“मंदिर के पक्ष में फैसला देने वाले जस्टिस स्वामीनाथन पर महाभियोग की तैयारी: 107 विपक्षी सांसदों ने दिया नोटिस; मदुरै के तिरुपरंकरुणम मंदिर-दरगाह विवाद की जड़ें सदियों पुरानी”

तमिलनाडु में एक मंदिर और दरगाह के पुराने विवाद पर फैसला सुनाने वाले हाईकोर्ट के जज पद से हटाए जा सकते हैं। जस्टिस स्वामीनाथन ने तमिलनाडु की DMK सरकार को आदेश दिया कि हिंदुओं को मंदिर परिसर के पास एक खंभे पर दिया जलाने दिया जाए। सरकार ने फैसला नहीं माना, तो CISF जवानों की निगरानी में हिंदुओं को दीपोत्सव मनाने की अनुमति दे दी।

इस पर बवाल हुआ और 107 विपक्षी सांसदों ने लोकसभा में महाभियोग का नोटिस देकर जज पर हिंदू समुदाय का पक्ष लेने और सेकुलरिज्म के खिलाफ काम करने के आरोप लगाए।

सवाल-1: जस्टिस स्वामीनाथन को पद से क्यों हटाना चाहते हैं 107 विपक्षी सांसद?

जवाब: तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK की

सांसद कनिमोझी, सपा सांसद अखिलेश यादव और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी जैसे 107 विपक्षी सांसदों ने 9 दिसंबर को लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को एक नोटिस भेजा। इसमें मद्रास हाईकोर्ट के जज जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाकर उन्हें पद से हटाने की मांग की गई। सांसदों ने नोटिस की कॉपी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत को भी सौंपी है।

नोटिस में संविधान के आर्टिकल 217 और 124 के तहत जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग लाने के 3 आधार बताए हैं…

1. जस्टिस स्वामीनाथन का आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता, पारदर्शिता और धर्मनिरपेक्ष कार्यप्रणाली के खिलाफ है।

2. वह सीनियर वकील एम. श्रीचरण रंगनाथन और एक ‘खास समुदाय के वकीलों’ को फायदा पहुंचाने के लिए पक्षपात करते हैं।

3. वह एक ‘खास राजनीतिक विचारधारा के आधार पर’ भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ जाकर कोर्ट में फैसले सुना रहे हैं।

9 दिसंबर को अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी वाड्रा समेत 107 सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला को औपचारिक नोटिस सौंपा।

सवाल-2: मदुरै के मंदिर और दरगाह में विवाद का पूरा मामला क्या है?

जवाब: तमिलनाडु के मदुरै से महज 10 किलोमीटर

दूर तिरुपरंकरुणम नाम की पहाड़ी है। यहां भगवान मुरुगन यानी कार्तिकेय का एक मंदिर है। इसे ‘तिरुपरंकरुणम मुरुगन कोयिल’ या सुब्रमण्या स्वामी मंदिर कहा जाता है।

ये मंदिर 8वीं सदी में पल्लव राजवंश के समय का बताया जाता है। किंवदंती है कि यहां देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था। मंदिर की पहाड़ी के शिखर पर एक 16 फीट का प्राचीन स्तंभ भी है। इस खंभे को इलाके के हिंदू कोडिमरम यानी धर्मस्तंभ कहते हैं। इसी के नीचे सालाना कार्तिकई दीपम उत्सव होता था। हिंदू दावे के मुताबिक, यह खंभा मुरुगन मंदिर का हिस्सा है, जहां प्राचीन काल से भक्त एक बड़ा सा दीपक जलाते थे।

पहाड़ी के एक हिस्से पर सूफी परंपरा को मानने वाले योद्धा सिकंदर शाह की दरगाह है। 13वीं सदी में विजयनगर साम्राज्य के हिंदू राजा से हुए युद्ध में सिकंदर शाह की मृत्यु हो गई थी। मान्यता है कि राजा ने सिकंदर

1890 में मद्रास हाईकोर्ट ने पहाड़ी को ‘तिरुपरंकरुणम हिल’ नाम दिया, जो हिंदू मान्यता के मुताबिक है। 1909 में ब्रिटिश सरकार ने अपने एक आदेश में पहाड़ी को हिंदुओं का ‘पवित्र लिंग’ कहा।

1915 में मंदिर के प्रशासन और दरगाह के ट्रस्टियों के बीच पहाड़ी की जगह पर विवाद शुरू हो गया। 1920 में इसे लेकर ट्रायल कोर्ट ने एक फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि हिंदुओं की प्राचीन प्रवित्र जमीन मंदिर की है, जिसके कब्जे पर कोई विवाद नहीं है।

1994 में राज्य सरकार ने पहाड़ी के शिखर पर दीपक जलाने की मांग खारिज कर दी। सरकार का कहना था कि इसे दरगाह के आसपास के इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैलेगा।

इसके बाद हिंदू महासभा और अन्य हिंदू संगठनों ने कोर्ट में याचिकाएं दीं, 2005 में दरगाह के ट्रस्टियों ने एक लोकल पीस कमेटी के दखल के बाद कार्तिकई उत्सव के दौरान खंभे के पास दीपक जलाने की अनुमति दी, लेकिन बाद में विवाद के चलते स्थानीय प्रशासन ने इस पर रोक लगा दी।

2020 में कोविड के दौरान विवाद भड़का, जब हिंदू कार्यकर्ता राम रविचंद्रन ने कोर्ट में मांग कि खंभे के आसपास बनी सीढ़ियां और बाड़ वगैरह को हटाने

30 नवंबर 2025 की परफॉर्मेंस रिपोर्ट, जिसके मुताबिक जस्टिस स्वामीनाथन ने पिछले 8 सालों में 73,505 फैसले सुनाए।

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