सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों शराब उद्योग से जुड़े एक कानूनी विवाद में अहम फैसला सुनाया है। ये विवाद फ्रांस की शराब बनाने वाली कंपनी और मध्यप्रदेश के इंदौर की एक कंपनी के बीच ब्रांड के नाम को लेकर हुआ था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फ्रांस की कंपनी ने जिस ‘प्राइड’ शब्द को लेकर आपत्ति दर्ज की है, वह ब्रांडनेम का केवल एक हिस्सा है न कि पूरा नाम।
फ्रांस की कंपनी के वकीलों की तरफ से दलील दी गई थी कि इससे उनका कस्टमर उलझन में रहेगा, तो कोर्ट ने कहा कि प्रीमियम व्हिस्की खरीदने वाला वर्ग आमतौर पर शिक्षित, समझदार और आर्थिक रूप से सक्षम होता है। ऐसे लोग केवल लेबल देखकर फैसला नहीं लेते। उनके गुमराह होने की संभावना बेहद कम है। आखिर क्या था ये मामला और कैसे कोर्ट में इसे लेकर बहस हुई.

पहले जानिए, क्या है पूरा मामला फ्रांस की बहुराष्ट्रीय कंपनी पर्नोड रिकार्ड भारत में ब्लेंडर्स प्राइड, इंपीरियल ब्लू और सीग्राम्स जैसे व्हिस्की के लोकप्रिय ब्रांड बनाती है। उसने इंदौर के कारोबारी करणवीर सिंह छाबड़ा पर आरोप लगाया कि वे अपनी कंपनी जेके इंटरप्राइजेज के बैनर तले लंदन प्राइड नाम से व्हिस्की बेच रहे हैं।
पर्नोड रिकार्ड का आरोप था कि छाबड़ा ने न केवल ब्रांडनेम कॉपी किया बल्कि पैकेजिंग, रंग और लेबल भी हूबहू उनके प्रोडक्ट इंपीरियल ब्लू की बोतल से मैच करता है। कंपनी ने साल 2022 में इंदौर की वाणिज्यिक अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कंपनी की तरफ से दावा किया गया था कि उनका ब्लेंडर्स प्राइड का कस्टमर लंदन प्राइड नाम से उलझन में आ सकता है। उनके दशकों से बने ब्रांडनेम की पहचान को खतरा है।
तीन पॉइंट्स के साथ कोर्ट में रखी बात पर्नोड रिकार्ड कंपनी ने अदालत के सामने तीन पॉइंट रखे…
- दोनों कंपनियों के ब्रांडनेम में ‘प्राइड’ प्रमुख तत्व है।
- बोतल का आकार, लेबल और पैकेजिंग का रंग संयोजन समानता दर्शाते हैं।
- शराब उद्योग में ब्रांड की पहचान अक्सर दृश्य तत्वों से होती है, इसलिए उपभोक्ता धोखा खा सकते हैं।
इसके जवाब में जेके इंटरप्राइजेज के वकीलों की तरफ से भी तीन तर्क दिए गए…
- लंदन प्राइड और ब्लेंडर प्राइड पूरी तरह अलग नाम हैं।
- ‘प्राइड’ शराब उद्योग में एक सामान्य शब्द है, जिसका इस्तेमाल दर्जनों कंपनियां कर रही हैं।
- पर्नोड यह साबित करने में असफल रहा कि वास्तव में कोई उपभोक्ता इससे उलझा है।
कोर्ट ने कहा- प्राइड शब्द रजिस्टर्ड नहीं कराया दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद वाणिज्यिक अदालत ने पर्नोड की याचिका को खारिज करते हुए जेके इंटरप्राइजेज के पक्ष में फैसला सुनाया कि ट्रेडमार्क कॉपी नहीं किया गया है और न ही इससे उपभोक्ता पर कोई असर पड़ेगा। फ्रांस की कंपनी ने निचली अदालत के इस फैसले को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने भी वाणिज्यिक अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट में दो बार पेश की गईं व्हिस्की की बोतलें हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज किया तो पर्नोड रिकार्ड कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दो बार व्हिस्की की बोतलें पेश की गई थीं। 5 जनवरी 2024 को इस केस की सुनवाई तीन जजों की बेंच में हुई थी। इसकी अध्यक्षता तत्कालीन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाय चंद्रचूड़ कर रहे थे। उनके साथ जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा थे।
सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने बेंच से प्रोडक्ट पेश करने का अनुरोध किया। जब दोनों व्हिस्की की बोतलें पेश की गईं तो तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ जोर से हंसे और कहा, ‘आप बोतलें साथ लाए हैं?’ इसका जवाब देते हुए रोहतगी ने कहा- दोनों उत्पादों के बीच अंतर बताना था, इसके लिए बोतलों को दिखाना जरूरी है।
इसके बाद उन्होंने अदालत को विस्तार से बताया कि इस मामले में कैसे ट्रेडमार्क उल्लंघन हुआ है। सुनवाई खत्म होने के बाद मुकुल रोहतगी ने तत्कालीन सीजेआई से पूछा कि क्या वे इन बोतलों को ले जा सकते हैं तो सीजेआई ने कहा- यस प्लीज

सुप्रीम कोर्ट का फैसला- ट्रेडमार्क का उल्लंघन नहीं इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में फैसला सुनाते हुए कहा- भारतीय बाजार में व्हिस्की के ब्लेंडर्स प्राइड और लंदन प्राइड दोनों ब्रांडनेम मौजूद रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, उसके चार अहम पॉइंट्स रहे-
- ट्रेडमार्क का मूल्यांकन समग्र रूप से होता है। इसकी किसी एक घटक (जैसे सिर्फ प्राइड) को अलग करके तुलना नहीं की जा सकती।
- पर्नोड कंपनी का पंजीकरण ब्लेंडर्स प्राइड नामक कंपोजिट मार्क के लिए है, न कि अकेले प्राइड शब्द के लिए।
- शराब उद्योग में प्राइड इतना आम शब्द है कि इसे लेकर किसी कंपनी को एकाधिकार नहीं मिल सकता।
- प्रीमियम व्हिस्की खरीदने वाले सामान्यतः शिक्षित और समझदार होते हैं, इसलिए उनके गुमराह होने की संभावना नगण्य है।

फैसला ट्रेडमार्क कानून के लिए मील का पत्थर इस केस से जुड़े एडवोकेट आयुष जैन कहते हैं- मामले की अनोखी विशेषता यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार भारतीय ट्रेडमार्क कानून में Post-Sale Confusion (बिक्री पश्चात भ्रम) सिद्धांत को मान्यता दी है। कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता किसी वस्तु को खरीदते समय शायद भ्रम में न हो, लेकिन जब हूबहू नाम और आकार के उत्पाद बाजार में दिखाई देते हैं तो मूल ब्रांड की प्रतिष्ठा पर असर डालते हैं।
उदाहरण के लिए किसी ने असली Gucci बैग खरीदा, लेकिन बाजार में नकली Gucci बैग भी मौजूद है, तो असली खरीदार की प्रतिष्ठा और मूल ब्रांड की विशिष्टता दोनों प्रभावित होंगे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शराब जैसे निजी उपभोग वाले उत्पादों में यह सिद्धांत सीधे लागू नहीं होता।

एक्सपर्ट बोले- इस केस का व्यापक असर होगा जानकारों का मानना है कि ये फैसला केवल पर्नोड रिकार्ड और जेके इंटरप्राइजेज तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक असर होगा। कंपनियों के सामने स्थिति साफ हो चुकी है कि वह सामान्य या प्रशंसात्मक शब्द जैसे प्राइड, गोल्ड, क्लासिक, रॉयल पर विशेष अधिकार नहीं जता सकतीं।
अब केवल नाम की समानता के आधार पर अदालत से राहत लेना कठिन होगा। कंपनियों को उपभोक्ता भ्रम का ठोस सबूत प्रस्तुत करना होगा। भविष्य में पोस्ट सेल कन्फ्यूजन सिद्धांत का जिक्र फैशन, लग्जरी और ऑटोमोबाइल सेक्टर के विवादों में अहम भूमिका निभा सकता है।