
दो महीने पहले अतिक्रमण बताकर हमारे घर तोड़ दिए। इसके बाद हमारा हाल जानने कोई नहीं आया। किसी को मतलब नहीं कि हम जिंदा हैं या मर गए। किसको अपना दुख बताएं। कोई सुनने वाला नहीं है। ऐसा लगता है मौत के बाद ही सरकारी हमारी व्यवस्था बना पाएगी।
रीवा के रहटगांव में यह दर्द केवल जगदीश केवट का नहीं बल्कि 23 परिवारों का है। दो महीने पहले इनके मकानों को अतिक्रमण बताकर प्रशासन ने तोड़ दिया था। इसके बाद से यह सभी परिवार खुले में कड़कड़ाती ठंड में रहने को मजबूर हैं। हालात यह हो गए हैं कि सर्दी के कारण बुजुर्ग और बच्चों की सेहत खराब होने लगी है, लेकिन प्रशासन ने अब तक इनके रहने का कोई इंतजाम नहीं किया है।
गांव वालों का कहना है कि 10 लोगों को नोटिस मिला था, लेकिन 23 मकान बगैर किसी सूचना के तोड़ दिए गए। कार्रवाई के समय कुछ लोग तो घर पर भी नहीं थे। इसमें सात मकान प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने हुए थे। योजना के तहत डेढ़ लाख रुपए स्वीकृत हुए थे। बाद में हमें एक लाख 20 हजार रुपए ही मिले। राशि कम पड़ने पर ब्याज से रुपए लेकर बड़ी मुश्किल से अपनी छत बनाई थी। अब हमारे विस्थापन के लिए प्रशासन कोई मदद नहीं कर रहा।
ये दर्द है उन परिवारों का जिनके प्रधानमंत्री आवास अतिक्रमण में पाए जाने के कारण गिराए गए। वादे के मुताबिक उनकी व्यवस्था नहीं की गई। हालांकि कलेक्टर प्रतिभा पाल का कहना है कि मामला संज्ञान में आया है। अतिक्रमण पर कार्रवाई की गई थी, लेकिन यह मालूम नहीं था कि ठंड में परिवार समस्या झेल रहे हैं। जल्द ही उनकी व्यवस्था बनाई जाएगी

हाईकोर्ट के आदेश पर तोड़े थे 23 पक्के मकान रहटगांव में 4 पीढ़ियों से जहां यह लोग रह रहे थे, उन मकानों को अतिक्रमण में आने के कारण तोड़ दिया गया। हाईकोर्ट में रामकिशोर ने जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें कोर्ट ने तालाब के आस-पास मौजूद घरों को अतिक्रमण माना। हाईकोर्ट के आदेश पर 8 अक्टूबर को 23 पक्के मकान तोड़ दिए गए।
मकानों को तोड़ने के पहले जिला प्रशासन ने इनके विस्थापन की कोई व्यवस्था नहीं की। लिहाजा परिवार छोटे-छोटे बच्चों को लेकर मलबे के ढेर के बीच तंबू लगाकर रह रहे हैं। पीड़ितों का आरोप है कि पंचायत ने सरकारी जमीन पर प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत किया था। अब अतिक्रमण बताकर तोड़ दिया गया।
बता दें कि एक व्यक्ति को केवल एक ही बार प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पात्र माना जाता है। अब जिनके घर तोड़ दिए हैं उन लोगों का कहना है कि अगर ये अतिक्रमण था तो हमारी प्रधानमंत्री आवास की राशि क्यों खर्च करवा दी गई। पंचायत ने हमें इस जमीन पर आवास बनाने की स्वीकृति कैसे दी? हमें तो ये कहा गया था कि जो जिस जगह पर पीढ़ियों से बसा है, उसे उसी जगह पर आवास और जमीन का पट्टा दिए जाने का नियम है

तंबू में गुजर रहीं रातें, वादे का क्या हुआ? फूलमती केवट ने बताया कि हमने भी बड़ी उम्मीद के साथ अपने घर बनाए थे। हमारी पिछली तीन पीढ़ियां इसी जगह पर कच्चे मकान में रहा करतीं थी। प्रधानमंत्री आवास योजना से मदद मिली तो ऐसा लगा कि सपनों को पर लग गए। लेकिन हमारे घर गिरा दिए गए। हम तंबू में रह रहे हैं।
महीने भर के भीतर व्यवस्था बनाने का वादा किया गया था। हम पूछना चाहते हैं कि आखिरकार उस वादे का क्या हुआ। कहा गया था कि जमीन चिन्हित की गई है। उस जगह पर हमें पट्टे दिए जाएंगे। जिनके प्रधानमंत्री आवास तोड़ दिए गए, उन्हें आवास दिए जाएंगे। लेकिन सारे वादे धरे के धरे रह गए।

बच्चे बीमार पड़ गए, दवाई के लिए पैसे नहीं बचे संगीता केवट ने बताया कि बच्चे तंबू में रह रहे हैं। एक बच्चे की उम्र 2 साल है तो एक की 5 साल। हम तो किसी कदर ठंड बर्दाश्त कर पा रहे हैं, लेकिन बच्चे ठंड सहन नहीं कर पा रहे। डॉक्टर को दिखाने के लिए बार-बार रीवा जाना पड़ रहा है। रीवा की यहां से दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। ऐसे में आने-जाने में बार-बार ऑटो का किराया देना पड़ रहा है।
डॉक्टरों को भी फीस देनी पड़ रही है। हम रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं। घर गिरने के बाद खाने के लाले पड़े हैं। ऐसे में हम डॉक्टरों की फीस कहां से चुका पाएंगे। बार-बार बच्चे बीमार हो रहे हैं। अगर उन्हें कुछ हो गया तो उसके लिए कौन जवाबदार होगा

दोबारा पीएम आवास योजना का लाभ मिलेगा? सुक्खी केवट ने बताया कि हम भोले-भाले लोग हैं। चार पीढ़ी से जहां हमारे खानदान के लोग रह रहे थे, हमने भी उसी जगह पर अपने मकान बनाए। फर्क बस इतना था कि वे कच्चे मकान में रह रहे थे। हम अब पक्के मकान में रहने लगे थे। सरपंच और सचिव आए। वह हमसे बोलने लगे कि जिस जगह पर रह रहे हो वही प्रधानमंत्री आवास बनेगा। बाकायदा पंचायत की तरफ से कई बार हमारी तस्वीर खींची गई।
प्रधानमंत्री आवास के पैसे हमें मिले। हमने घर बनवाए तो अब घर गिरा दिए गए। रहने का कोई ठिकाना नहीं है। क्या हमें दोबारा प्रधानमंत्री आवास का लाभ मिलेगा। किसी गरीब के लिए पक्का घर बनाना एक बड़े सपने की तरह होता है। जिसे वह जीवन में एक बार बड़ी मुश्किल से पूरा कर पाता है।

पक्का घर बनवाने के लिए 50 हजार कर्ज लिया सुक्खी कहती हैं जिस तरह से हमारे घर गिरा दिए और उसके बाद कोई व्यवस्था नहीं की गई। हम पर बड़ा कर्ज में है। प्रधानमंत्री आवास योजना से हमें डेढ़ लाख रुपए मिलने चाहिए थे। लेकिन केवल 1,20,000 रुपए ही मिले। 30 हजार रुपए कौन खा गया इसका कोई पता नहीं है। घर बनवाने के लिए मैंने 50 हजार रुपए का कर्ज लिया। उसे कर्ज के बदले हमें 7% ब्याज देना पड़ रहा है। वह कर्ज अभी तक हम नहीं चुका पाए हैं।
हमारा घर जमींदोज हो चुका है। रोजमर्रा की गृहस्थी में न जाने कितने खर्च होते हैं, लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं है। बस एक वक्त का खाना मिल जा रहा है वही बड़ी चीज है। तंबू लगाकर इतना बड़ा जीवन कैसे काटेंगे, कुछ समझ नहीं आ रहा। हर महीने कर्ज चुकाने की चिंता भी बनी रहती है। जब तक पक्का घर था तो किसी तरह कर्ज चुका रहे थे। जिस घर के लिए कर्ज लिया था। वह अब नहीं रहा। लेकिन हम कर्जदार हो गए।
प्रशासन के वादे पर पहले भी हमें भरोसा नहीं था गांव के जगदीश केवट ने कहा कि प्रशासन के वादे पर पहले भी भरोसा नहीं था। व्यवस्था बनाना तो दूर हमारा हाल तक जानने के लिए कोई यहां पर नहीं आया। हमारा घर गिराने के बाद सब हमें भूल गए। किसी को कोई मतलब नहीं कि हम जिंदा हैं या मर गए। किसके पास जाएं किसको अपना दुख बताएं। यहां पर कोई सुनने वाला नहीं है। अब तो ऐसा लगता है कि हमारी मौत के बाद ही हमारी व्यवस्था बनाई जाएगी।

दिव्यांग महिला बोली- मैं रहम की भीख मांगती रही गीता केवट ने बताया कि मेरे घर से निकाल कर मुझे पुलिस वालों ने बाहर फेंक दिया। मैं उनसे रहम की भीख मांगती रही कि मुझे छोड़ दो, लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। दो महिला पुलिसकर्मियों ने मेरे पैर पकड़े। बाकी ने मेरे हाथ पकड़े। मुझे उठाकर मेरे घर से 300 मीटर दूर फेंक आए। फिर मेरे घर को जेसीबी लगाकर गिरा दिया।
मैं इस घटना से बहुत आहत हुई। मैंने दो दिन तक खाना नहीं खाया। फिर मैं निराश होकर रिश्तेदारी में चली गई। काफी समय तक रिश्तेदारों के घरों में दिन काटे। अब दोबारा रीवा लौट आई हूं। कलेक्ट्रेट से लेकर बाकी दफ्तरों के चक्कर काट रही हूं। लेकिन हमारी सुनने वाला कोई नहीं है।
मैं पूरी तरह से विकलांग हूं चलने-फिरने में असमर्थ हूं। कहीं जाने के लिए हाथ का सहारा लेना पड़ता है। हाथों के सहारे चलती हूं, फिर भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हूं। ऐसा लगता है कि शायद कोई सुन ले।
एसी घरों में रहने वाले क्या जानेंगे हमारा दर्द मोलई केवट ने कहा कि भला एसी घरों में रहने वाले बड़े लोग हमारा दर्द क्या जानेंगे। रोज मजदूरी करते हैं, तब जाकर घर का चूल्हा जलता है। अगर दो दिन घर में बैठ जाएं तो बीवी-बच्चे बिना भोजन मर जाएंगे। हम गरीब हैं साहब, लेकिन हम कोई अपराधी नहीं हैं। हमने ऐसा कोई अपराध नहीं किया है, जिसकी सजा हमें मिल रही है।
हमारे पूर्वज जिस स्थान पर रहे थे, हम भी वहीं रह रहे हैं। हमने कोई देशद्रोह नहीं किया। ना ही हमने कोई हत्या और चोरी-डकैती की है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि हमने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया। क्योंकि हमारे साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है।
2 महीने पहले पिता की मौत, अब छत भी नहीं पीड़ित रेशमा केवट (18) का कहना है कि दो माह पहले पिता का निधन हो गया था। मां और भाई के साथ रहती हूं। मौके पर तहसीलदार पहुंचे थे। मैं पूरे घटनाक्रम का वीडियो बना रही थी। तहसीलदार ने मुझे धमकाया कि अगर तुमने वीडियो बनाया, तो तुम्हारा पूरा करियर बरबाद कर दूंगा। जीवन में फिर कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। तंबू में जीवन कट रहा है।
