
प्राचीन काल से ही हमारे देव ऋषि मुनियो ने गौग्रास के साथ साथ कौओ के लिए भी ग्रास अर्थात श्राद्ध पक्ष के भोग की मोहन खीर में उनकी भी हिस्सेदारी को स्थान दिया है।
क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे की कलम को लगाया हैं? या फिर किसी को लगाते हुए देखा है? और क्या पीपल या बड़ के बीजो की ख़रीद फरोख्त करते देखा है ?
जी हाँ इसका जवाब है नहीं….
क्योंकि बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करे परंतु वह लगेगी नहीं ।
इसका वैज्ञानिक कारण प्रकृति/कुदरत ने इन दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए कुछ अलग ही विशेष व्यवस्था कर रखी है।
इन दोनों वृक्षों के फलो को कौवे बड़े चाव से खाते हैं जिस से उनके पेट में ही बीज की प्रॉसेसिंग प्रारम्भ हो जाती हैं तथा तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं। उसके पश्चात कौअे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों प्रकार के विशाल वृक्ष उगते हैं।
पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) छोड़ता है स्वयं योगेश्वर कृष्ण ने कहा है कि मैं वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूँ। इसके अतिरिक्त बरगद के भी औषधि गुण अपरम्पार है।
अतः यह दोनों वृक्षों के प्रसार का सशक्त सम्वाहक कौवे ही हैं ।इसलिए ऋषिमुनियो ने कौवे के नवजात बच्चों को जीवन देने के लिए एवं वृक्षों के जीवन के लिए आपस में सहजीवता स्थापित की होगी ।और यह होगा कैसे? इसके लिए चुकि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है।
तो इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है इसलिए ऋषि मुनियों ने श्राद्ध पक्ष में कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार खिरान्न की व्यवस्था कर दी।
इसके फलस्वरूप कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण स्वतः हो गया……
इसलिए बिना दिमाग को दौड़ाए श्राघ्द करना प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।
हमें सदेव घ्यान रखना चाहिए कि जब भी बरगद और पीपल के पेड़ को हम देखते है तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हमारे लिए बहुमूल्य ऑक्सिजन वातावरण को शुद्ध कर, औषधि प्रदान कर रहे हैं।
इस प्रकार हमारे सनातन धर्म में प्रचलित श्राद्ध महापर्व का हमारे जीवन और पर्यावरण के बीच परस्पर वैज्ञानिक़ता के आधार पर अनूठा सम्बन्ध प्रकट होता हैं।
– श्रीमती स्नेहा साकेत