
निजी_स्कूल और उनकी लगातार बढ़ती फीस
शिक्षा, विशेषकर “स्कूली शिक्षा” निजी हाथों में किसी भी अन्य व्यवसाय की तरह ही फलेगी फुलेगी, यह सत्य तो शिक्षा का निजीकरण होते समय ही हम सबको भलीभांति विदित था लेकिन जब यह प्रस्ताव अमल में लाया गया था उस समय हमने ही निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा अधिक कीमत पर प्रदान की जाने वाली शिक्षा को शासकीय विद्यालयों में नाम मात्र की फीस पर दी जा रही शिक्षा से बेहतर माना था ।

और अन्य व्यवसायों की तरह, हर उत्पाद, हर सर्विस की तरह समय के साथ इस शिक्षा प्रदान करने की कीमत भी बढ़ेगी यह भी हमें मालूम था तो अब इस बढ़ी हुई फीस या शिक्षा की बढ़ती कीमत पर भोलेपन से आश्चर्यचकित होकर क्यों दिखा रहे हैं हम ?
उस समय हम सबने शिक्षा के निजीकरण का विरोध करना था । जो हमने नहीं किया । एक अपराध किया था जिसकी सजा सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही फीस के रूप में अब मिल रही है।
एक बात हम सबको मालूम थी और आज भी है कि अन्य व्यावसायिक गतिविधियों की तरह एक व्यवसायी के लिए शिक्षा प्रदान करना भी महज लाभ कमाकर प्रोडक्ट/उत्पाद या सेवा/सर्विस बेचने की तरह एक व्यवसायिक गतिविधि मात्र है, ” पैसा लगाओ पैसा बनाओ ” यही तो व्यवसाय होता है, हर व्यवसायी यही करता है और इसमें कुछ गलत भी नहीं है, फिर निजी शिक्षण संस्थान को एक व्यवसाय के रूप में चलाने पर ऐतराज क्यों ।
जैसे शराब, सिगरेट, तम्बाखू, भांग आदि सामाजिक स्वीकृति और सरकारी सुरक्षा के साये में भारी मुनाफे के साथ बेची जा रही है और हमें कई आपत्ती नहीं है, वैसे ही शिक्षा के निजीकरण को भी सामाजिक और सरकारी दोनों ही तरह की स्वीकृति और सुरक्षा भी हमारे द्वारा दी जा चुकी है और अब यह भी भारी मुनाफे का धंधा बन चुका है।
जब हमने, पूरे समाज ने अपने बच्चों को येन केन प्रकरेण इन शिक्षा बेच रहे संस्थानों (दुकानों) में प्रवेश दिलवाकर इस मुनाफाखोरी को अपनी अपनी सहज और बिना शर्त सहमति प्रदान की हुई है । तो अब इस विषय पर चीख पुकार मचाना व्यर्थ है, बेवजह है, औचित्यहीन है ।
देखा जाय तो इस कार्य से सबका अपना अपना स्वार्थ सिध्द हो रहा है, सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गई है, व्यवसायी मोटा लाभ कमाकर खुश हो गए हैं और पालक इसे स्टेटस सिंबल मानते हैं, बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी मानते हैं और अपनी समझ में अच्छे माने जाने वाले स्कूल में एडमिशन करवा कर निश्चिंत हो गए है।
अब बात करते हैं इस बढ़ती हुई फीस की, तो जितना अच्छा उत्पाद या सेवा होती है उसकी बाजार में उतनी ही अधिक मांग/डिमांड होती है और जितनी मांग बढ़ती है उतनी ही कीमत भी तो बढ़ती ही है।
अधिक डिमांड कम सप्लाय और बढ़ती कीमत यह तो अर्थशास्त्र का सार्वभौमिक नियम है ।
हमें शराब, सिगरेट पर हो रही मुनाफाखोरी मंजूर है लेकिन शिक्षा हेतु कीमत चुकाने पर ऐतराज क्यों यह मेरी समझ से परे है ।
जब निजी क्षेत्र शिक्षा के लिए खोला गया था उस वक्त हमने इसका विरोध नहीं किया बल्कि खुले ह्रदय से इस निर्णय का स्वागत किया था तो अब यह थोथा विलाप क्यों कर रह हैं हम ?
जो बोया है वो तो काटना ही पड़ता है ।
वैसे भी शासकीय शिक्षण प्रणाली में हम ना तो अपने बच्चों को विद्यार्थी की तरह भेजने को तैयार हैं और ना ही एक शिक्षक की तरह, फिर नैतिक रूप से शासकीय शिक्षा प्रणाली को कोसने का हमें क्या अधिकार है ।
कुछ पाठकों को शिक्षा की तुलना शराब या अन्य नशीले उत्पादों से करना उचित नही लग रहा होगा लेकिन मैंने इस लेख में शराब का उल्लेख सिर्फ ध्यानाकर्षण या चेताने के लिए किया है । वैसे तो शराब और शिक्षा की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि शराब एक तरह का नशा है और सेवन करने वाला नशेड़ी कहलाता है और नशेड़ी नशे की अपनी लत पूरी करने के लिए क्या कुछ नहीं कर गुजरता है, इसी तरह अपने बच्चे को उस नामचीन और प्रतिष्ठित स्कूल में एडमिशन दिलवाने का जो नशा है वह शराब से भी भयावह और घातक रूप में देखा गया है । प्रवेश / एडमिशन फॉर्म के लिए देर रात से लाइन में लग जाना, झूठे दस्तावेजों का सहारा लेना, जुगाड़ लगाना, तिकड़म भिड़ाना, डोनेशन देना, पहचान निकालना, पहुंच या प्रभाव का इस्तेमाल करना, जरूरत पड़ने पर गिड़गिड़ाना, और इसी तरह का कोई भी अन्य हथकंडा जो अपने बच्चे का एडमिशन सुनिश्चित करता ही उसे अपनाने से कतईं कोई गुरेज नहीं करना । यह सब भी एक तरह का नशा ही तो है । जब हम इतने बेकरार है और उतावले भी है निजी शिक्षण संस्थान में अपने बच्चों को भेजने के लिए तो फिर बढ़ती फीस पर सवाल क्यों ? बवाल क्यों ?
राजकुमार जैन
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