शाह से इस्तीफा लेने के बजाय पार्टी डैमेज कंट्रोल में लगी है। इसे लेकर सरकार से लेकर संगठन तक में बड़े नेता पिछले दो दिन से माथापच्ची कर रहे हैं। अब सवाल यह है कि मामले के इतना तूल पकड़ने के बाद भी आखिर शाह से बीजेपी इस्तीफा क्यों नहीं ले पाई? बीजेपी की क्या मजबूरी है? हालांकि, इस मामले की शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली है। अब विजय शाह का राजनीतिक भविष्य काफी कुछ कोर्ट के रुख पर निर्भर करेगा। पढ़िए रिपोर्ट में…
8 बार के विधायक 20 साल से कैबिनेट मंत्री

शाह का इस्तीफा न होने की 4 वजह
1. बीजेपी प्रेशर में आकर फैसले नहीं लेती
राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि जब भी बीजेपी के मंत्री या नेता किसी विवाद में फंसते हैं तो बीजेपी किसी प्रेशर में आकर कोई फैसला नहीं लेती। जबतक कि पार्टी की छवि को बहुत बड़ा नुकसान न हो। पार्टी देख परख कर ही निर्णय लेती है।
पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि प्रज्ञा ने महात्मा गांधी को लेकर अशोभनीय टिप्पणी की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, मैं उन्हें माफ नहीं कर सकता, मगर पार्टी ने प्रज्ञा के खिलाफ 5 साल तक कोई एक्शन नहीं लिया था। इतना जरूर हुआ कि अगले चुनाव में उनका टिकट काट दिया।
बीजेपी समेत सारे राजनीतिक दल दोमुंही बातें करते हैं। वो या तो नेताओं का व्यक्तिगत मत कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं या नेताओं की आलोचना कर देते हैं। इस मामले भी ऐसा ही हुआ है।
2014 के बाद बीजेपी काफी बदल गई है। मैंने इन 10-11 सालों में नहीं देखा कि बीजेपी ने नैतिकता या मर्यादा के आधार पर नेता का इस्तीफा मांगा हो
रशीद किदवई
वरिष्ठ पत्रकार
2. आदिवासी वोटर्स को नाराज नहीं करना चाहती बीजेपी
जानकार कहते हैं कि शाह का इस्तीफा नहीं होने की सबसे अहम वजह आदिवासी वोटर्स को साधना भी है। हरसूद और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में शाह का काफी प्रभाव है। वे पिछले 40 साल से इस इलाके से जनप्रतिनिधि हैं। यही वजह है कि 12 साल पहले 14 अप्रैल 2013 को उन्होंने इसी तरह झाबुआ में दिए बयान में महिलाओं का अपमान किया था, तब उनसे केवल 4 महीने के लिए मंत्री पद छीना था।
तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान विजय शाह को गले लगाते हुए आदिवासी वोट बैंक की खातिर वापस अपने मंत्रिमंडल में जगह दी थी। राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि कांग्रेस के पास आदिवासी लीडर्स के तौर पर बड़े चेहरे हैं, मगर बीजेपी के पास गिने चुने चेहरे हैं, जिसमें विजय शाह भी शामिल हैं।
वहीं किदवई ये भी कहते हैं कि मप्र में करीब 22 फीसदी आदिवासी हैं। विधानसभा की 47 और लोकसभा की 6 सीटें इस वर्ग के लिए आरक्षित है। पिछले 20 साल में बीजेपी का इन सीटों पर जीत का ग्राफ उतार-चढ़ाव वाला रहा है। 2018 के चुनाव के बाद बीजेपी ने आदिवासियों के बीच अपना जनाधार फिर खो दिया है। इस बार के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच केवल 2 सीट का अंतर है।
आदिवासी वोटर्स के बीच 20 साल में ऐसे गिरा बीजेपी का ग्राफ

3. विपक्ष को श्रेय नहीं लेने देना चाहती बीजेपी
किदवई कहते हैं कि इस मामले में पार्टी कांग्रेस को श्रेय नहीं लेने देना चाहती। दरअसल, विजय शाह के बयान देने के बाद कांग्रेस देशभर में प्रदर्शन कर रही है। कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाकर पॉलिटिकल माइलेज लेना चाहती है। शाह का कर्नल सोफिया को लेकर दिया बयान राष्ट्रवाद और खासतौर पर महिलाओं पर ज्यादा असरकारक दिखाई देता है।
बीजेपी नहीं चाहेगी कि शाह के इस्तीफे या फिर कोई भी कार्रवाई का श्रेय कांग्रेस ले सके। बीजेपी ऐसे समय में अनुशासन के चाबुक का इस्तेमाल नहीं करना चाहती। ऐसी नजीर पेश नहीं करना चाहती कि आगे से कोई विवादित बयान देता है तो फिर उसे हटाना बीजेपी की मजबूरी बन जाएगा। ऐसे कई नेता हैं, मैं नाम नहीं लूंगा क्योंकि बीजेपी ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया।
मेरे ख्याल से कार्रवाई न कर बीजेपी गलत फैसला ले रही है। ये कांग्रेस के पास हमेशा से ही बड़ा मुद्दा रहेगा। महिला वोटर्स पर इसका असर पड़ सकता है।
रशीद किदवई
वरिष्ठ पत्रकार
4. विजय शाह के बगावती तेवरों का डर
इस्तीफा न लेने का एक और बड़ा कारण विजय शाह के बगावती तेवरों की आशंका है। विजय शाह से जुड़े करीबियों का कहना है कि जब हाईकोर्ट ने शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की बात कही, तब संगठन की तरफ से उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा गया।
मगर, उनकी खेमे से ये बात सामने आई कि यदि इस्तीफा का ज्यादा दबाव रहा तो वे मंत्रीपद के साथ विधायकी भी छोड़ देंगे। पार्टी के लिए यही बात धर्मसंकट जैसी है, क्योंकि उपचुनाव की स्थिति में आदिवासी वोटबैंक को देखते हुए पार्टी के लिए राजनीतिक परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण बन सकती है।
बीजेपी का एक धड़ा अबतक न हुए इस्तीफे की वजह ये भी मानता है कि इससे पहले भी मंत्रियों ने विवादित बयान दिए हैं उनके खिलाफ भी कोई एक्शन नहीं लिया गया।
शाह का इस्तीफा नहीं होना, आश्चर्यजनक है। बीजेपी में कुछ लोग है, जो ये नहीं चाहते। देर-सबेर इस्तीफा होगा, बीजेपी नुकसान नहीं उठाना चाहेगी।
एन के सिंह
राजनीतिक विश्लेषक
अब जानिए बीजेपी ने कैसे किया डैमेज कंट्रोल
1.कैबिनेट बैठक के बाद सीएम ने दी थी नसीहत
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को मंगलवार 13 मई की सुबह 11 बजे इस मामले के बारे में पता चल गया था। वे कैबिनेट मीटिंग के लिए मंत्रालय पहुंचे। इसमें मंत्री विजय शाह भी मौजूद थे। सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने बैठक के बाद शाह को अपने चैंबर में बुलाकर कड़ी नसीहत दी।मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी आपत्तिजनक बयानबाजी से सरकार और पार्टी की छवि खराब होती है। सीएम ने यह भी चेतावनी दी कि उन्हें अपनी भाषा पर नियंत्रण रखना होगा। भविष्य में ऐसी गलती बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
2.संगठन की फटकार-माफी मांगें या पार्टी छोड़ें
शाह को बीजेपी संगठन ने 13 मई को तलब किया था। प्रदेश कार्यालय में यहां प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद ने शाह को चेतावनी देकर कहा कि या तो वे सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे या फिर पार्टी छोड़ दें। हितानंद ने यह भी कहा कि यह उनकी आखिरी गलती मानी जाएगी। इसके बाद शाह ने मीडिया के सामने माफी मांगी। शाह प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के निवास पर गए।
सूत्रों का दावा है कि प्रदेश अध्यक्ष ने शाह को पुराने विवादों का उल्लेख करते हुए जमकर फटकार लगाई। उन्होंने दो टूक कहा- अब यदि ऐसी स्थिति बनी तो माफ नहीं किया जाएगा। प्रदेश अध्यक्ष ने देर रात छतरपुर में कर्नल सोफिया कुरैशी के परिजनों से मुलाकात करने के लिए पूर्व विधायक मानवेंद्र सिंह सहित अन्य वरिष्ठ भाजपा नेताओं को भेजा।

3. शाह ने दो बार माफी, कहा- शर्मिंदा हूं
मंत्री विजय शाह ने इस मामले को लेकर दो बार माफी मांगी। 13 मई मंगलवार को उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए सार्वजनिक माफी मांगी। इसके बाद बुधवार 14 मई को उन्होंने फेसबुक पर वीडियो शेयर किया। इस वीडियो में शाह ने कहा- हाल ही मेरे एक बयान से हर समाज की जो भावनाएं आहत हुई हैं, उसके लिए मैं दिल से न केवल शर्मिन्दा हूं, दुखी हूं, बल्कि माफी चाहता हूं।
हमारे देश की वो बहन सोफिया कुरैशी राष्ट्रधर्म निभाते हुए जाति और समाज से ऊपर उठकर उन्होंने जो काम किया है वो हमारी सगी बहन से भी सम्मानित हैं। हमारी सेना और हमारी सोफिया बहन के जो साथी, जिन्होंने विरोधियों को धूल चटाई है। मैं उनका सम्मान करता हूं।
हाल के भाषण में मेरी इच्छा और मंशा यही थी कि उनकी बात को अच्छे से समाज के बीच में रखूं, लेकिन दुखी और विचलित मन से कुछ शब्द गलत निकल गए। जिसके कारण मैं खुद शर्मिन्दा हूं। और पूरे समाज और समुदाय से माफी मांगता हूं। बहन सोफिया और सारे मिलिट्री वालों का मैं सम्मान करता हूं। और आज हाथ जोड़कर मैं माफी चाहता हूं।
मैं विजय शाह, हाल ही मेरे एक बयान से हर समाज की जो भावनाएं आहत हुई हैं, उसके लिए मैं दिल से न केवल शर्मिन्दा हूं, दुखी हूं, बल्कि माफी चाहता हूं।
विजय शाह
जनजातीय कार्य मंत्री, मप्र
शाह के इस्तीफे के सवाल पर यह बोले सीएम डॉ. यादव
मंत्री विजय शाह पर भले ही एफआईआर दर्ज हो गई है। लेकिन अब तक उनका इस्तीफा नहीं हुआ है। सरकार इसे लेकर जल्दबाजी में कोई भी कदम नहीं उठाना चाहती है। मंत्री के इस्तीफे की कांग्रेस की मांग को लेकर मीडिया ने जब सीएम डॉ. मोहन यादव से सवाल किया तो उन्होंने कहा कांग्रेस पहले अपने नेता सिद्धारमैया से इस्तीफा मांगे। कांग्रेस खुद भ्रष्टाचार से घिरी है, उसके मंत्रियों पर मुकदमे चल रहे हैं, फिर भी वह दूसरों पर सवाल उठा रही है।
सीएम ने कहा कि कांग्रेस ने चुनावों में अरविंद केजरीवाल का साथ दिया, जो मुख्यमंत्री होते हुए जेल गए थे। कांग्रेस ने जिस स्तर की बेशर्मी दिखाई है, उसके बाद उसे बोलने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बचा है। हमारी सरकार संविधान और कानून के अनुसार काम कर रही है, और न्यायपालिका को सर्वोच्च मानती है।
हाईकोर्ट के आदेश पर शाह के खिलाफ FIR
दरअसल, मंत्री विजय शाह रविवार को इंदौर के महू के रायकुंडा गांव में हलमा कार्यक्रम में शामिल हुए थे। यहीं उन्होंने विवादास्पद बयान दिया था। मंगलवार को इसका वीडियो वायरल हुआ। इसके बाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए कहा कि मंत्री के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के तहत अपराध बनता है।
जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों को अपराध घोषित करता है। BNS की धारा 192 के तहत भी प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, जो धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास, भाषा या जाति के आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने से संबंधित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस्लाम धर्म को मानने वाली कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन कहकर अपमानित करना इन्हीं धाराओं के तहत आपराधिक कृत्य है।

मानपुर थाने में FIR दर्ज हुई
हाईकोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने बुधवार रात करीब 11 बजे मध्यप्रदेश के मंत्री विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। शाह ने इंदौर के मानपुर थाना क्षेत्र में आयोजित कार्यक्रम में ये बयान दिया था, इसलिए हाईकोर्ट के आदेश पर उनके खिलाफ मानपुर थाने में FIR दर्ज की गई है।
गुरुवार 15 मई को महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट के आदेश पर बुधवार शाम 7:55 बजे इंदौर के मानपुर थाने में विजय शाह के खिलाफ FIR दर्ज कर दी गई। जांच पुलिस कर रही है। इस पर जस्टिस अतुल श्रीधरन ने कहा कि यह किसी हत्या की जांच नहीं है, बल्कि एक आपत्तिजनक भाषण से जुड़ा मामला है। ऐसे में इसमें लंबी जांच की आवश्यकता नहीं है। मंत्री विजय शाह के खिलाफ धारा 152, 196(1)(बी) और 197(1)(सी) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
जानिए क्या है धारा 152, 196(1) (बी) और 197(1) (सी)

FIR की भाषा पर हाईकोर्ट को आपत्ति
हाईकोर्ट के आदेश पर पुलिस ने विजय शाह के खिलाफ एफआईआर तो दर्ज कर ली, मगर हाईकोर्ट की नजर में ये केवल खानापूर्ति की गई है। हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने कहा- एफआईआर को पूरी तरह से देखने पर संदिग्ध के कार्यों का एक भी उल्लेख नहीं मिला, जो उसके खिलाफ दर्ज किए गए अपराधों के तत्वों को संतुष्ट करता हो।
FIR इस तरह दर्ज की गई ताकि यदि पूर्ववर्ती CrPC की धारा 482 के अंतर्गत चुनौती दी जाती है तो इसे रद्द किया जा सके, क्योंकि इसमें भौतिक विवरण की कमी है। न्यायालय निर्देश देता है कि 14 मई का पूरा आदेश FIR के पैरा 12 के भाग के रूप में पढ़ा जाएगा। न्यायालय का मानना है कि शाह के भाषण को एफआईआर में शामिल नहीं किया गया। शाह ने कहा था-

उन्होंने कपड़े उतार-उतार कर हमारे हिंदुओं को मारा और मोदी जी ने उनकी बहन को उनकी ऐसी की तैसी करने उनके घर भेजा। अब मोदी जी कपड़े तो उतार नहीं सकते। इसलिए उनकी समाज की बहन को भेजा कि तुमने हमारी बहनों को विधवा किया है तो तुम्हारे समाज की बहन आकर तुम्हें नंगा करके छोड़ेगी। देश का मान-सम्मान और हमारी बहनों के सुहाग का बदला तुम्हारी जाति, समाज की बहनों को पाकिस्तान भेजकर बदला ले सकते हैं।
