एमपी। 12th पास छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने हाईकोर्ट में खुद लड़ा केस: प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में EWS आरक्षण लागू, छात्र की दलील सुनकर जज बोले – तुम्हें डॉक्टर नहीं वकील… देखें VIDEO

जबलपुर के 19 साल के अथर्व चतुर्वेदी की वजह से अब प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में ईडब्ल्यूएस आरक्षण का फायदा छात्रों को मिल सकेगा। एमपी हाईकोर्ट ने अथर्व की याचिका पर सुनवाई करते हुए 17 दिसंबर को अपना फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को कहा है कि अगले शैक्षणिक सत्र से प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस का कोटा देने के लिए सीटों की संख्या बढ़ाई जाए। इस पूरे केस की सबसे खास बात ये है कि अथर्व ने खुद इस केस की पैरवी की। उसकी दलीलें सुनकर हाईकोर्ट के जस्टिस बोले- गलत फील्ड में जा रहे हो, तुम्हें वकील बनना चाहिए।

दरअसल, अथर्व के पिता वकील हैं। जब उसे नीट में 530 अंक मिलने के बाद भी प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में ईडब्ल्यूएस (इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन) आरक्षण का फायदा नहीं मिला तो उसने ये याचिका दायर की थी। हालांकि, केस का फैसला आने के बाद भी अथर्व को मेडिकल कॉलेज में एडमिशन नहीं मिला है। वह अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है।

अथर्व और उसके पिता मनोज चतुर्वेदी के बात कर समझा कि आखिर कैसे अथर्व ने इस केस की तैयारी की? केस के दौरान ऐसी कौन सी मुश्किलें आईं जिसका उसने सामना किया? वे सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों लगा रहे हैं? पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

मेडिकल के साथ इंजीनियरिंग एंट्रेंस भी क्लियर किया भास्कर से बातचीत में अथर्व ने कहा कि मैंने नीट के साथ जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम यानी जेईई मेन्स भी क्लियर की थी। मुझे भोपाल के मैनिट में कम्प्यूटर साइंस स्ट्रीम बड़ी आसानी से मिल रही थी, लेकिन मैंने मेडिकल फील्ड में जाने का मन बना लिया था। मुझे नीट में 530 मार्क्स मिले थे।

मैं इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार था कि इन मार्क्स के साथ मुझे सरकारी मेडिकल कॉलेज में तो एडमिशन नहीं मिलेगा, मगर प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एक सीट मिल सकती है। जब नीट की काउंसिलिंग शुरू हुई तो आखिरी राउंड तक मुझे कॉलेज अलॉट नहीं हुआ।

मैं इस बात से बेहद निराश हो गया। मुझसे कम नंबर वाले रिजर्व क्लास के बच्चों को एडमिशन मिल गया, मगर मुझे नहीं मिला। जबकि, मैं भी ईडब्ल्यूएस रिजर्व कोटे से आता हूं। मैंने जब रिसर्च की तो पता लगा कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस के लिए रिजर्व सीट है ही नहीं।

आरक्षण का फायदा न मिलना याचिका का आधार अथर्व ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र होने का फायदा हर एग्जाम में मिलता है। प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एससी-एसटी और विकलांग कोटे के लिए सीटें रिजर्व रखी गई हैं। मप्र में विकलांग कोटे में 91 स्टूडेंट रजिस्टर्ड थे। इस कैटेगरी के लिए रिजर्व सीटों की संख्या 205 हैं। मेरी ईडब्ल्यूएस कोटे में रेंक 134 थी।

नियमों के मुताबिक ईडब्ल्यूएस के लिए 187 सीटें रिजर्व होना चाहिए थी। जब मुझे एडमिशन नहीं मिला तो मैंने पापा से बात की, और कहा कि हमें कोर्ट में याचिका दायर करना चाहिए। तब पापा ने भी याचिका दायर करने की सहमति दी।

पिता बोले- पहली सुनवाई में बहस के दौरान गलतियां हुईं अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी बताते हैं कि केस लगाने के बाद 12 नवंबर को जब पहली सुनवाई हुई तो मैंने अथर्व की तरफ कोर्ट में पैरवी की। इस दौरान कुछ गलतियां हो गईं। मैंने नीट एग्जाम को ही चैलेंज कर दिया था। सरकारी वकील ने मेरे इस आर्ग्युमेंट पर आपत्ति ली।

इसके बाद अथर्व ने तय किया कि वह खुद कोर्ट में पैरवी करेगा। मनोज कहते हैं कि वह बचपन से पढ़ाई में तेज है, मगर स्कूल लेवल पर डिबेट या ग्रुप डिस्कशन जैसे इवेंट्स में उसने कभी पार्टिसिपेट नहीं किया था। मैं थोड़ा घबराया हुआ था, लेकिन अथर्व कॉन्फिडेंट था।

अथर्व कहता है कि मैं इस केस से ज्यादा करीब से जुड़ा था। मेरे साथ गलत हुआ था इसलिए मेरे पास सरकारी वकील के हर तर्क का जवाब था।। केस के दौरान पापा ने मुझे गाइड किया।

जूनियर वकील ने तंज कसा, जज बोले- गलत फील्ड में जा रहे मनोज चतुर्वेदी कहते हैं कि दूसरी सुनवाई के दौरान अथर्व पिछली बेंच पर बैठा था। एक याचिकाकर्ता के तौर पर वह आगे नहीं बैठ सकता था। जब मैंने कोर्ट को कहा कि याचिकाकर्ता खुद केस की पैरवी करना चाहता है और कोर्ट ने इसकी सहमति दी, तो पिछली बेंच पर बैठे जूनियर वकील बोले कि अब बच्चे भी कोर्ट में दलील देंगे।

कोर्ट रूम में अथर्व ने बहस शुरू की तो 15-20 सेकेंड बाद जज ने उसे रोका और पूछा क्या उम्र है और क्या करते हो? अथर्व ने कहा कि नीट की तैयारी कर रहा हूं, तो उन्होंने कहा- इतनी अच्छी बहस कर लेते हो, तुम गलत फील्ड में जा रहे हो। मुझे लगता है कि तुम्हारे लिए ही ये कोर्ट रूम बना है।

अथर्व बताता है कि कोर्ट रूम में जाने से पहले पापा हर बार हौसला बढ़ाते थे। वे यही कहते थे कि तुम सही हो और तुम्हें कोई हरा नहीं सकता।

अथर्व ने रिसर्च की, 37 दिन में की केस की तैयारी अथर्व बताता है कि मैंने 12वीं साइंस मैथ्स और बॉयोलॉजी से की है। इसके बाद एक साल से नीट और जेईई की तैयारी कर रहा हूं। संविधान और कानून से दूर- दूर तक नाता नहीं था। 7 नवंबर की नीट की आखिरी राउंड की काउंसिलिंग थी। 10 नवंबर को मैंने केस फाइल किया। 17 दिसंबर को फैसला आया।

इस तरह 37 दिन तक ये केस चला। इस दौरान मैंने सारी रिसर्च की। इस मामले में जुड़े दर्जनों जजमेंट पढ़े, जो मेरे केस को स्ट्रॉन्ग कर सकते थे। मुझे पता कि सरकारी वकील मेरी किस बात को काट सकते हैं। अथर्व कहता है कि कोर्ट में अपनी बात कैसे रखते हैं और क्या प्रोसिडिंग होती है मैं इस बात से वाकिफ था।

कोविड के दौरान पापा घर से ही सुनवाई में हिस्सा लेते थे। मैं उनकी दलीलें सुनता था। घर का माहौल भी ऐसा है कि पापा से केस को लेकर डिस्कशन होता है। हालांकि, सुनना और कोर्ट रूम में दो जजों की बेंच के सामने अपना पक्ष रखना दोनों में बेहद अंतर है।

जिसने संविधान नहीं पढ़ा उसके लिए चुनौती अथर्व कहता है कि यदि किसी ने भारत का संविधान नहीं पढ़ा है तो उसके लिए इस केस में पैरवी करना बड़ा चैलेंज है क्योंकि केंद्र सरकार ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण के लिए संविधान की धाराओं में संशोधन किया है। मैं खुद भी संविधान की धाराओं में फंस गया था। पापा ने मुझे इस समस्या से बाहर निकाला। वे मुझे इन धाराओं को सरल कर समझाते थे। उन्होंने मेरे भीतर के डर को बाहर निकाल दिया।

अथर्व के पिता मनोज बताते हैं कि 3 दिसंबर को इस केस की अंतिम सुनवाई होना थी। मैं एक दूसरे केस में उलझ गया। इस दौरान सुनवाई शुरू हो गई। मैं कोर्ट रूम में 10 मिनट लेट पहुंचा था, तब तक अथर्व ने अकेले ही केस को संभाल लिया था। वे कहते हैं कि ये कोर्ट ने ये फैसला अथर्व की उम्र को देखकर दिया हो ऐसा बिल्कुल नहीं है।

डबल बेंच ने अथर्व से बहुत सारे सवाल किए। हर ऑर्ग्युमेंट पर उन्होंने क्रॉस सवाल किए। जब सारे जवाबों से संतुष्ट हुए तभी उन्होंने फैसला सुनाया और आखिर में मप्र के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन ने अथर्व की तारीफ भी की।

कोर्ट रूम में इस तरह हुई बहस….

अथर्व: मीलॉर्ड, 93% लाने के के बाद भी मैं प्राइवेट कॉलेज में एक सीट सिक्योर नहीं कर सका तो इसमें मेरी गलती नहीं है। यह सीट डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम की गलती है। मैं जिस कैटेगरी (ईडब्ल्यूएस) का हूं उसका मुझे फायदा नहीं मिला।

सरकारी वकील: सर, ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए सीटें सिर्फ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षित है, प्राइवेट में नहीं है। ईडब्ल्यूएस आरक्षण 2019 में आया था।

अथर्व: मीलॉर्ड, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्राइवेट संस्थान भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण देने के लिए बाध्य है। एमपी में पिछले 5 साल से ऐसा हुआ ही नहीं है।

फैसले का 30 हजार स्टूडेंट्स को फायदा मिलेगा अथर्व के मुताबिक 2019 में केंद्र सरकार ने राज्यों को सभी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू करने के लिए 2 साल का समय दिया था लेकिन मप्र में इसका पालन नहीं हुआ। अब हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि मप्र सरकार प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में कोटे के हिसाब से सीट बढाएं। इस हिसाब से राज्य में 187 सीटें बढ़ेगी।

ये सिर्फ एमबीबीएस की हैं। इसके अलावा आयुष, नर्सिंग, पैरामेडिकल के भी बच्चों को पहली बार ईडब्ल्यूएस का फायदा मिलेगा। अगर दूसरे राज्यों में भी यह बात अमल में लाई जाती है तो देशभर के 30 हजार से ज्यादा बच्चों के लिए यह लड़ाई फायदेमंद रहेगी। हो सकता है कि इंजीनियरिंग के बच्चों को भी इसका फायदा मिले।

अथर्व ने कहा- मैं कोर्ट के इस फैसले से खुश नहीं अथर्व कहता है कि मैं इस फैसले से खुश नहीं हूं। मैंने कोर्ट में दलील दी कि काउंसिलिंग में सीट का गलत डिस्ट्रीब्यूशन हुआ है। इस दलील को कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि मुझे 2 जुलाई को आए गजट नोटिफिकेशन के बारे में पहले से पता था, लेकिन मेरा कहना था कि मैंने नीट की तैयारी 2023 में शुरू की थी।

नोटिफिकेशन तो 2024 में आया था। नीट की तैयारी करने वाला स्टूडेंट मप्र का गजट नोटिफिकेशन क्यों पढ़ेगा? मैंने कोर्ट को बताया कि मैंने उसे तब पढ़ा जब मेरे साथ गलत हुआ।

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