
हेडिंग पढ़कर आप चौंक गए होंगे, लेकिन ये सच है। मध्यप्रदेश में ऐसा ही हुआ है। ये अलग बात है कि सभी जेल प्रहरियों की पगार इतनी नहीं होती। ये सिर्फ एक जेल प्रहरी की तनख्वाह है। ये मामला जेल पीएफ घोटाले की जांच के दौरान सामने आया है।
अनुकंपा नियुक्ति पर नौकरी में दाखिल हुआ एक जेल प्रहरी देखते ही देखते इतना पावरफुल हो गया कि वो खुद अपनी तनख्वाह तय करने लगा। कायदे से उसकी सैलरी सिर्फ 35 हजार रुपए होनी चाहिए थी, लेकिन वो अपनी तनख्वाह और प्रमोशन खुद तय करता था। जब उसके आका पकड़े गए और जांच शुरू हुई तब पता चला कि ये प्रहरी तो मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री से भी ज्यादा तनख्वाह पाने लगा था।
अब आप सोच रहे होंगे कि इतने पैसे का उसने क्या किया? अब तक की पूछताछ में उसने ये बताया है कि उसने ये पैसे आईपीएल के सट्टे में गंवा दिए।
पोस्ट जेल प्रहरी, काम जेल अधीक्षक का
बात हो रही है उज्जैन के भैरवगढ़ जेल के पीएफ घोटाले की। इस घोटाले का सबसे छोटा प्यादा था जेल प्रहरी रिपुदमन। कहने को तो उसकी पोस्ट जेल प्रहरी की थी, लेकिन काम वो जेल अधीक्षक के नाम पर करता था। जेल अधीक्षक के डिजिटल दस्तखत का भी वो अपने हिसाब से इस्तेमाल करता था। जेल के किसी भी कर्मचारी के नाम से पीएफ विड्राॅल की एप्लीकेशन बनाकर देना और फिर उसकी मंजूरी लेकर रिइंबर्समेंट तक का सारा काम वो खुद करता था।
खुद को असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट मानने लगा था
ये पढ़कर आप समझ ही गए होंगे कि आखिर ये रिपुदमन चाहता क्या था? महज 12वीं क्लास तक पढ़ा ये जेल प्रहरी खुद को असिस्टेंट सुप्रीटेंडेंट मानने लगा था। काम भी वो सुप्रीटेंडेंट के ही करता था। वजह ये थी कि उसकी आका जेल सुप्रीटेंडेंट उषा राज ने उसे अपने डिजिटल सिग्नेचर दे रखे थे। जेल के हर काम का अप्रुवल रिपुदमन उसी सिग्नेचर से करता था।
इससे पहले वाले जेल अधीक्षकों का भी वो बेहद खास था। उन्हें महंगे उपहार देता था और उनकी जरूरतों का पूरा ख्याल रखता था। जेल के कर्मचारी रिपुदमन को सैल्यूट करते थे। जेल की किस बैरक में किसको क्या सेवाएं देना हैं, ये भी रिपुदमन तय करने लगा था। इसके लिए महंगे ठेके होते थे, इनके रेट भी वही तय करता था। ऊपर वालों को उनका हिस्सा तय वक्त पर मिल जाता था।
आगे आपको ये भी बताएंगे कि उज्जैन जेल में किस सर्विस के लिए कितना रेट तय था, लेकिन उससे पहले ये जानिए कि रिपुदमन की तनख्वाह कैसे-कैसे बढ़ती रही। अपनी तनख्वाह बढ़ाने का पहला प्रयोग कब किया?
पता चला कि अपनी पगार बढ़ा सकते हैं तो खुद करने लगा इंक्रीमेंट
साल 2016 में रिपुदमन की पगार 35000 प्रति माह थी। 2017-18 में किसी कर्मचारी के क्रेडेंशियल बदलने के लिए ट्रेजरी में बात की तो पता चला कि ये तो आप खुद कर सकेंगे।
इसी साल उसने पहला प्रयोग किया। दो कर्मचारियों के पीएफ खातों से 1.50 लाख रुपए निकालने का आवेदन किया। खुद ही मंजूर किया और रिइंबर्स भी। इसके लिए उसने उनके मोबाइल नंबर की जगह अपने नंबरों का इस्तेमाल किया। मतलब अकाउंट से रकम निकलने के बाद मैसेज भी उसके मोबाइल नंबरों पर ही आए।
अब उसे इस बात का भरोसा हो गया था कि वो जितने चाहे, उतने रुपए पीएफ अकाउंट से निकाल सकता है। जेल के अकाउंट से किसे कितनी तनख्वाह मिलनी है, ये भी वो खुद तय करने लगा। उसने सबसे पहले अपनी तनख्वाह खुद बढ़ाई।
सवाल ये है कि एक जेल प्रहरी की तनख्वाह 4.82 लाख कैसे
इसे समझने के लिए सरकारी सिस्टम में ट्रेजरी से लेकर अकाउंटिंग तक के सिस्टम को समझना होगा। दैनिक भास्कर ने ट्रेजरी के सीनियर अफसरों से इसे समझने की कोशिश की।
2017 से पहले मध्यप्रदेश में सेंट्रलाइज्ड फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम के माध्यम से वेतन और बिलों का भुगतान होता था। इसमें डीडीओ यानी जिला आहरण एवं संवितरण अधिकारी (कार्यालय प्रमुख) की ओर से बिल भेजे जाते थे, इसके बाद भुगतान होता था। जिन-जिन चीजों के बिल भेजे जाते थे, वो ट्रेजरी में वेरिफाई होते थे। ट्रेजरी वेरिफाई करके इसके चेक बैंक को भेजता था। बैंक से संबंधित बिल के अनुसार भुगतान होता था।
इस व्यवस्था में 2017 में बदलाव हुआ।
2017 में नया सिस्टम आया- आईएफएमआईएस (इंटिग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम)। इसमें सेंधमारी शुरू हुई।
इंटिग्रेटेड फाइनेंशियल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम में ट्रेजरी ऑफिसर के कई अधिकार सीधे डीडीओ यानी कार्यालय प्रमुख को दे दिए गए।
इसमें तीन स्तर हैं…
- क्रिएटर- यानी जो बिल क्रिएट करेगा।
- वेरिफायर- कार्यालय अधीक्षक से नीचे स्तर का अधिकारी, जो बिल या एप्लीकेशन को वेरिफाई करेगा।
- अप्रूवर- क्रिएटर ने क्या बिल जारी किया और वेरिफायर ने उसे किस आधार पर वेरिफाय किया, ये चेक करने के बाद अप्रूवर उसे अप्रूव करते हैं। कार्यालय प्रमुख ही अप्रूवर होते हैं। इन्हें ही डीडीओ कहा जाता है।
सबके अपने लॉगइन पॉसवर्ड हैं। अप्रुवर के डिजिटल सिग्नेचर हैं। व्यवस्था के तहत अप्रूवर अपने सिग्नेचर किसी अन्य को नहीं दे सकता, लेकिन उज्जैन जेल की अधीक्षक उषा राज ने रिपुदमन को अपने डिजिटल सिग्नेचर दे दिए। रिपुदमन ही यहां क्रिएटर हो गया, वही वेरिफायर हो गया।
यानी वो खुद ही बिल जनरेट करता था, उसे खुद ही वेरिफाई करता था और खुद ही अप्रूव करके अपने ही अकाउंट में भुगतान प्राप्त कर लेता था।
इसी सिस्टम में एक और सुविधा कार्यालय प्रमुख को मिली कि किसी एम्पलाई के क्रेडेंशियल यानी मोबाइल नंबर बदलने की सुविधा भी उसे ही मिल गई। पहले इसके लिए ट्रेजरी में आवेदन देना होता था।
इस व्यवस्था का फायदा उठाकर रिपुदमन ने 2017 में दो एम्पलाई के खाते में सेंधमारी की। उनकी ओर से खुद पीएफ विड्रॉल करने की एप्लीकेशन बनाई। खुद ही वेरिफाई करके अकाउंट और मोबाइल नंबर भी अपने दे दिए। उसने पहली बार 2017 में 1.50 लाख रुपए उनके पीएफ अकाउंट्स से अपने खाते में ट्रांसफर किए। इसके बाद ये सिलसिला चलता रहा।
इसी सिस्टम का फायदा उठाकर उसने 2017 से लेकर 2022 तक अपनी तनख्वाह 35 हजार रुपए से बढ़ाकर 4.82 लाख रुपए कर ली।
ऐसे खुला घोटाले का राज : एक खाते में सारा रुपया जाता देख माथा ठनका
फरवरी 2023 की बात है। उज्जैन में ट्रेजरी के अफसर रोज की तरह काम कर रहे थे। एक कर्मचारी जेल विभाग के पीएफ की राशि कर्मचारियों के खाते में ट्रांसफर कर रहा था। एक क्लेम देखकर अचानक कर्मचारी का माथा ठनक गया कि दो लोगों की राशि एक ही खाते में कैसे ट्रांसफर हो सकती है? उसने सोचा टाइपिंग एरर हो सकती है।
दस्तावेज मिलाए तो कर्मचारी का नाम अलग था, लेकिन बैंक खाता वही था। जब जांच की तो पता चला कि इसी खाते में जेल विभाग के कर्मचारियों की पीएफ राशि निकालकर जमा कराई जा रही है। उसने अपने सीनियर काे बताया और जांच के बाद सीनियर अफसर ने उज्जैन कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम को इसकी सूचना दी कि उज्जैन की भैरवगढ़ जेल में पीएफ घोटाला हो रहा है।
कलेक्टर ने जेल मुख्यालय में शिकायत कर जांच बैठा दी। इस बैंक खाते काे सीज कर एफआईआर की गई। जांच में एक-एक कर राज खुलते गए। अब तक करीब 20 करोड़ रुपए के हेरफेर की बात सामने आ रही है। शुरुआती जांच के अनुसार मुख्य आरोपी जेल का अकाउंटेंट रिपुदमन रघुवंशी ही है, जो जेल प्रहरी शैलेंद्र सिकरवार और जेल प्रहरी धर्मेंद्र लोधी के खातों में रुपया भेज कर बंटवारा कर लेता था। तीनों फरार हैं। जांच के बाद और आरोपी बढ़ सकते हैं।
12वीं पास रिपुदमन 5 साल से कर रहा था सेंधमारी
घोटाले का कर्ताधर्ता रिपुदमन रघुवंशी 12वीं कक्षा तक पढ़ा है। उसने गबन के इस पूरे काम को 2018 से लेकर फरवरी 2023 तक अंजाम दिया। भैरवगढ़ जेल में रिपुदमन रघुवंशी जेल प्रहरी है। काम क्लर्क का करता है। वह यहां विभागीय भविष्य निधि (डीपीएफ) का काम भी देखता था। रिपुदमन जेल के कर्मचारियों के पीएफ खाते से रुपया निकलवाने का फर्जी आवेदन देता था। आवेदन पर डीडीओ यानी जेल अधीक्षक की सहमति और साइन लेकर ट्रेजरी तक पहुंचाता था।
वह जिस भी कर्मचारी के खाते में सेंधमारी करता, सबसे पहले उसका मोबाइल नंबर बदलकर लैंडलाइन नंबर या अपना नंबर डाल देता था, ताकि आवेदन देने से लेकर पैसा निकलने की प्रोसेस का कोई मैसेज पीड़ित तक पहुंचे ही नहीं।
सफाईकर्मी का नंबर बदलना भूला तो कहा- फेक मैसेज है
रिपुदमन से भी गलती हुई और एक बार वह एक सफाईकर्मी का मोबाइल नंबर बदलना भूल गया था। सफाईकर्मी मोहन लाल करोसिया ने बताया कि 2021 में मेरे खाते से 10 लाख रुपए निकालने का मैसेज आया था। इस मैसेज को लेकर मैं अकाउंटेंट के पास गया। उसने बताया कि ये मैसेज फेक है, इस पर ध्यान मत दो। ऐसे ही मैसेज कुछ और साथियों को भी आए। उन्हें भी यही कहकर चलता कर दिया।
उन्होंने बताया कि जेल अधीक्षक उषा राज और भविष्य निधि का काम देखने वाला फरार बाबू रिपुदमन कर्मचारियों को प्रोविडेंट फंड की डिटेल तक नहीं देते थे। मुख्य आरोपी रिपुदमन रघुवंशी के पिता दिनेश रघुवंशी भी जेल प्रहरी थे। पिता की मौत के बाद 8 अगस्त 2011 को रिपुदमन को पिता के बदले नौकरी मिली थी।
पूरी सेंधमारी की प्रोसेस को ऐसे समझें…घोटाले के चार किरदार
जेल अधीक्षक उषा राज : ये घोटाले के केंद्र में हैं। इनके दस्तखत से ही राशि स्वीकृत होती है, फिर किसी खाते में ट्रांसफर होती है। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है, इसलिए इसमें डिजिटल दस्तखत की जरूरत होती है।
जेल अकाउंटेंट रिपुदमन रघुवंशी : ये आवेदन बनाता और कर्मचारियों के मोबाइल नंबर बदलता था ताकि उन तक मैसेज न जाए। पैसे अपने खाते या दूसरे दो आरोपियों के खाते में ट्रांसफर करता था।
जेल प्रहरी शैलेंद्र सिकरवार और धर्मेंद्र लोधी : इनके बैंक खाते में दूसरे कर्मचारियों का पैसा ट्रांसफर होता था। दोनों अकाउंटेंट रिपुदमन के साथी हैं।
नोट- ये सभी आरोपी जेल में हैं।