राज-काज

राज-काज
* दिनेश निगम ‘त्यागी’
0 एक ट्वीट ने करा दी नाथ की फजीहत….
– बुजुर्ग कह गए हैं कि ‘मुंह से निकली बोली और बंदूक से निकली गोली’ कभी वापस नहीं आते। इसलिए न बिना सोचे-विचारे बोलना चाहिए और न ही बंदूक का ट्रेगर दबाना चाहिए। विडंबना यह कि इस मुहावरे पर बुजुर्ग ही अमल नहीं करते। राजनीति में तो बिना सोचे-विचारे बोलने की बीमारी जैसी है। कमलनाथ कांग्रेस के बुजुर्ग नेता हैं। न जाने उनकी बुजुर्गियत का क्या हुआ कि वे गलती पर गलती कर रहे हैं। कुछ माह पहले किया गया उनका एक ट्वीट उनकी ही फजीहत का कारण बन गया है। उन्होंने लिखा था कि 15 अगस्त को मुख्यमंत्री के तौर पर ध्वजारोहण वे ही करेंगे। यह बात उन्होंने विधायक दल की बैठक में भी कही थी। नरोत्तम मिश्रा एवं भूपेंद्र सिंह जैसे मंत्री इस पर चुटकी ले रहे हैं। कह रहे हैं कि कमलनाथ ध्वजारोहण करते दिख जाएं तो बताइएगा, हम भी उन्हें देखने जाएंगे। उप चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में आएगी, कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए कहना अलग बात है लेकिन 15 अगस्त को मुख्यमंत्री के तौर पर हम ही झंडा फहराएंगे यह बिल्कुल अलग। इसीलिए बुजुर्ग सोचने समझने के बाद बोलने की बात कह गए हैं। क्या ऐसे ही जुमलों के सहारे कांग्रेस ‘रिटर्न’ का सपना देख रही है।
0 अपनी ‘छवि’ को लेकर सतर्क ‘शिवराज’….
– विधानसभा चुनाव में शिकस्त खाने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी छवि को लेकर खासे सतर्क हैं। जनता के बीच मेहनत करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन अच्छी ‘छवि’ का मैसेज न जाने से उन्हें विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा। खुद के कामकाज से छवि बनती-बिगड़ती है, पर मुख्य भूमिका में जनसंपर्क विभाग भी होता है। इसीलिए मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार शिवराज ने जनसंपर्क विभाग किसी मंत्री को न देकर अपने पास रखा है। अपने नजदीकी रिश्तेदार आइपीएस आशुतोष प्रताप सिंह को डीपीआर बनाया है। विभाग का प्रमुख सचिव शिवशेखर शुक्ला को बनाया गया है। शुक्ला की इमेज विवाद रहित साफ-सुथरा काम करने वाले अफसर की है। जनसंपर्क आयुक्त का दायित्व सुदामा खेड़े के पास है। वे भोपाल, सीहोर में कलेक्टर रहे हैं और शिवराज के खास अफसरों में शुमार हैं। जनसंपर्क की मोर्चाबंदी के साथ शिवराज ने काम की अपनी शैली में भी बदलाव किया है। छवि की चिंता के कारण बागियों की मदद से सरकार चलाने के बावजूद गंभीर घटनाओं पर तत्काल निर्णय लेने लगे हैं। छवि में बदलाव का यह अभियान कितना सफल होगा, यह वक्त बताएगा।
0 कमलनाथ अब ‘कृष्ण’ के भक्त ‘अर्जुन’….
– कमलनाथ के हिंदुत्व कार्ड ने भाजपा की नींद उड़ा रखी है। यह कार्ड खेलने पर कांग्रेस भाजपा को ढोंगी करार देती रही है। अब कमलनाथ हिंदुत्व और धर्म की राजनीति कर रहे हैं और भाजपा उन्हें ढोंगी ठहराने में लगी है। नाथ का तीर निशाने पर लग रहा है। वे चाहते हैं कि धर्म-कर्म-हिंदुत्व के मामले में भाजपा उनका विरोध करे। कमलनाथ का एक ताजा पोस्टर इस समय बहस का मुद्दा है। इसमें कमलनाथ को ‘कृष्ण’ के सामने ‘अर्जुन’ के रूप में दिखाया गया है। पोस्टर देखते ही पूरी भाजपा तिलमिला कर कमलनाथ पर टूट पड़ी। कैलाश विजयवर्गीय एवं नरोत्तम मिश्रा ने व्यंग बाण छोड़े। इससे पहले राम मंदिर भूमि पूजन के दौरान कमलनाथ भगवा चोले में नजर आए थे। भाजपा तब भी हैरान थी। मुख्यमंत्री रहते भी कमलनाथ ने गौशालाओं के निर्माण, राम वन गमन पथ, ओमकारेश्वर-महाकाल मंदिर परिसर के विकास, कन्यादान योजना की राशि, पुजारियों का मानदेय बढ़ाने जैसे कामों के जरिए हिंदुओं में अपनी जगह बनाई है। छिंदवाड़ा में बड़ी हनुमान प्रतिमा स्थापित कराने के बाद वे हनुमान भक्त के तौर पर चर्चित हैं। भाजपा को समझ नहीं आ रहा कि वह कमलनाथ के इस कार्ड का कैसे मुकाबला करे।
0 ‘शिव’ के आगे कमजोर पड़ते ‘कैलाश’….
– अमित शाह के खास होने के बावजूद भाजपा के एक दिग्गज कैलाश विजयवर्गीय पार्टी में कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं। शुरुआत उनके विधायक बेटे आकाश विजयवर्गीय के ‘बल्ला कांड’ को माना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न आकाश के रवैए को पसंद किया था और न ही कैलाश की बयानबाजी को। इसीलिए पहले सरकार गिराने-बनाने की भूमिका से वे अलग रहे, मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो इंदौर से उनका एक भी समर्थक मंत्री नहीं बन सका। बाजी दूसरे गुट की ऊषा ठाकुर मार ले गर्इं। रक्षाबंधन के दौरान बाजार खोलने को लेकर कैलाश ने गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से बात की। नरोत्तम ने कहा कि वे कैलाश की मांग पर मुख्यमंत्री से बात करेंगे। मुख्यमंत्री चौहान ने रक्षाबंधन पर इंदौर में राखी, मिठाई की दुकाने खोलने का निर्णय लिया, लेकिन सांसद शंकर लालवानी के आग्रह पर। लालवानी ने सार्वजनिक तौर पर बयान जारी कर इसका श्रेय लिया। इतना ही नहीं प्रदेश में कैलाश को उप चुनाव में एक सीट सांवेर तक सीमित कर दिया गया है। वजह केंद्रीय नेतृत्व की नाराजगी हो या कोई अन्य कारण, पर कैलाश प्रदेश की राजनीति में कमजोर पड़ते, सिमटते दिखाई पड़ रहे हैं।
0 कम्प्यूटर बाबा को ही नसीहत क्यों?….
– कभी भाजपा के हमसफर रहे कम्प्यूटर बाबा विधानसभा चुनाव के समय से कांग्रेस के साथ हैं। उन्होंने भाजपा के खिलाफ झंडा उठा रखा है और उप चुनावों से पहले ‘लोकतंत्र बचाओ यात्रा’ निकाल रहे हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने चंबल-ग्वालियर अंचल से की है। इस अंचल की सर्वाधिक 16 विधानसभा सीटों के लिए उप चुनाव होना है। कंम्प्यूटर बाबा के अभियान पर शिवराज सरकार के एक ताकतवर मंत्री की टिप्पणी थी कि यदि बाबा को राजनीति ही करना है तो संत का चोला उतार दें फिर मैदान में आएं। सवाल यह है कि मंत्री जी ने संत का चोला उतारने की नसीहत सिर्फ कम्प्यूटर बाबा को ही क्यों दी? उन्हें भाजपा में सक्रिय भोपाल की सांसद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सहित वे तमाम संत क्यों नजर नहीं आए, जो भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं और कांग्रेस सहित दूसरे दलों की आलोचना करते हैं। क्या मंत्री जी इन्हें संत का चोला उतार कर राजनीति करने की नसीहत देने की हिम्मत जुटा सकते हैं। यदि नहीं तो कम्प्यूटर बाबा को ही क्यों? ऐसे बयानों के कारण ही अलग चाल, चरित्र और चहरे की बात करने वाली भाजपा राजनीति के उसी दलदल में दिखाई पड़ती है, जहां कभी कांग्रेस हुआ करती थी।
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