किसी की मृत्यु के बाद उसकी आंखें किसी दूसरे के जीवन में उजाला बन सकती हैं। इस सोच को जन-आंदोलन का रूप देने में इंदौर ने पूरे मध्य प्रदेश में मिसाल कायम की है।
नेत्रदान के क्षेत्र में प्रदेश का सिरमौर बन चुके इंदौर में पिछले 12 वर्षों में 18 हजार से अधिक लोगों ने नेत्रदान किया है। इनमें से 14 हजार से ज्यादा जरूरतमंदों की अंधेरी दुनिया में फिर से रोशनी लौटी है।आज 10 जून को ‘विश्व दृष्टि दान दिवस’ के अवसर पर यह उपलब्धि न केवल चिकित्सा क्षेत्र की सफलता है, बल्कि शहर की संवेदनशीलता, जागरूकता और सामाजिक सहभागिता का भी प्रतीक है।अब स्थिति यह है कि इंदौर में हर माह 100 से अधिक परिवार अपने स्वजन की मृत्यु के बाद नेत्रदान का निर्णय लेकर किसी अनजान व्यक्ति के जीवन में प्रकाश पहुंचा रहे हैं।

हर साल बढ़ रही जागरूकता, बढ़ रहे नेत्रदान
वर्तमान में शंकरा आई बैंक, एमके इंटरनेशनल आई बैंक और चोइथराम आई बैंक संचालित हैं। इसके अलावा मुस्कान ग्रुप, दधीचि मिशन, गोल्ड क्वाइइन सहित अन्य एनजीओ जुड़े हैं।
शंकरा आई बैंक की डॉ. जयश्री लिलानी के अनुसार नेत्रदान को बढ़ावा देने में विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पिछले पांच वर्षों में केवल शंकरा आई बैंक को 2700 से अधिक कॉर्निया प्राप्त हुए, जिनमें से 1670 कॉर्निया का सफल ट्रांसप्लांट किया गया। कॉर्निया ट्रांसप्लांट की सफलता दर 70 से 80% तक है।

मौत के बाद भी जिंदगी रोशन कर जाती हैं आंखें
एक्सपर्टस के मुताबिक नेत्रदान के बाद प्राप्त कॉर्निया का उपयोग सीधे ट्रांसप्लांट में नहीं किया जाता। पहले डोनर की एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी सहित अन्य जरूरी जांच की जाती है। सभी रिपोर्ट सामान्य आने पर ही कॉर्निया का प्रत्यारोपण किया जाता है।

बच्चों से बुजुर्गों तक को मिल रही नई दृष्टि
कॉर्निया प्रत्यारोपण से लाभान्वित होने वालों में हर आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। जन्मजात कॉर्निया संबंधी समस्याएं, आंखों में सफेदी आना, दुर्घटनाओं में आंखों की क्षति, केमिकल या चूने से दृष्टि प्रभावित होना जैसी स्थितियों में कॉर्निया ट्रांसप्लांट नई उम्मीद बनता है। कई मरीजों को एक आंख तो कई को दोनों आंखों में प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।
एक संकल्प, जो दुनिया बदल सकता है
नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि नेत्रदान सबसे सरल और प्रभावी दान में से एक है। मृत्यु के बाद भी व्यक्ति की आंखें दो लोगों को दृष्टि दे सकती हैं। इंदौर की बढ़ती नेत्रदान संस्कृति इस बात का प्रमाण है कि जब समाज संवेदनशील बनता है तो किसी की जिंदगी में अंधेरा नहीं, उजाला पहुंचता है।

6 हजार से ज्यादा लोगों की आंखों से जुटाए कॉर्निया
नेत्रदान की इस प्रेरणादायी मुहिम को गति देने वाले व्यक्ति न तो डॉक्टर हैं और न ही किसी बड़े सामाजिक संगठन के पदाधिकारी। इंदौर के 58 वर्षीय इलेक्ट्रॉनिक व्यवसायी जितेंद्र बगानी (जीतू ग्रेजुएट) ने अपने समर्पण और सेवा भाव से हजारों लोगों की जिंदगी में रोशनी पहुंचाने का काम किया है।
मुस्कान संस्था से जुड़े जितेंद्र बगानी अब तक 6 हजार से अधिक नेत्रदाताओं से कॉर्निया प्राप्त कर चुके हैं। इसके लिए उन्होंने विशेषज्ञ डॉक्टरों से विशेष प्रशिक्षण लिया और वर्षों से दिन-रात इस सेवा कार्य में जुटे हुए हैं।जितेंद्र बगानी बताते हैं कि किसी भी नेत्रदान की सूचना मिलते ही वे तुरंत मौके पर पहुंच जाते हैं। कभी घर, कभी अस्पताल, कभी एम्बुलेंस तो कभी मुक्तिधाम में भी उन्हें यह जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।
वे महज चार मिनट में कॉर्निया और आई बॉल निकालने की प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं, जिससे समय रहते जरूरतमंद मरीजों तक नेत्र पहुंचाए जा सके।उनकी इस निस्वार्थ सेवा ने इंदौर में नेत्रदान आंदोलन को नई पहचान दी है। हजारों परिवारों को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समाज में उन्हें आज नेत्रदान अभियान के एक सच्चे ‘मिशन मैन’ के रूप में देखा जाता है।
