इंदौर महापौर के लिए संघ परिवार से नया नाम

इंदौर महापौर के लिए
संघ परिवार से नया नाम

इंदौर।भाजपा के गलियारों से अत्यंत विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात एक समाचार बड़ी तेजी से वायरल हो रहा है जिसकी पुष्टि भी दबे स्वर में संघ कर रहा है। मध्य प्रदेश में इन दिनों नगर निकायों के चुनाव की सरगर्मी बड़ी तेजी से बढ़ी है। मध्यप्रदेश में ग्वालियर, भोपाल, इंदौर जैसे महानगरों में महापौर के पद सांसदों से कम वजनदार नहीं होते। यही कारण है कि पिछली बार से एक नई परंपरा प्रारंभ हुई है कि इन महानगरों के महापौर पद हेतु प्रस्तावित उम्मीद्वारों के पैनल दिल्ली लाए जाते हैं। विशेषकर अमित शाह अपनी विश्वस्त सर्वे कंपनियों से इन व्यक्तियों को लेकर सर्वेक्षण करवाती है। इन दिनों मध्यप्रदेश का इंदौर महानगर अत्यधिक चर्चा में है। वैसे तो वहां महापौर के पद के लिए संघ की पहली पसंद के रूप में एक चिकित्सक का नाम बड़ी तेजी से उभरा है , किंतु अनायास देखते ही देखते पासा पलटा और संघ से ही एक और नाम उभरकर सामने आया। यह नाम केवल मीडिया के लिए ही नहीं बल्कि भाजपा के लिए भी चौंकाने वाला है। इन दिनों मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के पद पर संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता लगातार पूरे मध्यप्रदेश में सक्रियता से काम कर रहे हैं। उनकी कार्यशैली इतनी प्रभावी है कि मध्य प्रदेश के सत्ता गलियारों से लेकर अधिकारियों तक उनके नाम का दबदबा राजधानी में चल रहा है। एकदम ईमानदार छवि के और मर्यादित आचरण वाले डॉ. विकास दवे मध्य प्रदेश के संगठन मंत्री श्री हितानंद शर्मा के अभिन्न मित्रों में से गिने जाते हैं। कहते हैं कि जैसे ही सर्वे एजेंसियों ने इस नए नाम की जनसामान्य में उज्जवल छवि को लेकर अपने आंकड़े रखे तो राष्ट्रीय संगठन मंत्री के भी कान खड़े हो गए। तुरंत प्रदेश के पदाधिकारियों से संपर्क साधा गया। कहा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में डॉ दवे लंबे समय तक काम करते रहे। बाद में बच्चों की पत्रिका देवपुत्र के संपादक रहे डॉ.दवे इन दिनों साहित्यकारों के ही नहीं बल्कि गैर साहित्य जगत के भी आंख के तारे बनकर उभरे। इतना ही नहीं तो इन दिनों वे मध्य प्रदेश शासन के नीति निर्धारक संस्थानों के बड़े अधिकारियों के भी चहेते बनकर उभरे हैं। चुनावी रणनीति बनाने वाले प्रमुख क्षत्रपों के साथ उनकी जबरदस्त ट्यूनिंग बनी है। शिवराज सरकार की पुनरावृत्ति के लिए संघ कोटे से जो योजनाएं बननी है उन योजनाओं को वे पूरे समय मॉनिटर कर रहे हैं। इतने सारे कारणों के चलते दिल्ली तक उनकी ख्याति पहुंची और अचानक ही उनका नाम महापौर के लिए उभरकर आया।
यूं तो संघ को डॉ. निशांत खरे के अतिरिक्त कोई दूसरा नाम पसंद नहीं आ रहा था किंतु संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत चर्चा में कहते हैं कि यदि संघ को सबसे पहले डॉ. विकास दवे के विषय में इस प्रकार का विचार आ जाता तो निश्चय ही हम किसी और नाम पर विचार ही नहीं करते।वास्तव में हमें कभी उनको लेकर यह विचार ही नहीं आया कि हम अपने एक श्रेष्ठ कार्यकर्ता को उनकी रुचि के विरुद्ध राजनीति के क्षेत्र में भेज दें। इससे पूर्व भी साहित्य अकादमी के निदेशक पद पर जब उन्हें मंत्री का दर्जा देने की बात हुई तब भी उन्होंने पूरी विनम्रता से यह कहकर उस दर्जे को नकारा था कि मैं संघ के कार्यकर्ता के नाते ही अपनी पहचान चाहता हूं। मंत्री का दर्जा मिलने के बाद मेरी पहचान राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में बन जाएगी और संघ की नीतियों में राजनीति क्षेत्र से पुनः संघ क्षेत्र में वापसी थोड़ी कठिन मानी जाती है।
विकास दवे के खाते में डायरेक्ट संघ वर्किंग के लगभग 4 दशक के कार्य अनुभव के कारण इस समय पूरे इंदौर नगर की भाजपा के प्रथम क्रम से लेकर अंतिम क्रम तक के कार्यकर्ताओं में डॉ.दवे के नाम को लेकर जितनी सकारात्मकता दिखाई दे रही है इतनी संघ के ही दूसरे नाम को लेकर दिखाई नहीं देती। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन लगातार कई मंचों से डॉक्टर दवे की प्रशंसा के कसीदे काढती रही हैं। वर्तमान सांसद शंकर लालवानी अनेक कामों में उनसे सीधे संपर्क करके सलाह लेते हैं। क्षेत्र क्रमांक 1 से लेकर 5 तक के पूर्व और वर्तमान विधायक सहित राउ, देपालपुर और सांवेर तक के दिग्गज नेताओं से उनके अत्यंत आत्मीय संबंध हैं। जिलाध्यक्ष राजेश सोनकर उन्हें बड़े भाई की तरह मानते हैं तो नगर अध्यक्ष गौरव रणदिवे उन्हें अपना प्रेरणा पुरुष कहते नहीं चूकते।
संभवतः इस एक नाम के अतिरिक्त ऐसा कोई दूसरा नाम संघ और भाजपा के पास नहीं है जिस पर आकर भाजपा के सारे शक्ति केंद्र आकर समर्पण कर देते हैं।
संघ और भाजपा की शक्ति इन दिनों बिखरी बिखरी सी नजर आने लगी थी किंतु एक छोटे समाचार पत्र के द्वारा इस सूचना को लिक कर दिए जाने के बाद से एक सकारात्मक वातावरण बना और ऐसा लगने लगा है कि संघ और भाजपा मिलकर इस नाम पर सहमति बना लेंगे। यदि ऐसा हो जाता है तो यह इंदौर की राजनीति के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन होगा। पूरे मध्यप्रदेश के साहित्य जगत के हजारों युवा साहित्यकार इस समाचार को सुनकर उत्साहित हैं। दबे छुपे स्वरों में यह सारे साहित्यकार यह कहने से नहीं चूक रहे कि यदि मौका आया तो मध्य प्रदेश के कोने-कोने से साहित्यकार आकर इंदौर की महापौर की कुर्सी को साहित्य की झोली में डालने से पीछे नहीं हटेंगे।
इस ख़बर के संदर्भ में जब डॉ. दवे से उनके विचार जानने का प्रयास किया तो उनका सपाट जवाब था- “मैं राजनीति में रुचि नहीं रखता और हमारा संगठन व्यक्ति की रुचि के अनुसार ही कार्य सौंपता है।”

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