अमीर देशों ने बड़े पैमाने पर पहले ही कर ली कोरोना वैक्सीन की बुकिंग,मुश्किल में गरीब देश

देश समेत दुनियाभर में तेजी से कोरोना वायरस का संक्रमण फैल रहा है। कई देशों में कोरोना की दूसरी या तीसरी लहर ने दस्तक दे दी है। दुनियाभर में अब तक महामारी की वजह से करीब सात करोड़ लोग संक्रमित हो चुके हैं, जबकि 15 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। ऐसे में कोरोना से मुक्ति पाने के लिए सभी बेसब्री से कोरोना वैक्सीन  का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच बाजार में आने से पहले ही कई अमीर देशों ने बड़े पैमाने पर वैक्सीन की बुकिंग कर ली है।उससे अंदेशा पैदा हो गया है कि लंबे समय तक वैक्सीन गरीब देशों और वहां की गरीब आबादी की पहुंच से दूर बना रहेगा। अमेरिका में नॉर्थ कैरोलाइना स्थित ड्यूक ग्लोबल हेल्थ इनोवेशन सेंटर के जुटाए आंकड़ों के मुताबिक कई धनी देशों ने अपनी जनसंख्या की जरूरत से कई गुना ज्यादा वैक्सीन के ऑर्डर दे दिए हैं। गैर सरकारी संस्था पीपुल्स वैक्सीन एलायंस ने पिछले हफ्ते कहा था कि धनी देशों ने इतनी बड़ी संख्या में वैक्सीन के ऑर्डर दे दिए हैं, जिससे वे अपनी आबादी का तीन बार टीकाकरण कर सकते हैँ।

आबादी की तुलना में सबसे ज्यादा वैक्सीन के ऑर्डर कनाडा ने दिए हैं। उसने अपनी आबादी की जरूरत से पांच से छह गुना ज्यादा वैक्सीन खरीदने के ऑर्डर वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को दिए हैं। लेकिन कनाडा सरकार के प्रवक्ताओं का कहना है कि कनाडा ने जो ऑर्डर दिए हैं, मुमकिन है कि उनमें से कुछ वैक्सीन को इस्तेमाल की हरी झंडी ना मिले। कनाडा सरकार ने इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त सावधानी बरती है।

पीपुल्स वैक्सीन एलायंस का कहना है कि जिस तरह सबसे धनी देश वैक्सीन के ऑर्डर देते जा रहे हैं, उसे देखते लिए लगता है कि सबसे गरीब 70 देश 2021 में अपनी दस फीसदी आबादी का ही टीकाकरण कर पाएंगे। पीपुल्स वैक्सीन एलायंस में एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी मशहूर संस्थाएं शामिल हैं। दक्षिण अफ्रीका में यूनिवर्सिटी ऑफ केपटाउन के प्रोफेसर ग्रेगरी हसी ने टीवी चैनल सीएनएन से कहा- पहले कोविड-19 के वैक्सीन के मामले में दुनिया में समानता का नजरिया अपनाने का इरादा दिखाया गया था। लेकिन अब वैक्सीन राष्ट्रबाद सबसे सर्वोच्च हो गया है। इसी चैनल से बातचीत में अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन नामक संस्था के प्रमुख जॉन न्केंगासान्ग ने कहा कि गरीब देशों को वैक्सीन उपलब्ध ना होने का विनाशकारी असर होगा। उन्होंने कहा कि कुछ देशों के पास जरूरत से ज्यादा वैक्सीन होना और कुछ देशों के पास इसका बिल्कुल ना होना किसी रूप में नैतिक नहीं है।

कोरोना महामारी जब फैली तब कोवाक्स नाम की अंतरराष्ट्रीय पहल सामने आई। इसका नेतृत्व वैक्सीन एलायंस- गावी- कर रहा है। इसमें शामिल धनी और मध्य आय के देशों ने वैक्सीन निर्माण के लिए धन देने का वादा किया। साथ ही उन्होंने कहा कि वे सभी देशों को न्यायपूर्ण ढंग से वैक्सीन उपलब्ध कराएंगे। इसके अलावा अफ्रीका के गरीब देशों ने कोवाक्स फैसिलिटी नाम के एक अलग करार पर भी दस्तखत किए। इस माध्यम से वैक्सीन उपलब्ध कराने का खर्च अंतरराष्ट्रीय विकास संस्थाएं और बिल एंड मेलिंडा गेट्स जैसे परोपकारी संगठन उपलब्ध करा रहे हैं। इन दोनों समझौतों पर अब तक 189 देश दस्तखत कर चुके हैं।

गावी ने कहा है कि सबको वैक्सीन उपलब्ध कराने की राह में पैसा बाधा नहीं है। गावी एलायंस ने सबसे गरीब देशों के लिए वैक्सीन खरीदने के लिए दो अरब डॉलर की रकम जुटा ली है। वह अगले साल के अंत तक पांच अरब डॉलर तक जुटा लेने की उम्मीद कर रहा है। लेकिन असल सवाल वैक्सीन की उपलब्धता का है। कंपनियां जो वैक्सीन पहले ही बेच चुकी हैं, उन्हें गावी नहीं खरीद सकता। कोवाक्स के लिए सबसे ज्यादा धन यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन और कनाडा ने दिए थे। लेकिन वैक्सीन बनते ही उन्होंने ही प्राइवेट कंपनियों से वैक्सीन की खरीद के लिए तुरंत दोतरफा करार कर लिए। पीपुल्स वैक्सीन एलायंस का कहना है कि इन खरीद समझौतों से कोवाक्स की अनदेखी हुई है।

कनाडा के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री करीना गॉल्ड ने कहा है कि उनका देश खुद को सुरक्षित करना चाहता है, क्योंकि ज्यादातर वैक्सीन अभी निर्माण के दौर में हैं और उनकी बात महज सैद्धांतिक दायरे में है। इसलिए कनाडा ने कई कंपनियों से करार किया है, ठीक उसी तरह जैसे कोवाक्स फैसिलिटी ने किया है। ऐसा इस समझ के तहत किया गया है कि मुमकिन है कि इनमें से कई वैक्सीन असल में बन ही ना पाएं।

विशेषज्ञों ने कहा है कि विभिन्न देशों का पहले अपने नागरिकों का टीकाकरण सुनिश्चित करने की इच्छा को समझा जा सकता है। लेकिन यह एक दुखद हकीकत है। जानकारों का कहना है कि अगर सप्लाई ही ना हो तो धन जुटा लेना काफी नहीं है। उनके मुताबिक इस मामले में अभी तक स्थिति बेहद जटिल नजर आती है।

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