
रेशा-रेशा उधेड़कर देखो, रोशनी किस जगह से काली है…
‘रेशा रेशा उधेड़ कर देखो
रौशनी किस जगह से काली है’
यह दो पंक्तियां ही दिल पर राज करने के लिए काफी हैं। वर्तमान परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो कोई भी इसका जवाब दे देगा कि “रेशा रेशा उधेड़ कर देखा, रौशनी हर जगह से काली है”…। हालांकि इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि “और भी जब उधेड़ कर देखा, तो रौशनी कुछ जगह ही बाकी है”…। अब इस जोड़ने और घटाने के खेल से परे जाकर पूरी गजल पर गौर करते हैं…
शहर दर शहर हाथ उगते हैं
कुछ तो है जो हर इक सवाली है
‘मीर’ का दिल कहाँ से लाओगे
खून की बूँद तो बचा ली है
जिस्म में भी उतर के देख लिया
हाथ खाली था अब भी खाली है
रेशा रेशा उधेड़ कर देखो
रौशनी किस जगह से काली है…
दिल जीतने वाला यह अंदाज है भोपाल के प्रसिद्ध शायर फजल ताबिश का। फ़ज़ल ताबिश का जन्म 15 अगस्त, 1933 को भोपाल में हुआ था। वह भोपाल के एक पुराने ख़ानदान के चिराग़ थे। वह मुसलमान थे, लेकिन उनकी मुसलमानियत में दूसरे धर्मों की इंसानियत की भी इज्जत शामिल थी। फ़ज़ल ताबिश अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी भी नहीं कर पाए थे कि अचानक सारा घर बोझ बनकर उनके कंधों पर आ गिरा। घर में सबसे बड़ा होने के कारण उन्होंने अपनी शिक्षा रोककर एक कार्यालय में बाबूगिरी करने लगे। निरंतर 15 बरस घर की ज़िम्मेदारियों में खर्च होने के बाद जो थोड़े-बहुत रुपये बचे थे, उससे उन्होंने उर्दू में एम.ए किया और हमीदिया कॉलेज में लेक्चरर हो गए। वह 1980 से 1991 तक मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी के सचिव रहे और अगस्त 1993 में मध्य प्रदेश शिक्षा विभाग से पेंशन पा कर रिटायर हुए।
उनको उर्दू का बांका और कड़वा शायर कहा जाता है। उनकी फक्कड़ जिंदगी और बेपरवाह तबीयत के बहुत किस्से हैं। उनकी शायरी का यह संग्रह ‘रोशनी किस जगह से काली है’ खासा चर्चित था।फ़ज़ल ताबिश भोपाल के नौजवान प्रतिनिधि थे। वह बहुत हँसते थे। अपने हमउम्र में उनके पास सबसे ज़्यादा हँसी का भंडार था, जिसे वह जी खोलकर खर्च करते थे। फ़ज़ल ताबिश शेरी भोपाली, कैफ, ताज, दुष्यंत के बाद नई पीढ़ी के शायर थे। वह भोपाल की तहज़ीब, उसके मूल्यों के धनी थे। शायरी के अलावा उन्होंने कहानियाँ भी लिखी, उपन्यास भी रचे तथा मणि कौल और कुमार शाहनी की फ़िल्मों में अभिनय भी किया। फ़ज़ल ताबिश का निधन 10 नवम्बर, 1995 को हो गया।
ताबिश की यह दो पंक्तियां ही देख लो, जो सच के करीब ले जाती हैं…
“सहर फैला रही है अपने बाजू
मेरा साया सिमटता जा रहा है…”
ताबिश उर्दू के महत्त्वपूर्ण, प्रगतिशील विचारधारा के कवि, नाटककार, कहानीकार थे। उनके दो नाटक—‘डरा हुआ आदमी’ और ‘अखाड़े के बाहर से’ देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुए। पहला कविता-संग्रह—‘रोशनी किस जगह से काली है’ उर्दू में निधन के आठ माह पूर्व, मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा प्रकाशित हुआ था। ‘वो आदमी’ उनका बहुचर्चित उपन्यास है। भोपाल के कला-जगत् में विभिन्न खेमों और विचारधाराओं के बीच उन्होंने महत्त्वपूर्ण सेतु का काम किया।
“नहीं चुनी मैंने वो ज़मीन जो वतन ठहरी
नहीं चुना मैंने वो घर जो खानदान बना
नहीं चुना मैंने वो मजहब जो मुझे बख्शा गया
नहीं चुनी मैंने वो ज़बान जिसमें माँ ने बोलना सिखाया
और अब
मैं इन सबके लिए तैयार हूँ
मरने मारने पर”
वास्तव में कितनी सच्ची और अच्छी नज़्म है ये। राजनीति से परे यह सार्वकालिक और सार्वभौमिक सत्य है। पर इस सच को हम जानते हुए भी समझ नहीं पाते। वरना राम-रहीम सभी की यह सीख तो हम मान ही लेते कि ऊंच-नीच और भेदभाव-छुआछूत जैसी सोच निरर्थक है।”फज़ल ताबिश” ज़िन्दगी के साथ जुड़े थे, वो पहले से ही बने बनाये हुए रास्तों से कतरा कर निकल जाते थे, उनकी शायरी ज़िन्दगी से लिए गए तजुर्बों की देन है। वो उर्दू जबाँ के बाँके शायर थे इसीलिए उनकी शायरी अपने समकालीन शायरों की भीड़ से अलग एक ख़ास मुकाम हासिल किये हुए है। उनके ही शब्द इसके गवाह हैं-
सिवाय प्यार के कोई भी हुनर नहीं सीखा
बहुत न सीखना हमको कमाल रास आया
शराब पी के भी हम बेखबर गुज़र न सके
हमारे पाँव के नीचे कोई नहीं कुचला
सितमगरों को सितम से नहीं मिली फुरसत
सितमगरों ने ख़ुशी का मज़ा नहीं चक्खा
फ़जल़ ताबिश मूल रूप से ऊर्दू के आदमी होने के बावजूद हिन्दी साहित्य-जगत के लिए कोई अपरिचित नाम नहीं है। उनके दो नाटक-‘डरा हुआ आदमी’ और ‘अखाड़े के बाहर से’ वाणी प्रकाशन, दिल्ली से लगभग 25 वर्ष पूर्व हिन्दी में ही मंचित भी हुए थे। वह ऊर्दू के उन गिनती के नाटककारों में से थे , जिसके नाटक मंचित भी हो सके और उन्होंने बी.वी. कारंत और अलखनन्दन जैसे प्रतिष्ठित निर्देशकों के साथ काम किया। इसी प्रकार फिल्मों में उन्होंने मणि कौल की मुक्तिबोध-साहित्य पर आधारित फिल्म अनीता देसाई के अग्रेजी उपन्यास, ‘इन कस्टडी’ पर बनी फ़िल्म ‘मुहाफ़िज’ के संयोजक-सहायक की चुनौतिपूर्ण ज़िम्मेदारी अपने सिर ली। तो ताबिश को भावपूर्ण श्रद्धांजलि उनकी इन पंक्तियों के साथ ही…
न कर शुमार के हर शै गिनी नहीं जाती
ये ज़िन्दगी है हिसाबों से जी नहीं जाती
सुलगते दिन में थी बाहर, बदन में शब को रही
बिछड़ के मुझसे बस इक तीरगी नहीं जाती
नक़ाब डाल दो जलते उदास सूरज पर
अँधेरे जिस्म में क्यों रौशनी नहीं जाती
मचलते पानी में ऊँचाई की तलाश फ़िज़ूल
पहाड़ पर तो कोई भी नदी नहीं जाती …।
आज हम सभी थोड़ा-थोड़ा फजल को जीते हैं उनकी पुण्यतिथि पर। और थोड़ा-थोड़ा भोपाल के इस शायर की सच से भरी भावनाओं संग अपनी भावनाओं को जोड़ खुली हवा में सांस लेते हैं और रेशा-रेशा उधेड़कर पता लगाने की कोशिश करते हैं कि रोशनी किस जगह से काली है……।

कौशल किशोर चतुर्वेदी
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। दो पुस्तकों “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।