“हिंदू राष्ट्र संभव नहीं, पूरा संविधान बदलना पड़ेगा; ‘पहले जेल फिर इन्वेस्टिगेशन’ गलत—जस्टिस मदन बी. लोकुर ने लंबित मामलों, न्यायिक स्वतंत्रता और संविधान की भावना पर रखी बेबाक राय”

यह कहना है सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस मदन बी लोकुर का। वे सोमवार को भोपाल पहुंचे। जहां उन्होंने विकास संवाद कार्यक्रम में  के शोधार्थियों को संबोधित किया।इसके बाद  से उन्होंने विशेष बातचीत की। जस्टिस लोकुर से पूछा कि हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें हो रहीं हैं। कहीं न कहीं सरकारें भी उसमें साथ नजर आती हैं। आप क्या सोचते हैं?

जवाब में उन्होंने कहा कि ये हिंदू राष्ट्र तो खैर हो नहीं सकता। संविधान ही पूरा बदलना पडे़गा। मुझे तो कुछ नजर नहीं आ रहा कि संविधान पूरा बदल सकता है।

पढ़िए, जस्टिस लोकुर ने सवालों के क्या जवाब दिए…

सवाल: बार-बार राजनीतिक बयान आते हैं कि संविधान खतरे में हैं। ज्युडिशियरी क्या सोचती है? जस्टिस लोकुर: संविधान खतरे में है या नहीं, पता नहीं लेकिन कोर्ट में तो काफी बदलाव आ रहे हैं। एक बात तो ये है कि बहुत ज्यादा केसेज पेंडिंग है। आज 5 करोड़ से ज्यादा केस लंबित हैं। ये अच्छा नहीं है। इसके बारे में कुछ न कुछ तो करना पडे़गा। ज्युडिशियरी अपने आप तो कुछ कर नहीं सकती। सरकार को भी इसके बारे में सोचना पडे़गा। 5 करोड़ तो बहुत ही ज्यादा केसेज हैं। जैसा चल रहा है पता नहीं केसेज कब खत्म होंगे।

सवाल: आपने ज्युडिशियरी में ऑनलाइन सिस्टम शुरू कराने में भूमिका निभाई। उसमें अभी क्या कमियां देखते हैं? जस्टिस लोकुर: वो पिकअप नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट में तो ऑनलाइन हो गया है। लेकिन, तालुका लेवल पर शायद कहीं नहीं हुआ है। तालुका स्तर पर तो गरीब लोग ही हैं। वे कहां ऑनलाइन फाइल करेंगे। उनके बारे में सोचना चाहिए। ये नहीं कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के बारे में ही सोचें। जो जिला और तालुका स्तर के कोर्ट हैं उनके बारे में भी सोचना चाहिए।

सवाल: बांग्लादेश की पूर्व पीएम शेख हसीना को फांसी की सजा हुई है? इस पर आप क्या कहेंगे? जस्टिस लोकुर: अभी फैसला तो मैंने देखा नहीं है। अभी फोन पर देखा कि उनको डेथ पैनाल्टी मिल गई है। उनके खिलाफ मैंने अखबार में जो पढ़ा है वो क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटीज का केस था। क्राइम अगेंस्ट ह्यूमैनिटीज का तो नॉर्मली जहां पर है वहां डेथ पैनाल्टी देते हैं। कई देश ऐसे हैं जो डेथ पैनाल्टी नहीं मानते। इट्स अ वेरी सीरियस ऑफेंस।

सवाल: कॉलेजियम सिस्टम में और क्या मुख्य बदलाव होने चाहिए? जस्टिस लोकुर: मुख्य बदलाव तो ट्रांसपेरेंसी का होना चाहिए। कुछ छोटे-मोटे बदलाव तो होते हैं। पहले जो उन्होंने कहा था कि हम पूरा डीटेल्ड रेजोल्यूशन पास करेंगे। अब उन्होंने कहा कि हम डीटेल्ड रेजोल्यूशन क्या, रेजोल्यूशन ही पास नहीं करेंगे। सिर्फ स्टेटमेंट देंगे। ये तो सुप्रीम कोर्ट को देखना है। जहां तक मेरी बात है तो मैं समझता हूं कि ट्रांसपेरेंसी आनी चाहिए।

सवाल: कई बार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर सवाल उठाए जाते हैं? जस्टिस लोकुर: वो तो दैट इज अ पार्ट ऑफ डेमोक्रेसी… हर एक फैसला तो ठीक नहीं हो सकता। उसमें सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया तो लोग सपोर्ट करेंगे और अपोज करेंगे।

सवाल: क्या भारत में न्यायपालिका उतनी स्वतंत्र है जितनी हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना की थी? जस्टिस लोकुर: ये बड़ा मुश्किल सवाल है। लेकिन, एडमिनिस्ट्रेटिव एरिया में तो मेरे हिसाब से सरकार का एंटरफेयरेंस लग रहा है। ज्यूडिशियल फंक्शनिंग में तो मेरे पास कोई एविडेंस नहीं है कि कोई हस्तक्षेप है।

सवाल: कोर्ट रूम की पूरी कार्रवाई लाइव है। उसके वीडियो सोशल मीडिया पर आते हैं तो कहा जाता है कि उन्हें हटाना चाहिए। इस पर आप क्या सोचते हैं? जस्टिस लोकुर: अगर सुप्रीम कोर्ट या किसी कोर्ट का ऑब्जेक्शन है तो वो बंद कर सकते हैं। ये कहना कि सोशल मीडिया पर नहीं आना चाहिए। केवल रिकॉर्डिंग होनी चाहिए। अगर रिकॉर्डिंग होगी तो जरूर आएगा।

सवाल: ज्युडिशयरी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का आप कितना रोल मानते हैं? जस्टिस लोकुर: अभी तक तो कुछ खास है नहीं। आगे कैसे करेंगे, क्या करेंगे कुछ कह नहीं सकते।

सवाल: देश में ईवीएम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं? जस्टिस लोकुर: मेरी कोई राय नहीं है।

सवाल: जो युवा ज्युडिशियरी में आना चाहते हैं उन्हें आप क्या कहना चाहेंगे? जस्टिस लोकुर: आप भारत के संविधान के बारे में सोचिए। जो संविधान में लिखा है उसे मानिए। कॉन्स्टीट्यूशन स्पिरिट का ध्यान रखिए। ईमानदारी से काम कीजिए।

सवाल: सुप्रीम कोर्ट में जज रहते हुए कौन सा फैसला था, जिसने आपको व्यक्तिगत रूप से बदला हो? जस्टिस लोकुर: मैं अपने फैसलों के बारे में बात नहीं करना चाहता।

सवाल: अब रिटायरमेंट के बाद आप समाज के लिए क्या करना चाहते हैं? जस्टिस लोकुर: समाज के लिए जो मैं कर रहा हूं वो कंटिन्यू करना चाहता हूं। जैसे मैं यहां पर आया हूं तो समाज के प्रोग्राम में जितना कंट्रीब्यूशन कर सकता हूं, मैं करूंगा।

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