
महाकाल मंदिर विस्तार परियोजना के लिए वर्ष 2021 से 2023 के बीच जिन लोगों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया, उनके मुआवजे के वितरण में नियमों का पालन नहीं किया गया। शासन से मुआवजे के लिए मिले 97 करोड़ रुपए अफसरों ने पीडी (पर्सनल डिपॉजिट) अकाउंट में जमा कराने के बजाय नगर निगम आयुक्त और भू-अर्जन अधिकारी के नाम पर खोले गए बैंक खातों में जमा करा दिए।
इसके बाद इन्हीं खातों से मुआवजा वितरण भी शुरू कर दिया गया। नियमों के मुताबिक यह राशि जिला स्तर के पीडी अकाउंट में जमा होना जरूरी था, ताकि पूरी प्रक्रिया शासन की निगरानी में रहे। अब स्टेट फाइनेंस इंटेलिजेंस सेल ने गड़बड़ी को पकड़ते हुए लेनदेन को संदिग्ध माना है।
कोष एवं लेख आयुक्त ने राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव को जांच के लिए पत्र लिखा है। पूछा गया है कि नगर निगम व भू-अर्जन अधिकारी के खातों में राशि जमा कराने के लिए वित्त विभाग से मंजूरी ली गई थी या नहीं। बिना मंजूरी सरकारी खातों के संचालन, ट्रांजेक्शन व खातों में जमा राशि को दोबारा भू-अर्जन के पीडी अकाउंट में जमा कराने की जांच की बात कही है।

गड़बड़ी इसलिए… ताकि निगरानी से दूर रहे यह राशि असर… 3 साल से 20 करोड़ का मुआवजा अटका हुआ
महाकाल मंदिर विस्तार व बड़ा गणेश मंदिर से 24 खंभा व अहिल्याबाई मार्ग चौड़ीकरण के लिए 2021 से 2023 के बीच बड़े स्तर पर जमीन अधिग्रहण हुए। इनमें तकिया मस्जिद क्षेत्र का 66 करोड़ रु. का अधिग्रहण सबसे बड़ा था। मुआवजे की यह राशि नियमानुसार शासन के पीडी अकाउंट में जमा होनी थी, ताकि पूरा भुगतान और लेनदेन सरकार की रियल टाइम निगरानी में रहे।
लेकिन राशि नगर निगम और भू-अर्जन अधिकारी के नाम पर खोले गए बाहरी खातों में जमा कर दी गई। इससे न सिर्फ निगरानी कमजोर हुई, बल्कि रुपए ट्रैक करना भी मुश्किल हो गया। यही वजह है कि मुआवजा वितरण की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। स्थिति यह है कि 3 साल बाद भी करीब 20 करोड़ रु. का मुआवजा अब तक नहीं बंट सका है।