
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त
त्रिगुणात्मक त्रैमूर्ती के रूप में अपने भक्तों को मानस के शब्द शुद्ध संकल्पों की पूर्ति करने वाले स्मरण मात्र से प्रसन्न हो आसन्न संकट को दूर कर देने वाले अत्रिऋषि अनुसूयानंदन श्री दत्तात्रेय परात्परगुरु है । श्री दत्तात्रेय और अयौनीसंभूत अवतार है ! सती अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने मार्गशीर्ष शुद्ध चतुर्दशी को पहुंचे ब्रह्मा विष्णु महेश को अपने तपयोग बल से शिशु रूप में परिवर्तित कर माता अनुसूया ने मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन त्रैमूर्ति को स्तनपान करवाया था ! चतुर्दशी को श्रीदत्त निर्गुण पादुका क्षेत्र गाणगापुर में तथा शेष जगहों पर पूर्णिमा के दिन श्रीदत्त जन्मोत्सव मनाया जाता हैं । श्री दत्तात्रेय अवधूत स्वरूप है और दिगंबर अवस्था इन्हें प्रिय है । सकल श्री विद्या के अधिष्ठाता एवं नाथ परंपरा का प्रादुर्भाव भी श्री दत्तात्रेय से ही है ! श्रीगुरु परंपरा के आदि पुरुष योगियों के आराध्य भी योगीजनवल्लभ श्रीगुरु दत्तात्रेय ही हैं । श्रीगुरु दत्तात्रेय के चित्र में उनके साथ खड़ी गाय कामधेनु है जो उनके भक्तों की अभीष्ट इच्छाओं की पूर्ति करती है ! उनके चरणों में बैठे हैं हुए चार श्वान चतुर्वेद तथा धर्म अर्थ काम मोक्ष के प्रतीक है ! साधना मार्ग के पथिकों के ध्यानमणि श्रीगुरु दत्तात्रेय ने अपने २४ गुरुओं के माध्यम से गुरु को “तत्व” रूप में निरूपित किया हैं ! अर्थात गुरु देव पदवी आसंदी ना होकर तत्व के रूप में बोध प्रदान करता हैं । चराचर में व्याप्त गुरु तत्व से हमें जो शिक्षा और ज्ञान मिलता है उसे विनम्रता पूर्वक सीख कर अपने आचरण में उतारने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए । श्री दत्त के २४ गुरुओं में पृथ्वी आकाश समुद्र छोटा बच्चा गणिका (वैश्या) भ्रमर हाथी आदि है । श्री दत्तात्रेय त्रिगुणात्मक अवतार है तथा श्री दत्तात्रेय के प्रथम अवतार के रूप में श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रभु (पीठापुर आंध्रप्रदेश) द्वितीय अवतार श्री नृसिंह सरस्वती स्वामी महाराज (कारंजा नृसिंहवाड़ी महाराष्ट्र) तथा कालांतर में अक्कलकोट श्री स्वामी समर्थ महाराज प्रतिष्ठित है ! श्री मनिकप्रभु को भी श्रीदत्त अवतार माना जाता हैं ! श्रीक्षेत्र गाणगापुर में श्रीदत्त की निर्गुण पादुका है एवं नृसिंहवाडी में मनोहर पादुका स्थापित है । श्रीगुरु परंपरा में गुरु के स्वरूप से अधिक पादुका पूजन एवं वंदन का महत्व है । आधुनिक कलियुग के कालखंड में योगीजनवल्लभ श्रीगुरु दत्तात्रेय का ध्यान आराधना उपासना तथा उनकी स्तुति शीघ्र फलदाई है । मायामय जगत के भ्रम को तोड़कर श्रीगुरु के नामस्मरण के माध्यम से हम अपने जीवन का ध्येय मार्ग बड़ी सुगमता से पार कर सकते हैं एवं मनःशांति तथा अक्षय समाधान धन को उनकी कृपा से प्राप्त कर सकते हैं । श्रीगुरु दत्तात्रेय की संपूर्ण जगत को पहचान करवाने वाले श्रीदत्त अंशावतारी श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य सद्गुरु श्री वासुदेवानंद सरस्वती (टेंबे)स्वामी महाराज ने अपनी दैवीय लेखनी के माध्यम से श्रीगुरु का स्तुति महामंत्र “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” जगत कल्याण के लिए सबके सामने प्रकट किया । श्री वासुदेवानंद सरस्वती (टेंबे) ने श्रीदत्त संप्रदाय को सामान्य जनमानस से जोड़ने के लिए वृहद वाङ्गमय रचना से श्रीगुरु के ग्रंथ स्तोत्र भजन एवं पद की रचना की । टेंबे स्वामी द्वारा रचित रचनाओं से श्रीगुरु दत्तात्रेय की स्तुति कर अलभ्य मानसिक शांति एवं चित्त की स्थिरता को सहज ही अनुभूत किया जा सकता है ।
आधुनिक समय में जहाँ सच्चे गुरु का मिलना देवदूर्लभ हैं तब ऐसे समय में अवधूत श्री दत्तात्रेय का अपने २४ गुरुओं के माध्यम से यह शिक्षण मार्ग प्रशस्त करता हैं कि तत्व का ध्यास कर हमें श्रीगुरुकृपा का पात्र बनने का यथासंभव प्रयत्न करतें रहना चाहिए ! श्रीगुरु दत्तात्रेय की कृपा से निःसंदेह कोई सद्गुरु हमें खोजकर अपना शिष्य बना ही लेगा अन्यथा श्रीगुरु दत्तात्रेय जीवन दर्शन को सहज सरल कर हमें एकनिष्ठ कर ही देंगे !
अवधूत श्री केशव वासुदेव श्रीगणेश दत्त सबके जीवन को आरोग्यमयी आनंदमयी सुखी समाधानी करें यही श्रीचरणों में प्रार्थना……..नीलानारायण !!!!!
श्रीचरणी रजांकित-
इदं दत्तं न मम
आनंद आनंद आनंद
श्री गुरुदेव दत्त