इंदौर जिला प्रशासन महू में 60 करोड़ रुपए कीमत की 18 बीघा सरकारी जमीन से कब्जा हटाकर अपनी पीठ थपथपा रहा है, लेकिन इसी प्रशासन की नाक के नीचे एक ऐसा ‘खेल’ चल रहा है जो पूरे सिस्टम को सवालों के कटघरे में खड़ा करता है। यह मामला महू के सांतैर गांव का है। यहां रसूलपुरा की 24.55 एकड़ जमीन को हाईकोर्ट ने सरकारी घोषित किया
इसके बाद भी इसके एक हिस्से को न केवल अवैध रूप से एक निजी व्यक्ति के नाम कर दिया गया, बल्कि अदालती रोक के बावजूद उसका डायवर्शन तक कर दिया गया है। जमीन पर संचालित 123 साल पुराने मिशनरी स्कूल प्रबंधन ने कमिश्नर से लेकर कलेक्टर तक इसकी शिकायत की है, लेकिन अब तक सुनवाई नहीं हुई है।
जमीन के जिस हिस्से को निजी बताकर डायवर्शन किया है, उसकी कीमत करीब 30 करोड़ रुपए है। किस तरह से ये जमीन सरकारी जमीन प्राइवेट हो गई

5 पॉइंट्स में जानिए कैसे जमीन ‘सरकारी’ से ‘प्राइवेट’ हुई
मसीह समिति कोर्ट पहुंची: जमीन पर हुए कब्जे के बाद ईसाई मिशनरी स्कूल की मसीह समिति की तरफ से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। मसीह समिति के प्रतिनिधि संजय नेल्सन बताते हैं कि महू की वर्षा गर्ग की तरफ हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। कोर्ट ने मिशनरी के पक्ष में ही आदेश दिए, लेकिन प्रशासन ने अदालतों के सभी आदेशों को ताक पर रखकर काम किया।
हाई कोर्ट का आदेश (10 अप्रैल 2019):कोर्ट ने समिति की तरफ से दायर जनहित याचिका (क्रमांक 27086/2018) पर सुनवाई करते हुए खसरा नंबर 68 और 69 को सरकारी भूमि घोषित कर दिया। यह आदेश किसी भी निजी व्यक्ति के दावे को सिरे से खारिज करता था।
तहसीलदार का ‘खेल’: हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद, महू तहसीलदार ने खसरा नंबर 68/1 के लगभग ढाई बीघा हिस्से का बटांकन (विभाजन) करते हुए उसे मांगीलाल पिता राजाराम नामक व्यक्ति के नाम पर दर्ज कर दिया। यह सीधे तौर पर हाई कोर्ट के आदेश की अवमानना थी।
एसडीएम ने लगाई मुहर (जनवरी 2025): हद तो तब हो गई जब महू के तत्कालीन एसडीएम राकेश परमार ने 25 जनवरी 2025 को इस अवैध रूप से बांटी गई जमीन का डायवर्शन भी कर दिया। यानी, कृषि भूमि को व्यवसायिक या आवासीय उपयोग के लिए परिवर्तित करने की अनुमति दे दी गई, जिससे उसकी कीमत कई गुना बढ़ गई।
सुप्रीम कोर्ट और जिला न्यायालय का हस्तक्षेप: जब समिति इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई, तो शीर्ष अदालत ने उन्हें नागरिक न्यायालय (सिविल कोर्ट) में अपना दावा पेश करने की अनुमति दी। इसके बाद, चतुर्थ जिला न्यायाधीश, महू ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 23 सितंबर 2025 को जमीन पर “यथास्थिति” (Status Quo) का आदेश जारी कर दिया, जिसका मतलब है कि जमीन पर किसी भी प्रकार का कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

सूचना के अधिकार के तहत नहीं दी जानकारी घोटाले की आशंका तब और पुख्ता हो गई जब प्रबंध समिति ने सूचना के अधिकार के तहत बटांकन आदेश की प्रतिलिपि पाने के लिए लोक सेवा केंद्र में आवेदन किया। तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी उन्हें कॉपी नहीं दी गई। मोबाइल पर मैसेज आया कि आकर कॉपी ले जाएं, लेकिन जब वे केंद्र पर पहुंचे तो उन्हें खाली हाथ लौटा दिया गया। संजय नेल्सन का आरोप है कि यह स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड को सार्वजनिक होने से रोकने और मामले को दबाने का प्रयास है।
कौन है यह रहस्यमयी ‘मांगीलाल’? शिकायतकर्ता संजय नेल्सन का दावा है कि जिस मांगीलाल पिता राजाराम के नाम पर यह 30 करोड़ी जमीन की गई है, वैसा कोई व्यक्ति गांव में रहता ही नहीं है। यह एक फर्जी नाम हो सकता है, जिसे सिर्फ कागजों में खड़ा किया गया है ताकि जमीन हड़पी जा सके।

इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी
जब हाई कोर्ट ने जमीन को सरकारी घोषित कर दिया था, तो तहसीलदार और एसडीएम ने उसे निजी व्यक्ति के नाम कैसे कर दिया?
क्या यह सिर्फ दो अधिकारियों की गलती है या इसमें ऊपर से नीचे तक एक पूरी चेन शामिल है?
कागजी रिकॉर्ड और आदेश की कॉपी क्यों छिपाई जा रही है? इसके पीछे किसका डर है?
काल्पनिक व्यक्ति के नाम पर जमीन का आवंटन क्या एक बड़े संगठित भूमि घोटाले का हिस्सा है?
प्रशासन का दोहरा चरित्र, कहीं वाहवाही, कहीं मिलीभगत? यह मामला इंदौर जिला प्रशासन के दोहरे चरित्र को भी उजागर करता है। अभी पांच दिन पहले ही कलेक्टर शिवम वर्मा के नेतृत्व में प्रशासन ने महू में 60 करोड़ की सरकारी जमीन को मुक्त कराने पर खूब वाहवाही लूटी थी। कलेक्टर ने बयान दिया था कि ‘शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे लेकिन सांतैर गांव के मामले में उन्हीं के मातहत अधिकारी इसके उलट काम करते दिख रहे हैं।
एसडीएम बोले – मामले की जांच करेंगे मामले में महू एसडीएम राकेश परमार का कहना है कि मामले की जांच कर दिखवाया जाएगा। ग्राम सांतैर निवासी मांगीलाल पिता राजाराम नाम का व्यक्ति है या नहीं ये देखना पड़ेगा, क्योंकि जिस नाम से आवेदन आया होगा वो होगा। जमीन सरकारी है मेरे संज्ञान में है।
