्ण, रजत, आभूषण, वस्त्र, वाहन और संपत्ति के क्रय के लिए मान्यताओं ने इस दिन को विशेष बताया और बनाया है। बिना पंचांग देखे इस दिन को श्रेष्ठ मुहुर्तों में शुमार किया जाता है।

23.दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है।

24. मृत्यु के बाद जब अन्य लोक में जाना पड़ता है तब उस धन से दिया गया दान विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। पुनर्जन्म लेकर जब धरती पर आते हैं तब भी उस कोष में जमा धन के कारण धरती पर भौतिक सुख एवं वैभव प्राप्त होता है। इस दिन स्वर्ण, भूमि, पंखा, जल, सत्तू, जौ, छाता, वस्त्र कुछ भी दान कर सकते हैं। जौ दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है।

25. इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते है।
?? वैशाख शुक्ल तृतीया की महिमा मत्स्यपुराण, स्कंदपुराण, भविष्यपुराण, नारद पुराण व महाभारत आदि ग्रंथो में है । इस दिन किये गये किसी भी पुण्यकर्म अक्षय (जिसका क्षय न हो) व अनंत (जिसका अंत न हो) फलदायी होते हैं, अत: इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते है, यह सर्व सौभाग्यप्रद है ॥

?? यह युगादि तिथि यानी सतयुग व त्रेतायुग की प्रारम्भ तिथि है । श्रीविष्णु का नर-नारायण, हयग्रीव और परशुरामजी के रूप में अवतरण व महाभारत युद्ध का अंत इसी तिथि को हुआ था, इसलिए इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के पाठ करना या पंडित जी से करवाना उत्तम हैं ॥

?? इस दिन बिना कोई शुभ मुहूर्त देखे कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ या सम्पन्न किया जा सकता है । जैसे – विवाह, गृह – प्रवेश या वस्त्र – आभूषण, घर, वाहन, भूखंड आदि की खरीददारी, कृषिकार्य का प्रारम्भ आदि सुख-समृद्धि प्रदायक है ॥

? प्रात: स्नान, देव पूजन, हवन और पितृ तर्पण का महत्त्व ?

?? इस दिन गंगा – स्नान करने से सारे तीर्थ में स्नान करने का फल मिलता है, गंगाजी का सुमिरन एवं जल में आवाहन करके ब्रम्हमुहूर्त में पुण्यस्नान तो सभी कर सकते है । स्नान के पश्चात् निम्नलिखित प्रार्थना करें :-

? माधवे मेषगे भानौं मुरारे मधुसुदन ।
प्रात: स्नानेन में नाथ फलद: पापहा भव ॥

अर्थात् :-
‘हे मुरारे ! हे मधुसुदन ! वैशाख मास में मेष के सूर्य में हे नाथ ! इस प्रात: स्नान से मुझे फल देनेवाले हो जाओ और मेरे पापों का नाश करों ॥’

?? सप्तधान्य उबटन व गोझरण मिश्रित जल से स्नान पुण्यदायी है । चंदन, पुष्प, हल्दी कुमकुम, अक्षत (साबुत चावल मतलब लंबे दानेवाले बासमती चावल) धूप, दीप, केसर और काजू बादाम युक्त पायस नैवेद्य, आदि से लक्ष्मी – नारायण, श्री यंत्र, नवार्ण यंत्र आदि का पूजन व श्वेत तिल – गाय का घी एवं पायस के साथ सूखेमेवे से हवन करना अक्षय फलदायी है ॥

? जाप, उपवास व दान का महत्त्व ?

?? इस दिन किया गया उपवास, जाप, ध्यान, स्वाध्याय भी अक्षय फलदायी होता है । एक बार हल्का भोजन करके भी उपवास कर सकते है । ‘भविष्य पुराण’ में आता है कि इस दिन दिया गया दान अक्षय हो जाता है । इस दिन मिट्टी के घड़े में पानी भर के उसका दान, हाथ पंखे का दान, तांबे के घड़े में अनाज भर के उसका दान, सूजी और शक्कर के लड्डू, पादत्राण (स्त्री एवं पुरुष के चप्पल), छाता, जौ, गेहूँ, चावल, गाय, वस्त्र, सुवर्ण (सोना), रजत (चांदी) आदि का दान पुण्य फलदायी है । परंतु दान सुपात्र, विद्वान भूदेव (ब्राह्मण) को ही देना चाहिए ॥

? पितृ तर्पण का महत्त्व व विधि ?

?? इस दिन पितृ तर्पण करना अक्षय फलदायी है, पितरों के तृप्त होने पर घर में सुख – शांति – समृद्धि व दिव्य संताने प्राप्त होती हैं ।

? विधि :- इस दिन तीर्थ श्राद्ध करके फिर देव, ऋषि, मनुष्य और अपने पितृ ओ का श्वेत तिल, जौ, दुग्ध, चंदन युक्त श्वेत पुष्प, तुलसी, युक्त जल से तर्पण करें, फ़िर भगवान महा विष्णु जी की षोडशोपचार पूजन करें और भगवान विष्णु से पूर्वजों की सदगति हेतु प्रार्थना करें ॥

? आशीर्वाद पाने का दिन ?

?? इस दिन माता – पिता, गुरुजनों की एवं ब्राह्मणों की सेवा कर के उनकी विशेष प्रसन्नता, संतुष्टि व आशीर्वाद प्राप्त करें, इसका फल भी अक्षय होता है ।

? अक्षय तृतीया का तात्त्विक संदेश ?

?? *’अक्षय’ यानी जिसका कभी नाश न हो, शरीर एवं संसार की समस्त वस्तुएँ नाशवान है, अविनाशी तो केवल परमात्मा ही है, यह दिन हमें आत्म विवेचन की प्रेरणा देता है, अक्षय आत्मतत्त्व पर दृष्टी रखने का दृष्टिकोण देता है, महापुरुषों व धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा और परमात्मा प्राप्ति का हमारा संकल्प अटूट व अक्षय हो – यही अक्षय तृतीया का संदेश मान सकते हैं ॥

?? ‘अक्षय’ शब्द का मतलब है जिसका क्षय या नाश न हो, इस दिन किया हुआ जाप, तप, ज्ञान तथा दान अक्षय फल देने वाला होता है अतः इसे ‘अक्षय तृतीया’ कहते हैं, भविष्यपुराण, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, स्कन्दपुराण में इस तिथि का विशेष उल्लेख है, इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं उनका बड़ा ही श्रेष्ठ फल मिलता है, इस दिन सभी देवताओं व पित्तरों का पूजन किया जाता है, पित्तरों का श्राद्ध कर धर्मघट दान किए जाने का उल्लेख शास्त्रों में है, वैशाख मास भगवान विष्णु को अतिप्रिय है अतः विशेषतः विष्णु जी की पूजा, अभिषेकार्चन, सहस्त्रार्चन एवं सहस्त्रनाम स्तोत्रम् के पाठ करें

?? स्कन्दपुराण के अनुसार, जो मनुष्य अक्षय तृतीया को सूर्योदय काल में प्रातः स्नान करते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करके भगवान सत्यनारायण की कथा सुनते हैं, वे मोक्ष के भागी होते हैं, जो उस दिन मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए दान करते हैं, उनका वह पुण्यकर्म भगवान की आज्ञा से अक्षय फल देता है ॥

?? भविष्यपुराण के मध्यमपर्व में कहा गया है वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया में गंगाजी में स्नान करनेवाला सब पापों से मुक्त हो जाता है | वैशाख मास की तृतीया स्वाती नक्षत्र और माघ की तृतीया रोहिणीयुक्त हो तथा आश्विन तृतीया वृषराशि से युक्त हो तो उसमें जो भी दान दिया जाता है वह अक्षय होता है, विशेषरूप से इनमें हविष्यान्न (हरे साबुत मुंग, श्वेत एवं कृष्ण तिल) एवं मोदक देनेसे अधिक लाभ होता है तथा गुड़ और कर्पूर से युक्त जलदान करनेवाले की विद्वान् पुरुष अधिक प्रंशसा करते हैं, वह मनुष्य ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥ यदि बुधवार और श्रवण से युक्त तृतीया हो तो उसमें स्नान और उपवास करनेसे अनंत फल प्राप्त होता हैं |

? अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं ।
तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया ।
उद्दिश्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै: ।
तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव ।। :– मदनरत्न

?? अर्थात् :- भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठरसे कहते हैं, हे राजन इस तिथि पर किए गए दान व हवन का क्षय नहीं होता है इसलिए हमारे ऋषि मुनियोंने इसे अक्षय तृतीया कहा है, इस तिथि पर भगवानकी कृपादृष्टि पाने के लिए एवं पित्तरोंकी गतिके लिए की गई विधियां अक्षय एवं अविनाशी होती हैं ॥

? भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय 21 ?

?? वैशाखे मासि राजेन्द्र तृतीया चन्दनस्य च वारिणा तुष्यते वेधा मोदकैर्भीम एव हि दानात्तु चन्दनस्येह कञ्जजो नात्र संशयः । । यात्वेषा कुरुशार्दूल वैशाखे मासि वै तिथिः तृतीया साऽक्षया लोके गीर्वाणैरभिनन्दिता । । आगतेयं महाबाहो भूरि चन्द्रं वसुव्रता कलधौतं तथान्नं च घृतं चापि विशेषतः । । यद्यद्दत्तं त्वक्षयं स्यात्तेनेयमक्षया स्मृता यत्किञ्चिद्दीयते दानं स्वल्पं वा यदि वा बहु तत्सर्वमक्षयं स्याद्वै तेनेयमक्षया स्मृता । । योऽस्यां ददाति करकन्वारिबीजसमन्वितान् स याति पुरुषो वीर लोकं वै हेममालिनः । । इत्येषा कथिता वीर तृतीया तिथिरुत्तमा यामुपोष्य नरो राजन्नृद्धिं वृद्धिं श्रियं भजेत् । ।

?? अर्थात् :- वैशाख मास की तृतीया को चन्दनमिश्रित जल तथा मोदक के दान से ब्रह्मा तथा सभी देवता प्रसन्न होते हैं, देवताओं ने वैशाख मास की तृतीया को अक्षय तृतीया कहा है, इस दिन अन्न, वस्त्र, भोजन, सुवर्ण और मिट्टी के घड़े में या मिट्टी की बोतल में जल भर के दान, तांबे के कलश में अन्न भर के उसका दान आदि का दान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है, इसी तृतीया के दिन जो कुछ भी दान किया जाता है वह अक्षय हो जाता है और दान देनेवाला इस दिन अन्न के जितने दाने का दान करता हैं वह उसकी मृत्यु के बाद उतने साल तक सूर्यलोक को प्राप्त करता है, इस तिथि को जो उपवास करता है वह ऋद्धि वृद्धि और श्री से सम्पन्न हो जाता है ॥
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आज श्री गणेश जी को प्रसन्नार्थ हेतु कर्म…

1.? श्री गणेश को मोदक का भोग-

गणेश जी को खाना खाना बहुत पसंद है और खाने में उन्हें मीठी चीज़े खाना बहुत पसंद आता है मोदक बूंदी का मुलायम लड्डू होता है जिसे खाने में आसानी होती है और वह मीठा भी होता है गणपति के एक दन्त है इसीलिए वह इसे आराम से खा सकते हैं। तो आप गणेश जी की पूजा करते समय उनके ऊपर मोदक का भोग अवश्य लगाएं ॥

2.? शमी की पूजा-

गणेश भगवान को शमी का वृक्ष अतिप्रिय है इसीलिए उनके भक्त उनकी पूजा के लिए शमी का वृक्ष का प्रयोग करते हुए शमी के वृक्ष की भी पूजा करें ॥

3.? मंत्रो का करें जप-

माना जाता है कि मंत्रो का जाप करने से गणपति जी जल्दी खुश हो जाते है अत: श्री गणेश जी की पूजा के दौरान उनके मंत्रो का जप करें, और साफ़ मन से गणेश जी की आराधना करें ॥

4.? गणेश जी की पूजा में दूर्वा-

श्री गणेश को खुश करने के लिए दूर्वा का प्रयोग करें। दूर्व को पूजा के दौरान उनके नाम बोलतें हुए उन्हें अर्पित करें ॥

5.? सिन्दूर से पूजा-

गणपति बप्पा को खुश करने के लिए उनके मस्तिष्क पर तिलक सिन्दूर से लगाया जाता है। ऐसे में आप उनके ऊपर लाल रंग के सिंदूर का चोला चढ़ा सकते हैं।यानि सिन्दूर से उनकी पूजा कर सकते हैं ॥

सिंदूर अर्पण करते समय: मंत्र…

सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ।
शुभदं कामदं चैव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥

श्री गणेश के कुछ अन्य खास मंत्र :

विघ्नों को दूर करने के लिए-

‘गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः ।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः ॥
विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः ।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌ ॥
विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत्‌ क्वचित्‌’ ॥

बिगड़े काम सुधारने के लिए-

‘त्रयीमयाया खिलबुद्धिदात्रे बुद्धिप्रदीपाय सुराधिपाय ।
नित्याय सत्याय च नित्यबुद्धि नित्यं निरीहाय नमोस्तु नित्यम् ।।’

ग्रह दोष से रक्षा के लिए-

‘गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रयम्बक: ।
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक: ।।
धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक: ।
गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्
पंडित दिनेश गुरूजी
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसन्धान संस्थान इंदौर
वास्तु & ज्योतिर्विद
9977794111,9826025335

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