एमपी। जबलपुर में 240 करोड़ रुपए से ज्यादा फीस वसूलने वाले स्कूलों ने किताबों के कमीशन से भी कमाए करोड़ो रुपए, हर साल बदल देते हैं सिलेबस और राइटर – देखें VIDEO

जबलपुर के 240 करोड़ रुपए ज्यादा फीस वसूलने वाले 11 प्राइवेट स्कूलों ने किताबों के कमीशन से भी 100 करोड़ रुपए कमाए हैं। अधिकांश स्कूलों में तो फर्जी इंटरनेशनल स्टैंडर्ड नंबर ( ISBN) की किताबों को सिलेबस में शामिल कर लिया गया था।

ये कहानी अकेले जबलपुर की नहीं है। मध्यप्रदेश में स्कूलों की महंगी फीस ही नहीं कॉपी-किताबों से भी स्कूल संचालकों को मोटी कमाई होती है। इसका एक पूरा सिस्टम बना हुआ है। स्कूल संचालक ही तय करते हैं कि उनके यहां किस प्रकाशक की कौन सी पुस्तक पढ़ाई जाएगी।

सिलेबस में क्या बदलाव करने है? जरूरी न होते हुए भी हर साल बच्चों को ऐसी एक से दो पुस्तकें और कॉपी खरीदनी पड़ती हैं, जिसे पढ़ाया तक नहीं जाता। निजी स्कूलों की मनमानी के खिलाफ एक दशक से लड़ाई लड़ रहे पालक महासंघ ने 29 मई को अफसरों को आवेदन देकर सवाल उठाए हैं कि एनसीईआरटी की किताबें लागू करने में क्या परेशानी है?

जबलपुर में स्कूलों पर कार्रवाई करने वाले कलेक्टर दीपक सक्सेना, कुछ निजी प्रकाशक और एजुकेशन सिस्टम से जुड़े लोगों से बात की, तो कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। आखिर कैसे 25 रुपए की पुस्तक आपको चार गुना अधिक कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है?

जबलपुर में इन दुकानदार व प्रकाशकों पर दर्ज हुई है FIR

 

अब जबलपुर के 9 स्कूलों के उदाहरण से समझें इस खेल को

जबलपुर कलेक्टर दीपक सक्सेना ने जब स्कूलों के खिलाफ जांच शुरू की तो पता चला कि 9 स्कूलों ने इस शैक्षणिक सत्र के लिए पहली से 12वीं तक की किताबों में 60 फीसदी बदलाव कर दिया।

सेंट एलॉयसिस पोलीपाथर स्कूल में पहली से 12वीं तक कुल 93 किताबें हैं और हर कक्षा की किताबें बदल दी, यानी 100 फीसदी।

वहीं स्टेमफील्ड स्कूल में कुल 116 किताबें हैं उनमें से 81 किताबों को बदल दिया गया। इस तरह बाकी स्कूलों ने नए शैक्षणिक सत्र के लिए किताबों में बदलाव किया।

स्कूलों ने पहली से 12 वीं तक की 60 फीसदी से ज्यादा किताबें बदल दीं

 

कमीशन का पूरा सिस्टम काम करता है

जबलपुर कलेक्टर दीपक सक्सेना के मुताबिक महंगी कॉपी-किताब की बड़ी वजह कमीशनखोरी है। इसके लिए एक पूरा सिस्टम बना हुआ है। सबसे अधिक कमीशन स्कूलों को मिलता है। इसके बाद पुस्तक विक्रेताओं को हिस्सा मिलता है। अंत में उस प्रकाशक को फायदा होता है, जिसके यहां से इस तरह की पुस्तकें छपवाई जाती हैं।

प्रकाशक इस तरह की पुस्तक स्कूल संचालक द्वारा तय किए गए दुकानदार को ही उपलब्ध करवाता है। 10 अप्रैल को जबलपुर में संगम बुक डिपो, चिल्ड्रन बुक डिपो और राधिका बुक पैलेस पर छापा मारकर फर्जी ISBN नंबर पर छपी किताबें जब्त की गई थीं। इसके बाद इन पुस्तक विक्रेताओं के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई।

दरअसल, इंटरनेशल स्टैंडर्ड बुक नंबर इस बात का मानक है कि पुस्तक की कीमत वाजिब है। जबकि, प्रकाशक इसी में खेल कर रहे थे। वे फर्जी आईएसबीएन नंबर डालकर किताबों की कीमत खुद के स्तर पर तय करते थे।

अतिरिक्त बढ़ाई गई कीमत का 50 प्रतिशत कमीशन सीधे स्कूलों को मिल रहा था। जबकि, 40 प्रतिशत कमीशन दुकानदारों को और 10 प्रतिशत कमीशन प्रकाशक के हिस्से में जा रहा था। इसका भार अभिभावकों पर पड़ता है। वे बच्चों के सुनहरे भविष्य की चिंता में अपनी दूसरी जरूरतों में कटौती कर बच्चों के लिए इन महंगी किताबों को खरीदने के लिए मजबूर होता है।

500 रु. की एक किताब में किसका कितना कमीशन

 

स्रोत- प्रकाशक, बुक स्टोर्स और एजेंटों से बातचीत

सिलेबस में बदलाव और नई पुस्तक लागू करने के पीछे की वजह भी समझिए

जबलपुर में जब कलेक्टर के निर्देश पर स्कूल संचालकों, प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेताओं के इस नेक्सस की जांच हुई तो इनका पूरा खेल उजागर हुआ। आज से 15-20 साल पहले की ही बात है, जब बड़े भाई की किताबों से ही छोटा भाई भी पढ़ लेता था।

मोहल्ले में कोई बच्चा जब अपनी क्लास पास कर आगे की क्लास में जाता था, तो उसकी पिछले क्लास वाली पुस्तकें किसी और को दे देता था। ठीक इसी तरह से वह दूसरे से अपनी क्लास की किताबें ले लेता था। मतलब एक ही सिलेबस व किताबें लागू होने से तब नई पुस्तकें खरीदने की इस तरह की मजबूरी नहीं थी।

इस नेक्सस ने इसका तोड़ सिलेबस में बदलाव करके और नई पुस्तकें लागू कर निकाला। अमूमन हर साल स्कूल संचालकों की ओर से हर क्लास की पुस्तकों में बदलाव कर दिया जाता है। किस प्रकाशक की और कौन सी पुस्तक चाहिए, इसकी बजाय स्कूलों की ओर से ये बताया जाता है कि एक चिह्नित दुकान पर ही पुस्तकें मिलेंगी।

ऐसी चिह्नित दुकानों पर पेरेंट्स को स्कूल का नाम और क्लास बताना पड़ती है। बुक स्टोर संचालक पहले से ही उस स्कूल और क्लास का सेट तैयार कर रखते हैं। कितनी किताबें होंगी और कितनी कॉपियां लगेंगी ये भी पहले से ही तय होता है।

अभिभावकों को सत्र खुलने पर तो प्रकाशकों को 6 महीने पहले मिल जाता है ऑर्डर

नए सत्र में किस स्कूल में कौन सा सिलेबस और नई पुस्तक पढ़ाई जाएगी, इसका निर्णय छह महीने पहले, यानी अक्टूबर-नवंबर में ही हो जाता है। स्कूलों की ओर से बाकायदा प्रकाशक को ऑर्डर देकर बता दिया जाता है। इसमें कमीशन के अनुसार किताबों की कीमत तय की जाती है।

स्कूल संचालक हर साल अपना कमीशन बढ़ाते रहते हैं। प्रकाशक ऐसी किताबों की छपाई कर फरवरी-मार्च में ही चिह्नित दुकानों पर उपलब्ध करा देते हैं। अभिभावकों को मार्च के आखिरी सप्ताह में इसकी जानकारी दी जाती है। इन प्रकाशकों से अधिकतर फर्जी आईएसबीएन नंबर वाली किताबों को तैयार करने का ऑर्डर दिया जाता है।

क्या होता है ISBN नंबर

अब जानिए जबलपुर में किस तरह से मिली फर्जी ISBN की किताबें

प्रशासन ने जब 11 स्कूलों में चल रही किताबों के ISBN नंबर की जांच की तो पता चला कि हर स्कूल में 50 फीसदी से ज्यादा किताबों पर फर्जी ISBN नंबर डला है। इनमें से 5 स्कूल तो ऐसे पाए गए जहां फर्जी ISBN नंबर की 100 फीसदी किताबें मिलीं। इनमें ज्ञानगंगा आर्किड, क्राइस्ट चर्च आईएससी, सेंट एलॉयसिस पोलीपाथर, क्राइस्ट चर्च डाइसेशन और सेंट एलॉयसिस सदर का नाम शामिल है। फर्जी ISBN नंबर की किताबों की वजह से इन स्कूलों को मोटा कमीशन मिल रहा था।

जबलपुर के 5 स्कूलों में फर्जी ISBN नंबर की 100 फीसदी किताबें

 

हर साल जबलपुर में 100 करोड़ रुपए के कमीशन का खेल समझिए

जबलपुर जिला प्रशासन ने सिर्फ 11 स्कूलों को कापी-किताबों से मिलने वाले कमीशन की जांच की तो पता चला कि इनकी जेब में हर साल 4.12 करोड़ से अधिक की राशि पहुंचती है। इन 11 स्कूलों में लगभग 15223 बच्चे पढ़ रहे हैं।

इनके द्वारा हर साल खरीदे गए कॉपी-किताब व स्टेशनरी से करोड़ों का कमीशन स्कूल संचालकों की जेब में जाता है। किताबों पर होने वाली 60 प्रतिशत मार्जिन से 3.47 करोड़ और स्टेशनरी से होने वाली मार्जिन 65 लाख रुपए हर साल कमीशन के तौर पर इन स्कूलों को मिल रहे थे।

जबलपुर में 1027 निजी स्कूल हैं। यहां लगभग 2.50 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं। इनका कमीशन ही हर साल 45 करोड़ रुपए होता है। इसके अलावा निजी प्रकाशक कमीशन के लिए किताबों का वजन बढ़ा देते हैं।

प्राइवेट स्कूलों को लेकर सरकार ने एक दिन में दो आदेश जारी किए

जबलपुर में हुई कार्रवाई के बाद सरकार के स्कूल शिक्षा विभाग ने 30 मई को अलग-अलग समय पर दो आदेश जारी किए। पहले आदेश में सभी जिलों के कलेक्टरों को मध्यप्रदेश निजी विद्यालय (फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम 2018 और नियम 2020 के प्रावधानों का पालन सख्ती से पालन करने के लिए कहा साथ ही जिले के सभी विद्यालयों की फीस और अन्य जानकारी पोर्टल पर दर्ज करने के भी निर्देश दिए।

कलेक्टरों से कहा गया कि वे ये सुनिश्चित करें कि सभी प्राइवेट स्कूल 8 जून तक जानकारी पोर्टल पर अपलोड कर दें। साथ ही इसी आदेश में ये भी लिखा कि फर्जी व डुप्लीकेट आईएसबीएन पाठ्य पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। इसे ठीक करने के लिए 30 जून 2024 तक विशेष अभियान चलाकर जांच कराएं। चिह्नित करें कि कितने विद्यालयों द्वारा किन कारणों से ऐसी गड़बड़ी की गई है? गड़बड़ी करने वाले प्रकाशक और बुक सेलर्स के विरुद्ध कार्रवाई भी की जाएं।

दूसरा आदेश कुछ ही देर बार जारी किया गया। इसमें जुर्माने के प्रावधान का जिक्र किया गया। आदेश में लिखा कि पोर्टल पर फीस की डिटेल अपलोड करने के लिए स्कूलों के लिए प्रोसेस फीस निर्धारित की गई है। यदि निश्चित समय में स्कूल फीस की डिटेल पोर्टल पर अपलोड नहीं की जाती है, तो प्रोसेस फीस के अलावा पांच गुना पेनाल्टी राशि वसूल की जाए।

इस आदेश में इस बात का भी जिक्र है कि कितनी छात्र संख्या वाले स्कूल से कितनी पेनाल्टी वसूल की जाएगी।

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