
मेरे पिता और चाचा दोनों की पिछले डेढ़ साल में कैंसर से मौत हो गई। दोनों खेतों में दवा छिड़कने का काम करते थे। 3 महीने बीमार रहे। फिर अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि उन्हें कैंसर हो गया था।ये बताने वाले बांद्राभान के 32 साल के सुरेश खुद भी कैंसर के मरीज हैं।
कैंसर से वे हार मान चुके हैं। दवाएं बंद कर दी है। कहते हैं कि जिंदगी के आखिरी दिनों में वे दवा से दूर रहना चाहते हैं। वे खुद भी कई सालों से खेतों में मजदूरी करते रहे हैं। इस दौरान कई बार दवाएं छिड़कने का काम करते रहे हैं।
लेकिन नर्मदापुरम में ये अकेले सुरेश की कहानी नहीं है, यहां गांव-गांव में ऐसी ही कहानियां हैं। क्या खेतों में छिड़की जा रही दवा और कैंसर का सीधा कनेक्शन है?
जिला अस्पताल के डॉ. संजय पुरोहित इसका जवाब देते हुए कहते हैं कि जब भी कोई कैंसर मरीज अस्पताल में आता है, तो उससे बात करने पर पता चलता है कि वह खेतों में लंबे समय तक जहरीले कीटनाशक का छिड़काव करता आया है। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) भोपाल की रिपोर्ट के मुताबिक 2021-22 में नर्मदापुरम जिले के 228 कैंसर पेशेंट एम्स में रजिस्टर हुए थे। मई 24 तक यहां मरीजों की संख्या बढ़कर 1759 हो गई है।
बांद्राभान में क्लिनिक चलाने वाली राजकुमारी मीणा से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया, ‘मुझे यहां क्लिनिक शुरू किए केवल 4 महीने हुए हैं। इस गांव में लगभग 700 लोग हैं, लेकिन यहां 5 से 7 लोगों को कैंसर है। 3- 4 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है और हर तीसरा आदमी यहां किसी न किसी बीमारी का मरीज है। इतने छोटे गांव में इतने बीमार लोग हैं, ये देखकर ही मुझे ताज्जुब होता है।’

नर्मदापुरम में कैंसर पेशेंट्स की संख्या में बढ़ोतरी की क्या वजह है।नर्मदापुरम के शहरी और ग्रामीण इलाके में रहने वाले लोगों के साथ एक्सपर्ट से भी बात की। बात करने पर तीन बातें समझ आईं
कैंसर पेशेंट की संख्या गांवों में ज्यादा बढ़ रही है
किसान खेतों में कीटनाशक का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं।
मूंग की फसल को सुखाने के लिए किसान पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इस्तेमाल कर रहे हैं जो खरपतवार को सुखाने के काम आता है।
अब क्या ये सभी बातें कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ा रही है? एक्सपर्ट की माने तो पेस्टिसाइड्स का बहुत ज्यादा इस्तेमाल इसकी वजह हो सकता है। जब से पैराक्वाट डाइक्लोराइड की खपत बढ़ी है कैंसर पेशेंट की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। आखिर पेराक्वाट डाइक्लोराइड का इस्तेमाल किसान क्यों कर रहे हैं, इसके इस्तेमाल से क्या नुकसान है, क्या पेराक्वाट का इस्तेमाल मूंग की फसल में किया जा सकता है

गर्मी में मूंग की फसल किसानों के लिए एक्स्ट्रा इनकम का जरिया
पिछले कुछ सालों से गर्मी में मूंग की फसल की बुआई का प्रचलन बढ़ गया है। इसका रकबा भी साल दर साल बढ़ता जा रहा है। मूंग का समर्थन मूल्य 8 हजार रु. प्रति क्विंटल है, इसलिए ये नर्मदापुरम के किसानों के लिए करीब 2 हजार करोड़ की आय का अतिरिक्त जरिया है। 2019 में नर्मदापुरम जिले में मूंग की फसल का रकबा 91 हजार हेक्टेयर था जो 2024 में 3 गुना से ज्यादा बढ़कर करीब 2.95 लाख हेक्टेयर हो गया। साल 2023 में नर्मदापुरम जिला देश का सबसे ज्यादा मूंग उत्पादित जिला बन गया था। देश के 12 फीसदी मूंग का उत्पादन केवल नर्मदापुरम के किसानों ने ही किया था।

दूसरा पहलू- मूंग की फसल सुखाने इस्तेमाल किया जा रहा प्रतिबंधित केमिकल
जब नर्मदापुरम के गांवों में पहुंची तो मूंग की फसल पक कर पूरी तरह से तैयार थी। कोई भी फसल जब पक कर पूरी तरह से तैयार हो जाती है तो इसे काटा जाता है। बाद में इससे दाना निकाला जाता है। लेकिन ग्रीष्म कालीन मूंग की फसल को काटा नहीं जाता बल्कि सुखाया जाता है।
कृषि विभाग के उप संचालक डॉ. जे आर हेड़ाऊ बताते हैं कि मूंग एक समर क्रॉप हैं। मार्च के आखिर में जब गेहूं की फसल कट जाती है तो अप्रैल के पहले हफ्ते में मूंग की फसल बोई जाती है। इसके पकने में केवल 60 दिन का समय लगता है।
फसल 15 जून के आसपास पूरी तरह से पक कर तैयार हो जाती है। अब इसे काटने की जहमत उठाने की बजाय किसान एक केमिकल के जरिए इसे सुखा देते हैं। 24 घंटे में फसल सूख जाती है और दूसरे ही दिन किसान दाना निकाल लेते हैं।
किसान ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि 15 जून के आसपास मप्र में मानसून दस्तक दे देता है। बांद्राभान के किसान श्याम कहार कहते हैं कि यदि ऐसा नहीं करेंगे तो बारिश में फसल बर्बाद हो जाएगी। डोलरिया गांव के रहने वाले दिनेश ने इस बार 60 एकड़ में मूंग बोया है।
दिनेश कहते हैं कि एक एकड़ में एक लीटर दवा का छिड़काव करना पड़ता है। इस तरह मुझे फसल सुखाने के लिए 60 लीटर दवा का छिड़काव करना पड़ेगा। भास्कर की टीम जब ये रिपोर्ट तैयार कर रही थी तब दिनेश फसल सुखाने की तैयारी कर रहे थे।

अब जानिए किस केमिकल का हो रहा इस्तेमाल
एक्सपर्ट बोले- पेराक्वाट डाइ क्लोराइड मूंग के लिए प्रतिबंधित केमिकल
फसल को सुखाने के लिए जिस केमिकल का इस्तेमाल हो रहा है उसका नाम है पैराक्वाट डाइक्लोराइड है। इसे आम बोलचाल की भाषा में सफाया भी कहते हैं। पैराक्वाट का इस्तेमाल खरपतवार को नष्ट करने में किया जाता है। मगर, नर्मदापुरम में इसका इस्तेमाल सीधे मूंग की फसल पर हो रहा है।
ICMR के डायरेक्टर राजनारायण तिवारी के मुताबिक पैराक्वाट डाइक्लोराइड, पैराक्वाट डाइ मिथाइल केमिकल का फैमिली मेंबर है। दोनों में केवल फॉर्मूले का अंतर है, लेकिन काम एक ही करते हैं। डॉ. तिवारी के मुताबिक पैराक्वाट डाइ मिथाइल केमिकल पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
सेंट्रल इनसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी ने पेराक्वाट डाइक्लोराइड को सिर्फ 9 फसल (सेब, कपास, अंगूर, गेहूं, चाय, चावल, रबड़, आलू और मक्का) में खरपतवार को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल की मंजूरी दी है।

नर्मदापुरम में बड़ी आसानी से मिलता है पेराक्वाट डाइक्लोराइड केमिकल
नर्मदापुरम में खाद बीज और पेस्टिसाइड्स बेचने वाली दुकानों की आधी से ज्यादा रैक सिर्फ सफाया केमिकल की बोतलों से भरी है। जिले में 300 से ज्यादा ब्रांड और कंपनियों के नाम से ये केमिकल बिक रहा है। कीमत 250 से 350 रूपए प्रति लीटर है।
मालाखेड़ा में केमिकल और फर्टिलाइजर की दुकान पर डेढ़ एकड़ मूंग के लिए पेराक्वॉट मांगा तो उसने 2 लीटर ले जाने के लिए कहा। दुकानदार ने कहा कि सामान्य तौर पर यहां हर किसान एक एकड़ में 100 लीटर पानी में 1 लीटर केमिकल मिलाकर छिड़काव करता है। दुकानदार कहते हैं कि साल दल साल इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।
एक और दुकान पर पहुंची और दुकानदार से पूछा कि क्या इसे बेचने के लिए लाइसेंस की जरूरत है। तो उसने कहा कि हमारे पास दुकान चलाने का लाइसेंस है। जिसके आधार पर हम सरकार की तरफ से सर्टिफाइड पेस्टिसाइड्स बेच सकते हैं। हमें डीलर कंपनी से एक पीसी मिलती है। इस पर लिखी दवा कंपनी की दवाइयां हम बेच सकते हैं
दुकानदार बोला कि मैं 4 साल से ये बेच रहा हूं। जब मूंग की फसल पक जाती है तब तो बंपर कमाई होती है। मूंग के कटने के बाद इसकी 5 बोतलें भी नहीं बिकती कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर डॉ हेड़ाऊ कहते हैं कि पेराक्वॉट का उपयोग खरपतवार मारने के लिए होता है। मूंग की फसल पर इस केमिकल का छिड़काव गैरकानूनी है। यह प्रेक्टिस गलत है। लेकिन सरकार ने ही इसके निर्माण और बिक्री को लीगलाइज कर रखा है तो हम क्या कर सकते हैं।

किसान भी जानते हैं कि पेराक्वाट जहरीला, मगर मजदूरी बचाने कर रहे इस्तेमाल
डोलरिया गांव के दीपेंद्र राजपूत बताते हैं कि किसान भी जानते है कि सफाया खतरनाक जहर है। मंडी में उचित दाम पाने के लिए मूंग को जल्दी सूखाने के लिए किसान सफाया छिड़कते हैं। क्योंकि नमी वाले मूंग का सही दाम नहीं मिलता।
बांद्राभान गांव के किसान लीलाधर पिछले 4 साल से बटाई पर मूंग की खेती करते हैं। 3 लाख रु. में 10 एकड़ जमीन लेते हैं। लीलाधर कहते हैं कि लागत और किराया देने के बाद कुछ फायदा होता है इसलिए ज्यादा पैदावार हो जाए इसके लिए दोगुना केमिकल का इस्तेमाल करता हूं।
वहीं किसान संजय पासी से पूछा कि यदि सरकार केमिकल को बंद कर दें तो क्या होगा। वे बोले सरकार अगर सफाया को बंद कर देती है, तो किसानों की मूंग की फसल खराब हो जाएगी। हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है।
जमीन सिकमी( बटाई) पर लेने के बाद जरूरत से ज्यादा उर्वरक और दवाइयां डालते हैं। जो लोग किराए से जमीन लेते हैं उन्हें न तो जमीन से मतलब होता है और न ही बाकी चीजों से उन्हें तो बस ज्यादा फसल चाहिए।

अब क्या यही पेराक्वाट और कीटनाशक कैंसर मरीजों के बढ़ने की वजह है….
एक्सपर्ट बोले- इस संभावना से इनकार नहीं
नर्मदापुरम में साल 2021 में कैंसर के इलाज के लिए एक प्राइवेट अस्पताल खुल गया है। ढाई साल में ही इस अस्पताल में 1500 से ज्यादा कैंसर मरीज अपना इलाज करवाने पहुंचे हैं। इस अस्पताल के संचालक डॉ. अतुल सेठा ने बताया कि पुरुष और महिलाओं के अलावा बच्चे भी कैंसर से पीड़ित है।
वहीं नर्मदापुरम के जिला अस्पताल में 2019- 20 में कैंसर के 22 केस आए थे जो 2023-24 में लगभग 5 गुना बढ़कर 104 हो गए हैं। जिला अस्पताल के डॉ संजय पुरोहित का कहना है कि पिछले कुछ सालों में जिले और आसपास के गांवों में एकदम से किडनी, लिवर और लंग्स की समस्याएं तेजी से बढ़ गई है।
पिछले 10 सालों में बीपी और डायबिटीज के मरीजों के अलावा कैंसर के मरीज भी काफी बढ़ गए हैं। ब्रेस्ट कैंसर, लंग कैंसर के अलावा गले और आंत के कैंसर के मरीज गांवों में आम हो गए हैं। कीटनाशक और खरपतवार के लिए उपयोग किए जाने वाले केमिकल कैंसर की सबसे बड़ी वजह हैं।

एम्स के डॉक्टर बोले- ब्रिटेन में और अमेरिका में कैमिकल बैन, जीन्स बदल सकता है
एम्स के ऑन्कोलॉजिस्ट( कैंसर विशेषज्ञ) डॉ. निलेश श्रीवास्तव कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक केमिकल के ऐक्सपोज में रहता है, तो कहीं न कहीं शरीर में म्यूटेशन होता है। यानी जीन्स में बदलाव हो सकता है।
डॉ. श्रीवास्तव कहते हैं कि ब्रिटेन और अमेरिका में ये बैन है क्योंकि वहां हुई स्टडी में दावा किया गया कि इससे स्किन कैंसर का खतरा है। मगर, इंटरनेशनल एसोसिएशन काउंसिल फॉर कॉर्सियो जैनेसिस ने कैटिगराइज नहीं किया है कि इससे कैंसर हो सकता है।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च इन एनवायरन्मेंटल साइंस(ICMR) के डायरेक्टर डॉ. राजनारायण तिवारी कहते हैं कि अगर कोई किसान या मजदूर लंबे समय तक पैराक्वाट के संपर्क में रहता है, तो स्टडी में बताया गया है कि उसे न्यूरोलॉजिकल इफेक्ट्स में पार्किंसन और कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है।
हालांकि IARC (इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च एंड कैंसर) ने इस बात पर मुहर नहीं लगाई है। लेकिन कुछ स्टडी का दावा है कि पैराक्वाट से स्किन कैंसर, लंग कैंसर और ब्लड कैंसर तक हो सकता है।

न केवल इंसानों की बल्कि मिट्टी की सेहत भी बिगाड़ रहा पेराक्वाट केमिकल
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सॉइल साइंस के प्रिंसिपल साइंटिस्ट और हेड डॉ. एस. आर. मोहंती कहते हैं कि पर्यावरण में बहुत सारे तत्व ऐसे हैं जो मिट्टी के लिए फायदेमंद होते हैं। जैसे दलहन की फसलों खासकर मूंग, चने को नाइट्रोजन की बहुत आवश्यकता होती है।
इसके लिए मिट्टी में ही ऐसे तत्व मौजूद होते जो वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर पौधे को पहुंचाते हैं। लेकिन, पेस्टिसाइड्स के ज्यादा उपयोग से इन तत्वों की कमी हो रही है। इसका समाधान यही है कि हमें बैलेंस फर्टिलाइजर का प्रयोग खेती में करना होगा।
वहीं कृषि महाविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. विनोद कुमार कहते हैं कि नर्मदापुरम में सबसे ज्यादा कीटनाशक का इस्तेमाल होता है। कई बार तो किसान 7-7 बार छिड़काव करते हैं। किसान बिना किसी सलाह के इनका इस्तेमाल कर रहे हैं।

जनप्रतिनिधि भी किसानों को दे चुके सलाह
वहीं इस केमिकल के इस्तेमाल को लेकर जनप्रतिनिधि भी चिंतित है। दो साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कहा था कि मूंग की फसल को सुखाने के लिए इतनी ज्यादा मात्रा में केमिकल का इस्तेमाल बेहद खतरनाक है।
वहीं नर्मदापुरम के विधायक और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीतासरन शर्मा भी कहते हैं कि मैं इस मामले को कई बार विधानसभा में उठा चुका हूं। यहां तक कि व्यक्तिगत रूप से भी किसानों के बीच जाकर उन्हें समझाया है। रही बात इसके बैन होने की बहुत सी चीजें ऐसी होती है जो कानून से नहीं होती। उसे समाज के साथ मिलकर करना पड़ता है।

