“मैं गिर रहा हूं, तिरंगे को संभालो” – मंच पर परफॉरमेंस के दौरान अलविदा कह गए रिटायर्ड फौजी के आखिरी पल…देखे VIDEO

तिरंगा कभी झुकना नहीं चाहिए, गिरना नहीं चाहिए। मैं आज इसी बात को लेकर दो गानों पर परफॉर्म करूंगा। कुछ नई एक्टिंग भी करूंगा।’ इसी बात को लेकर शुक्रवार सुबह बलवीरसिंह छाबड़ा मंच पर आए। योग केंद्र में बैठे दर्शकों के सामने तिरंगा उठाया और एक्ट शुरू कर दिया। तीन मिनट की परफॉरमेंस के दौरान वे नीचे गिरने लगे तो उन्होंने अपने साथी से कहा कि मैं गिर रहा हूं, तिरंगे को संभालो। यह कहते ही वे नीचे गिर गए। हम सबको लगा कि ये एक्ट है, पर वे हमें हमेशा के लिए अलविदा कह गए। छाबड़ा के आखिरी पलों की यादें दोस्त रमेश मौर्य ने शेयर की।

खबर में आगे बढ़ें इससे पहले वो तस्वीर देखिए जो शुक्रवार को सबकी आंखें नम कर गईं्र

बता दें इस हादसे से मौर्य भी सदमे में चले गए थे। मौर्य ने कहा कि जब उन्होंने खुद को छोड़ तिरंगा संभालने के लिए कहा तब मुझे जरा भी अहसास नहीं था कि उन्हें अटैक आया है। उन्होंने बाएं हाथ से तिरंगा संभालने की कोशिश की और दाएं हाथ से मुझे इशारा कर बुलाया। जैसे ही मैं तिरंगा पकड़ा वे नीचे गिर गए।

अस्पताल ले जाते समय आया दूसरा अटैक

हम लोग कुर्सी सहित उन्हें बाहर ले गए और उनके दोस्त मुकेश नायदे की कार में बैठाया। इस बीच मैंने अपने योग गुरु राकेश चौधरी (योग मित्र संस्था) को फोन कर घटना बताई तो वे भी सीधे अरिहंत अस्पताल पहुंचे।

मुकेश नायदे ने बताया कि सीपीआर देने के बाद उन्हें 4-5 मिनट की नई जिंदगी मिली थी। शायद उन्हें रास्ते में दूसरा अटैक आया था और वे इस बार संभल नहीं सके। उन्हें सीपीआर देने के साथ अस्पताल पहुंचने तक 4-5 मिनट लगे थे। कार में भी वे असहज थे। उन्हें अस्पताल पहुंचते ही स्ट्रेचर पर लेटाकर अंदर ले गए तो डॉक्टरों ने चेक कर कहा कि उनकी मौत हो चुकी है।

ये घटना मेरे लिए सदमे से कम नहीं, ताउम्र भूल नहीं पाउंगा

मौर्य ने कहा दोस्त छाबड़ा की मौत से मैं सदमे में आ गया। मुझे घबराहट होने लगी। बीपी डाउन हो गया। मैं चैकअप के लिए बॉम्बे हॉस्पिटल पहुंचा। वहां डॉक्टरों ने चार घंटे ऑब्जर्वेशन में रखा। यह घटना में जिंदगी भर नहीं भूल पाउंगा।

बच्चे उनके लिए भजनों में सलामती की दुआएं मांगते रहे

घटना के बाद योग केंद्र पर आए बच्चों-महिलाओं और सभी ने उनके स्वस्थ होने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ किया। जब उन्हें पता चला कि छाबड़ा दुनिया में नहीं तो सभी की आंखों में आंसू थे।

रेसीडेंसी में हर मॉर्निंग वॉकर उन्हें जानता था

राकेश चौधरी (योग मित्र संस्था) ने बताया कि वे कई सालों से सुबह 5 बजे उठकर रेसीडेंसी एरिया में घूमने जाते थे। वहां के सभी मॉर्निंग वॉकर उन्हें जानते थे। मुझे जैसे ही उनकी तबीयत खराब होने की सूचना मिली तो मैं अहिल्योत्सव कार्यक्रम छोड़कर सीधे अस्पताल पहुंचा। लेकिन तब तक वे दुनिया को अलविदा कह चुके थे।

तीन हफ्ते पहले किया था ब्लड डोनेट

बलवीरसिंह की मुंहबोली बहन अनिता वर्मा ने बताया कि मैं उन्हें 20 साल से राखी बांधती थी। वे बहुत खुशमिजाज और मददगार इंसान थे। रास्ते चलते भी वे कई लोगों की मदद करते थे। एक दिन पहले ही वे घर आए थे और एक पारिवारिक काम में मेरी मदद की थी। करीब तीन हफ्ते पहले उन्होंने ब्लड डोनेशन कैंप में ब्लड डोनेट किया था। वे इसके पहले भी कई बार डोनेट कर चुके हैं। उनका मानना था कि मेरी कारण किसी की जान बचती है तो इससे बड़ा सौभा ग्य कोई और नहीं हो सकता।

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