भगवान महाकाल के विग्रह का पेटेंट कराने की तैयारी की जा रही है। यह इसलिए क्योंकि उज्जैन के ही एक मूर्तिकार सतीश सक्सेना ने बाबा महाकाल के सभी विग्रहों को मिट्टी से हूबहू बना लिया। वे उन्हें न केवल अपने घर रखते हैं। बल्कि भगवान चंद्रमोलेश्वर के विग्रह को यात्राओं में भी साथ ले जाते हैं।
वीडियो सामने आने के बाद मंदिर के पुजारियों ने नाराजगी जाहिर की है। कहा है कि महाकाल के विग्रह को देश भर में कार-हवाई जहाज से घुमाने से बदनामी होती है। ऐसे कृत्य करने वालों पर कार्रवाई होना चाहिए।

मिट्टी से हूबहू बना लिए भगवान के मुखारविंद
मूर्तिकार सतीश सक्सेना ने मिट्टी से भगवान महाकाल के उमा-महेश, चंद्रमोलेश्वर, होलकर, मन महेश मुखारबिंद हूबहू बनाए हैं। वे जहां भी जाते हैं, इनमें से चंद्रमोलेश्वर स्वरुप को अपने साथ ले जाते हैं। वे उन्हें हवाई यात्रा भी करा रहे हैं।
सतीश सक्सेना ने कहा-
मैं जिनके घर जाता हूं, उनसे पूछ लीजिए कि कभी किसी से राशि ली हो तो। मैंने मिट्टी से भगवान का विग्रह बनाया है। मेरे माता-पिता नहीं है। ऐसे में मेरे तो सब भगवान महाकाल हैं। मंदिर के पुजारी क्या सोचते हैं, उनके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता हूं।

सवारी में विराजित होते हैं भगवान के विग्रह
दरअसल, प्रति वर्ष अलग-अलग पर्व पर श्री महाकालेश्वर मंदिर से भगवान महाकाल की सवारी निकाली जाती है। सवारियों में भगवान के विग्रह को विराजित किया जाता है। इसमें सबसे खास भगवान चंद्रमोलेश्वर की प्रतिमा (विग्रह) हैं। हर बार बड़ी संख्या में श्रद्धालु विग्रह को नमन कर आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं।

एयरपोर्ट पर सुरक्षाकर्मी करते हैं सैल्यूट
सतीश सक्सेना ने छत्तीसगढ़ के धमतरी में श्री मार्कण्डेय भगवान के दर्शन यात्रा और वृंदावन गिरिराज जी यात्रा के दौरान हवाई यात्रा की है। इस दौरान भगवान चंद्रमोलेश्वर को भी वे अपने साथ प्लेन में ले गए। हवाई यात्रा के दौरान जब लोगों को पता चला कि सतीश के हाथों में उज्जैन के राजा महाकाल का स्वरूप है तो उन्हें वैसे ही सम्मान मिलता है, जैसा भगवान महाकाल के चंद्रमोलेश्वर के स्वरूप को मिलता है।
एयरपोर्ट पर सुरक्षाकर्मी बाकायदा भगवान चंद्रमोलेश्वर की मूर्ति को सैल्यूट कर उन्हें आदर सम्मान के साथ हवाई जहाज तक पहुंचाते हैं। अब सतीश भगवान के विग्रह को कई शहरों में ले जाते हैं। कई लोग उन्हें बुलाकर विग्रह का पूजन भी करते हैं। हाल ही में पंजाब में भी चंद्रमोलेश्वर का विग्रह कार में दिखाई दिया था, जिसका वीडियो भी सामने आया था।

पुजारी नाराज, कहा-कड़ी कार्रवाई होना चाहिए
कई लोगों ने सतीश के बनाए विग्रह के साथ अपने वीडियो शेयर किए हैं। जिसमें वे विग्रह की पूजा करते नजर आते हैं। इस तरह के वीडियो वायरल होने के बाद अब महाकाल मंदिर के पुजारी नाराज हैं। पुजारियों ने भगवान महाकाल के सभी विग्रह का पेटेंट कराने का आग्रह मंदिर समिति और शासन से किया। पुजारियों का कहना है कि ऐसे लोग बाबा महाकाल के भक्तों को धोखा दे रहे हैं। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।
पालकी में निकालने की परंपरा
महाकाल मंदिर के पुजारी महेश शर्मा ने कहा कि महाकाल भगवान के विग्रह कहीं जाते नहीं हैं। जो महाकालेश्वर मंदिर में जो विग्रह है, वो केवल सावन मास, कार्तिक मास, दशहरा और हरिहर मिलन की सवारी में पालकी में परंपरानुसार निकलते हैं।
आज-कल कुछ संगठन महाकाल के ही स्वरूप जैसा डुप्लीकेट स्वरूप बनाकर ऐसा प्रचार करते हैं कि भगवान महाकालेश्वर किसी के घर में आएंगे। वो बुलाएगा तो पदरानी होगी। उन्हें कार में, हवाई जहाज में बैठाकर ले जाते हैं और उसका वो पैसा वसूल करते हैं।

मूर्तियों का पेटेंट हो, कार्रवाई भी
आशीष पुजारी ने कहा कि यह बहुत गलत परंपराएं चालू हो गई है क्योंकि भगवान महाकाल की सवारी सावन मास में कार्तिक मास के अंदर निकलती है। भारत वर्ष में भगवान के प्रति आस्था रहती है। शासन से मांग करूंगा कि महाकालेश्वर मंदिर के जितने भी स्वरूप में जितने भी मुखारबिंद हैं। जो अनादि काल की हमारी धरोहर है, उसका पेटेंट करा लिया जाए। उन्होंने कहा-
भगवान के स्वरूप की प्रतिमा से मिलती-जुलती प्रतिमा बाहर जाती है तो भक्त भगवान महाकाल की प्रतिमा समझते हैं और पूजन पाठ किया जाता है। उन्हें पता ही नहीं होता कि वास्तविकता क्या है, इसके लिए सरकार और महाकाल मंदिर समिति से मेरी मांग है कि मूर्तियों का पेटेंट किया जाए। इस तरह से कृत्य करने वाले पर कठोर कार्रवाई की जाए।

उन्होंने कहा कि ये एक अनादि काल की परंपराएं और धरोहर हैं, कल से तो कोई बाबा के मंदिर में भस्मारती चालू कर देगा। कोई भगवान की इस तरह की हर मंदिर की अपनी परंपराएं, एक स्थान का बड़ा महत्व है, उसी स्थान पर की जाती है। हर मंदिर के अपनी परम्परा, अगर कोई स्वरूप बनाकर लोगों को ठगने का काम कर रहा है तो उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए।

बांके बिहारी का विग्रह पहुंचा
आशीष पुजारी ने बताया कि विग्रह किसी के घर में जाता है, लोग उसे भगवान समझकर पदरानी करते हुए उन्हें भोग दान के साथ-साथ आने-,जाने का किराया ठहरने की व्यवस्था सहित मोटी रकम दान में देते हैं। ये सब सरासर प्राचीन मंदिर और परंपरा के साथ धोखाधड़ी हैं। उनके साथ में एक प्रकार की लूट है। मंदिर समिति या ट्रस्ट को ऐसे लोगों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।
मंदिर के ऐसे स्वरूप या विग्रहों का पेटेंट करा लेना चाहिए। ताकि कोई और इसका कॉपी नहीं बना सके। आज बांके बिहारी के नाम से वृंदावन के नाम से भी एक विग्रह महाकाल में लाया गया है। यह प्रचारित किया गया कि बांके बिहारी वृंदावन के उनका विग्रह लाया गया। मंदिर के पुजारी से बात हुई तो उन्होंने ऐसे किसी भी विग्रह के बारे में मना कर दिया।