शहर की सौ साल पुरानी परंपरा पर कोरोना ने लगाया ग्रहण-प्रदीप जोशी

 

शहर की सौ साल पुरानी परंपरा पर कोरोना ने लगाया ग्रहण

पहले रंगपंचमी का रंग फीका किया अब झांकियों को बिगाड़ दिया

दंगे, कर्फ्यू, बरसात में भी नहीं टूटी इंदौर में झांकियों की परम्परा

प्रदीप जोशी
इंदौर। नयनाभिराम, झिलमिलाती, सितारों से सजी झांकियों के साथ इंदौर शहर का रतजगा इस साल नहीं होगा। कपड़ा मिलों के मजदूरों का पर्व माना जाता है अनंत चतुदर्शी उन्हीं के द्वारा तैयार की जाने वाली झांकियों को निहारने पूरा शहर सड़क पर रात भर जमा होता रहा है। कपड़ा मिलों के बुलंद इतिहास और सुनहरी तस्वीर से लेकर तालाबंदी तक सब कुछ बदल गया मगर मजदूरों की इस परम्परा में बदलाव नहीं आया। दंगे हुए कर्फ्यू लगा, बीते कुछ वर्षो में बरसात ने भी अडंगा डाला मगर झांकियों का कारवा देर से या कभी जल्दी निकला जरूर। झांकियों के सौ साल के इतिहास को पहली बार कोरोना संक्रमण का ग्रहण लगा है। कोरोना संक्रमण का शिकार होने वाली यह शहर की दुसरी परम्परा है। इससे पहले संक्रमण का वायरस रंगपंचमी के रंग को फीका कर चुका है। यह सिर्फ शहर का सांस्कृतिक पर्व ही नहीं है। एक रात के लिए हर खास ओ आम को इंतजार होता है। मिलों के मजदूरों को अपने दर्द को दिखाने का मौका सिर्फ इसी दिन मिलता है। रतजगे के इस महापर्व से कई छोटे छोटे दुकानदारों की आस जुड़ी होती है। संक्रमण फैलने का खतरा है लिहाजा जलसे की इजाजत नहीं दी जा सकती पर उम्मीद की जाना चाहिए कि परम्परा फिर आबाद होगी और निरंतर भी रहेंगी।

बरसों बाद होगा ऐसा
अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश उत्सव का समापन होता है और इस दिन बप्पा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। कोरोना संकट काल के चलते 1 सितंबर शहर की सौ साल पुरानी गौरवशाली परम्परा टूटने जा रही है। जिला प्रशासन पहले ही क्लियर कर चुका है कि कोरोना के कारण इस साल झांकियां निकलना किसी भी स्तर पर संभव नही है। संभवतया पहली बार अनंत चतुदर्शी के दिन शहर की सड़कों पर सन्नाटा पसरा होगा।

ऐसा रहता है झांकियों का क्रम
खजराना गणेश मंदिर के बाद आईडीए, भंडारी मिल, इंदौर नगर निगम, कल्याण मिल, साईंनाथ सेवा समिति, कनकेश्वरी इन्फोटेक, नंदा नगर सहकारी समिति, स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी, मालवा मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल, हुकुमचंद मिल, जैन समाज सामाजिक संगठन, जय हरसिद्धि मां सेवा समिति, मुस्कान ग्रुप और श्री शास्त्री कॉर्नर नवयुवक मंडल की झांकियां शामिल रहती है।

कई बार परंपरा टूटने की नौबत आई
बीते एक दशक में ऐसे कई मौके आए जब शहर की इस ऐतिहासिक परम्परा  टूट जाती मगर हर बार मजदूरों, शहर की जनता और जनप्रतिनिधियों ने बात संभाल ली। नब्बे के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान शहर कई दफा दंगों की चपेट में फंसा मगर झांकियों की परम्परा कायम रही। इसी प्रकार 2008, 2009, 2011, 2012, 2014, 2015 और 2018 में अनंत चतुर्दशी पर अच्छा पानी बरसा, फिर भी झांकियां निकलीं और लोग उत्साह के साथ मौजूद रहे।

बैरोजगारी का दंश झेल कर भी निभा रहे परम्परा
इंदौर में कपड़ा मिलों का इतिहास काफी बुलंद रहा है और मिल मजदूर काफी समृध्दशाली भी रहे थे। बीते तीन दशक में सब कुछ बर्बाद होता गया। शहर में सबसे पहले तालाबंदी की शिकार होप मिल हुई थी। इस मिल के बेरोजगार हुए श्रमिकों को भुगतान नहीं मिला और मिल की जमीन का भी बंटवारा हो गया। इसके बाद 12 दिसंबर 1991 को हुकमचंद मिल बंद हो गई। देश की सबसे ख्यात मिल के बंद होने का हजारों पर गहरा असर हुआ। मिल से जुड़े सात हजार से ज्यादा श्रमिकों के घर अंधेरा छा गया। अपने हक की इस लड़ाई में अब तक लगभग 2000 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो चुकी है। कुछ यही हाल एनटीसी की मिलों के भी हुए हैं। बैरोजगारी का दंश झेल कर भी मिल मजदूर अपनी परम्परा को पूरे उत्साह के साथ जिंदा रखे हुए है।

आओं जाने जलसे का इतिहास –
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. नागेंद्र आजाद द्वारा लिखे गए इतिहास से जानकारी मिलती है कि शहर में झांकी निकालने की परम्परा 1924 से शुरू हुई। यह झांकी हुकमचंद मिल की थी जिसे तत्कालीन मैनेजर पंत वैद्य साहब ने निकवाया था। गणेश विसर्जन के इस पहले जुलूस में केवल 4 गैस बत्ती, 2 बैंड पार्टी और 2 बग्घियां शामिल थीं। यह भी लोगों के लिए कम रोमांचकारी नहीं था। ढोल-मंजीरे शंख-घड़ियाल बजाते मजदूरों के साथ शहर के बाशिंदे भी उत्साह के साथ इस जलसे में शामिल रहे। इस आयोजन में तभी से हर धर्म समाज की भागीदारी शुरू हो गई थी।

झांकियों के संबंध में कुछ खास जानकारी –
– 1927 में राजकुमार मिल की पहली बार निकली झांकी में मैनेजर श्री अय्यर ने खास रुचि ली। विद्युत बल्बों से सजी गणेश प्रतिमा को देखने शहर उमड़ पड़ा था।
– स्व. मिश्रीलाल वर्मा ने इसी मिल के लिए 1946 में झांकी का निर्माण किया था। पांच फुट लम्बे मूषक पर सवार गणेशजी और मूषक की विद्युत बल्ब से चमकी आंखों ने जनता को रोमांचित कर दिया।
– स्व. वर्मा ने 1947 में मालवा मिल की 25 फुट लंबी झांकी बनाई थी। बैलगाड़ी में बनी इस झांकी में कमल के फूल के बीच गणेश प्रतिमा थी। असली चूहे प्रतिमा के पास प्रसाद खा रहे थे।
– आजादी के बाद वीवी द्रविड़, रामसिंह भाई वर्मा, गंगाराम तिवारी जैसे नेताओं का वर्चस्व बढ़ा और इंटक के
प्रभाव में लगातार झांकियों में आधुनिक प्रयोग होते रहे।
– आजादी के बाद निकली पहली झांकी राष्ट्रीय थी। देश प्रेम की भावना से भरी इस झांकी में महात्मा गांधी, पं नेहरू, मौलाना आजाद, सरदार पटेल के बडेÞ-बड़े चित्र लगाए गए थे।
– वर्मा ने इसी वर्ष स्वदेशी मिल की झांकी बनाई। बीस फीट लंबा चलित हंस रथ ट्राली पर बनाया। हंस रथ के आगे प्लायवुड के घोड़े जुते हुए थे। पं. नेहरू को रथ चलाते हुए दिखाया गया था।
– इसी दौर में रूपचंद पंजाबी भी सक्रिय हो गए। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में अनेक विषयों पर जनता को नए नए रूप देखने को मिले। वर्मा और पंजाबी झांकी सम्राट के रूप में विख्यात हो गए।

संदर्भ : स्व नागेंद्र आजाद जी के दस्तावेजों से

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