मेनका गांधी के बयान के बाद विवादों में आया इस्कान, जाने किसने की स्‍थापना और इसका इतिहास

भारतीय जनता पार्टी की सांसद मेनका गांधी ने इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्‍णा कॉन्‍शसनेस यानी इस्‍कॉन पर गंभीर आरोप लगाए हैं. इसके बाद से ये धार्मिक संस्‍था विवादों में घिर गई है. मेनका गांधी ने इस्‍कॉन को देश में ‘सबसे बड़ा धोखा’ बताया है. वह यहीं नहीं रुकीं. उन्‍होंने आरोप लगाया है कि संस्‍था अपनी गौशालाओं में पल रही गायों को कसाइयों को बेच देती है. जवाब में इस्‍कॉन ने लगाए गए आरोपों को झूठा और बेबुनियाद बताया है. इस्‍कॉन का कहना है कि संस्‍था पांच दशक से सनातन की सेवा कर रही है. बता दें कि 2016 में द्वारिका और ज्‍योतिष पीठ के शंकराचार्य स्‍वामी स्‍वरूपानंद सरस्‍वती भी इस्‍कॉन पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद मेनका गांधी पशु संरक्षण के मुद्दों को लेकर लगातार मुखर रहती हैं. एक वायरल वीडियो में वह कहती हुई दिखाई दे रही हैं कि इस्कॉन गौशालाओं के नाम पर पहले जमीन हासिल करता है. फिर सरकार से लाभ हासिल करता है. बाद में गौशालाओं से गायों को कसाइयों को बेच देता है. उन्‍होंने बताया कि वह आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में इस्‍कॉन की गौशाला गई थीं, जहां उन्‍हें एक भी सूखी गाय नजर नहीं आई. दूसरे शब्‍दों में कहें तो उन्‍हें एक भी ऐसी गाय नहीं मिली, जो दूध ना देती हो. मेनका गांधी वीडियो में कह रही हैं, ‘इसका सीधा मतलब है कि इस्‍कॉन सूखी गायों को बेच देता है. शायद किसी ने इतने मवेशी कसाइयों को बेचे होंगे, जितने इस्‍कॉन ने बेचे हैं.

इस्‍कॉन ने मेनका के आरोपों पर दी सफाई

इस्कॉन के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता युधिष्ठिर गोविंदा दास ने मेनका गांधी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक संस्था भारत ही नहीं दुनियाभर में गायों और बैलों की सुरक्षा में सबसे आगे रही है. उन्होंने कहा कि गायों और बैलों की सेवा उनके जीवनभर की जाती है. उन्हें कसाइयों को नहीं बेचा जाता है. मेनका गांधी का आरोप पूरी तरह से गलत है. उन्‍होंने बताया कि इस्कॉन ने कई ऐसे देशों में गायों को बचाने का अभियान चला रखा है, जहां गोमांस मुख्य आहार है. मेनका गांधी पशु अधिकार कार्यकर्ता और इस्कॉन की शुभचिंतक हैं. लिहाजा, हम उनके ऐसे बयानों से आश्चर्य में हैं.

शंकाराचार्य स्‍वरूपानंद के क्‍या थे आरोप

द्वारिका और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस्कॉन मंदिरों को कमाई का अड्डा बताया था. उन्होंने कहा था कि इस्कॉन के मंदिरों से चढ़ावे की रकम अमेरिका भेज दी जाती है, क्‍योंकि इस्कॉन अमेरिका में पंजीकृत है. उन्‍होंने आरोप लगाया था कि इस्कॉन मंदिर अमेरिका की साजिश हैं. इन मंदिरों में कृष्ण भक्ति की आड़ में धर्मांतरण कराया जाता है. तब उन्‍होंने केंद्र से इस्कॉन मंदिरों की जांच कराने की मांग की. साथ ही लोगों से इस्कॉन के बजाय कृष्ण मंदिर में ही पूजा-अर्चना करने की अपील की थी. साथ ही उन्‍होंने सवाल उठाया कि इस्कॉन मंदिर झारखंड, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के बजाय उत्तर भारत में ही क्यों बनाए जा रहे हैं? उनका कहना था कि ईसाई या ज्‍यादा गैर हिंदू वाली जगह पर इस्कॉन मंदिर नहीं बनते.

किसने की थी इस्‍कॉन की स्‍थापना?

इस्कॉन मंदिर की स्थापना श्रीमूर्ति श्री अभयचरणारविन्द भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क सिटी में की थी. इस्‍कॉन का हेडक्‍वार्टर अमेरिका के न्‍यूयॉर्क शहर में ही है. स्वामी प्रभुपाद ने पूरी दुनिया में भगवान कृष्ण के संदेश को पहुंचाने के लिए इस्‍कॉन की स्थापना की थी. उन्होंने 55 साल की उम्र में संन्यास लेकर पूरी दुनिया में ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का प्रचार किया. इस्कॉन के दुनिया भर में सैकड़ों मंदिर और लाखों भक्त हैं. आंकड़ों के मुताबिक, इस्कॉन के दुनियाभर में 1,000 से ज्‍यादा केंद्र हैं. अकेले भारत में इसके 400 केंद्र हैं. यहां तक कि पाकिस्तान में भी इस्कॉन के 12 मंदिर हैं.

धर्म गुरु बनने से पहले क्‍या थे प्रभुपाद

धर्म गुरु बनने से पहले भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद आयुर्वेदिक दवाएं बनाते थे. इसलिए वह अक्सर झांसी के आयुर्वेदिक कॉलेज जाते थे. झांसी के दो लोग उनके अनुयायी भी हो गए. इसी दौरान स्वामी प्रभुपाद की नजर झांसी के आंतियां तालाब के सामने बने राधा बाई स्मारक पर गई. स्मारक पर कृष्ण मंत्र लिखा था. स्वामी प्रभुपाद ने अपने दोनों अनुयायियों से कहा कि हम यहां कृष्ण भक्ति की संस्था बनाना चाहते हैं. स्वामी प्रभुपाद ने शुरुआत में इस्‍कॉन का नाम ‘भक्तों का संघ’ रखा. इसके लिए उन्होंने उस समय के अखबारों में विज्ञापन भी दिया था, जिसमें कहा गया कि दुनियाभर में भगवद् गीता के संदेश को फैलाने के लिए शिक्षित युवाओं की जरूरत है. उनकी यात्रा, भोजन और कपड़ों का खर्च संस्था उठाएगी.

…तो झांसी में होती इस्‍कॉन की स्‍थापना

स्वामी प्रभुपाद ने 1957 में इस्‍कॉन की स्थापना करने की योजना बनाई, लेकिन उनके ही अनुयायियों और कुछ नेताओं ने संस्‍था की जमीन को हड़प लिया. लिहाजा, झांसी में इस्कॉन की स्थापना नहीं हो सकी. फिर स्वामी प्रभुपाद वृंदावन में 16 साल रहे. इसके बाद वह अमेरिका चले गए. उन्‍होंने न्‍यूयॉर्क शहर में 13 जुलाई 1966 को इस्कॉन की विधिवत स्थापना की. शुरुआत में उन्होंने समाज से बहिष्‍कृत अमेरिकी हिप्पियों को इस्‍कॉन से जोड़ा. इस्कॉन के जरिये इन हिप्पियों को भगवद् गीता का अर्थ समझाया गया. आज पूरी दुनिया में लाखों लोग इस्कॉन के अनुयायी हैं.

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