आइए आज कबीर दास जी के दोहों के साथ होली त्यौहार के उपलक्ष्य में अखबार के अवकाश पर सुप्रभात करते हैं!

आइए आज कबीर दास जी के दोहों के साथ होली त्यौहार के उपलक्ष्य में अखबार के अवकाश पर सुप्रभात करते हैं।

— पाणी ही तैं पातला, धूवां हीं तैं झींण।

पवनां बेगि उतावला, सो दोस्त कबीरै कीन्ह॥

जो जल से भी अधिक पतला (सूक्ष्म) है और धुएँ से भी झीना है और जो पवन के वेग से भी अधिक गतिमान है। ऐसे रूप वाले सूक्ष्म उन्मन को कबीर ने अपना मित्र बनाया है।

— नर-नारी सब नरक है, जब लग देह सकाम।

कहै कबीर ते राम के, जैं सुमिरैं निहकाम॥

जब तक यह शरीर काम भावना से युक्त है तब तक समस्त नर-नारी नरक स्वरूप हैं। किंतु जो काम रहित होकर परमात्मा का स्मरण करते हैं वे परमात्मा के वास्तविक भक्त हैं।

-पाणी केरा बुदबुदा, इसी हमारी जाति।

एक दिनाँ छिप जाँहिगे, तारे ज्यूं परभाति॥

यह मानव जाति तो पानी के बुलबुले के समान है। यह एक दिन उसी प्रकार छिप (नष्ट) जाएगी, जैसे ऊषा-काल में आकाश में तारे छिप जाते हैं।

-परनारी पर सुंदरी, बिरला बंचै कोइ।

खातां मीठी खाँड़ सी, अंति कालि विष होइ॥

पराई स्त्री तथा पराई सुंदरियों से कोई बिरला ही बच पाता है। यह खाते (उपभोग करते) समय खाँड़ के समान मीठी (आनंददायी) अवश्य लगती है किंतु अंततः वह विष जैसी हो जाती है

– पात झरंता यों कहै, सुनि तरवर बनराइ।

अब के बिछुड़े ना मिलैं, कहुँ दूर पड़ैंगे जाइ॥

पेड़ से गिरता हुआ पत्ता कहता है कि बनराजि के वृक्ष अबकी बार बिछुड़कर फिर नहीं मिलेंगे, गिरकर कहीं दूर हो जाएँगे। जीवात्मा जहाँ जन्म लेती है दुबारा वहाँ उसका जन्म नहीं होता।

– पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।

एकै आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥

सारे संसारिक लोग पुस्तक पढ़ते-पढ़ते मर गए कोई भी पंडित (वास्तविक ज्ञान रखने वाला) नहीं हो सका। परंतु जो अपने प्रिय परमात्मा के नाम का एक ही अक्षर जपता है (या प्रेम का एक अक्षर पढ़ता है) वही सच्चा ज्ञानी होता है। वही परम तत्त्व का सच्चा पारखी होता है।

— प्रेम न खेतौं नीपजै, प्रेम न दृष्टि बिकाइ।

राजा परजा जिस रुचै, सिर दे सो ले जाइ॥

प्रेम किसी खेत में उत्पन्न नहीं होता और न वह किसी हाट (बाज़ार) में ही बिकता है। राजा हो अथवा प्रजा, जिस किसी को भी वह रुचिकर लगे वह अपना सिर देकर उसे ले जा सकता है।

— प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिलै न कोइ।

प्रेमी कूँ प्रेमी मिलै तब, सब विष अमृत होइ॥

परमात्मा के प्रेमी को मैं खोजता घूम रहा हूँ परंतु कोई भी प्रेमी नहीं मिलता है। यदि ईश्वर-प्रेमी को दूसरा ईश्वर-प्रेमी मिल जाता है तो विषय-वासना रूपी विष अमृत में परिणत हो जाता है।

– सब जग सूता नींद भरि, संत न आवै नींद।

काल खड़ा सिर ऊपरै, ज्यौं तौरणि आया बींद॥

सारा संसार नींद में सो रहा है किंतु संत लोग जागृत हैं। उन्हें काल का भय नहीं है, काल यद्यपि सिर के ऊपर खड़ा है किंतु संत को हर्ष है कि तोरण में दूल्हा खड़ा है। वह शीघ्र जीवात्मा रूपी दुल्हन को उसके असली घर लेकर जाएगा।

– साँई मेरा बाँणियाँ, सहजि करै व्यौपार।

बिन डाँडी बिन पालड़ै, तोलै सब संसार॥

परमात्मा व्यापारी है, वह सहज ही व्यापार करता है। वह बिना तराज़ू एवं बिना डाँड़ी पलड़े के ही सारे सांसार को तौलता है। अर्थात् वह समस्त जीवों के कर्मों का माप करके उन्हें तदनुसार गति देता है।

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