सुप्रीम कोर्ट का तलाक-ए-हसन पर बड़ा हस्तक्षेप: वकील की दो बार तलाक की कोशिश पर रोक, दंपति को माना जाएगा विवाहित; जस्टिस कुरियन जोसेफ के पास मध्यस्थता भेजा मामला

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते एक वकील द्वारा अपनी पत्नी को तलाक-ए-हसन के जरिए दो बार तलाक देने की कोशिशों पर रोक लगा दी है। अदालत ने पति द्वारा दूसरी शादी करने के बावजूद, पति-पत्नी के बीच सुलह करने के लिए मध्यस्थता का रास्ता दिखाया है। यह फैसला तब आया जब वकील के तलाक के तरीके पर सवाल उठे और पत्नी ने कहा कि उसे अभी तक वैध तलाक नहीं मिला है।

यह मामला तब सामने आया जब एक वकील यूसुफ नकी ने अपनी पत्नी, बेनजीर हीना को तलाक-ए-हसन के जरिए तलाक देने की कोशिश की। तलाक-ए-हसन में मुस्लिम पुरुष तीन महीने की अवधि में हर महीने एक बार तलाक शब्द कहकर विवाह को खत्म कर सकता है। वकील ने पहली बार 2022 में तलाक दिया था। लेकिन, पत्नी ने इस तलाक को चुनौती दी। उसने कहा कि इससे मुस्लिम महिलाओं को मुश्किल होती है क्योंकि उन्हें गुजारा भत्ता नहीं मिलता।

कोर्ट ने मध्यस्थता के लिए कहा

शरिया, मुस्लिम व्यक्तिगत कानून और इसके धार्मिक निहितार्थों की परस्पर विरोधी व्याख्याओं के बीच सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए राजी किया। मामले में पत्नी का कहना था कि उसे वैध तलाक नहीं मिला है, इसलिए वह दूसरी शादी नहीं कर सकती। वहीं दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल ने वैध तलाक दिया है। लेकिन पत्नी के वकील ने इस पर आपत्ति जताई और दूसरी बार तलाक देने को गलत बताया।

इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा, ‘शादी के झगड़ों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की सख्त जरूरत है। हमें यह भी देखना होगा कि तलाक-ए-हसन सही तरीके से दिया गया था या नहीं और कोई दूसरा रास्ता निकाला जा सके।’

कोर्ट ने जारी किए आदेश

पीठ ने कहा, ‘हम निर्देश देते हैं कि पक्षों को तब तक वैध रूप से विवाहित जोड़ा माना जाएगा जब तक कि पति आगे आकर यह नहीं दिखाता कि वैध तलाक दिया गया है। संबंधित थानेदार को पति के ठिकाने का पता लगाना होगा और इस अदालत के समक्ष उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी।’

जस्टिस कुरियन जोसेफ की बेंच के पास मध्यस्थता के लिए भेजा

कोर्ट ने दोनों पक्षों को पूर्व सुप्रीम कोर्ट के जज कुरियन जोसेफ के पास मध्यस्थता के लिए भेजा। खास बात यह है कि जस्टिस कुरियन जोसेफ वही जज थे जिन्होंने 2017 में तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने वाली बेंच में थे।

कोर्ट के इन दोनों फैसलों के बाद, वकील के वकील ने कहा कि इससे यह गलतफहमी नहीं फैलनी चाहिए कि तलाक-ए-हसन मुस्लिम समुदाय में तलाक का अमान्य तरीका है। बेंच ने साफ किया कि उन्होंने तलाक-ए-हसन की वैधता पर कोई राय नहीं दी है। कोर्ट का मकसद सिर्फ दोनों पक्षों के बीच सुलह की संभावना तलाशना है।

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