मध्यप्रदेश में बड़ा बदलाव: 2027 से नगर पालिका-परिषद अध्यक्षों का डायरेक्ट इलेक्शन, सरकार लाएगी नया कानून; बीजेपी ने बताया जनता की जीत, कांग्रेस ने निरंकुशता का खतरा जताया, डैमेज कंट्रोल में जुटी सरकार

मध्यप्रदेश में साल 2027 में होने वाले नगरीय निकाय चुनाव में नगर पालिका और परिषद अध्यक्षों को जनता सीधे चुनेगी। 26 अगस्त को कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव पर सहमति बनी है। सरकार कानून में संशोधन करेगी और इससे जुड़ा बिल विधानसभा के शीतकालीन सत्र में लाया जाएगा।

दरअसल, साल 2015 तक मप्र में नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों का डायरेक्ट इलेक्शन ही होता था। साल 2018 में बनी कमलनाथ सरकार ने नगर पालिका एक्ट में संशोधन कर इन्हें अप्रत्यक्ष प्रणाली से कर दिया था यानी अध्यक्षों को चुनने का अधिकार पार्षदों के पास आ गया। 15 महीने बाद कमलनाथ सरकार गिर गई। एक बार फिर बीजेपी की सरकार बनी।

साल 2022 में जब नगरीय निकाय चुनाव हुए तो मेयर को छोड़कर नगर पालिका और परिषद अध्यक्षों के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही हुए। अब सरकार कानून में बदलाव कर एक बार फिर डायरेक्ट इलेक्शन क्यों कर रही है? इससे क्या फायदा होगा और इसके क्या राजनीतिक मायने हैं..

जानिए, मोहन सरकार क्यों कर रही बदलाव

1. नगर पालिका अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव साल 2022 में नगर पालिका अध्यक्षों को जनता ने नहीं पार्षदों ने चुना था, लिहाजा उन्हें हटाने का अधिकार भी पार्षदों के ही पास था। नियम के मुताबिक, अध्यक्ष का दो साल का कार्यकाल होने के बाद पार्षद उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकते थे।

साल 2024 में अध्यक्षों को दो साल पूरे हुए और मप्र की एक दर्जन से ज्यादा नगर पालिका और परिषद के पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस देने की तैयारी कर ली। इनमें से ज्यादातर नगर पालिकाओं पर बीजेपी के अध्यक्ष काबिज थे।

दो केस से समझिए, कैसे लाए गए अविश्वास प्रस्ताव

नर्मदापुरम: 21 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव पर साइन किए थे नर्मदापुरम में नीतू यादव 29 वोट लेकर नगर पालिका अध्यक्ष बनी थीं, लेकिन 2 साल का कार्यकाल (11 अगस्त 2024) पूरा होने से पहले ही उन्हें पद से हटाने के लिए 21 पार्षदों ने न सिर्फ मोर्चा खोल दिया था, बल्कि अविश्वास प्रस्ताव पर दस्तखत भी कर दिए थे। तब पार्षदों का आरोप था कि उनकी अनदेखी हो रही है और अध्यक्ष विकास कार्यों में रुकावट बन रही हैं।

टीकमगढ़: सम्मेलन की तारीख भी तय हो चुकी थी टीकमगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष अब्दुल गफ्फार (पप्पू मलिक) को हटाने के लिए विशेष सम्मेलन की तारीख भी तय हो गई थी। यहां 19 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। जिनमें से भाजपा के 11, कांग्रेस के 6 और 2 निर्दलीय पार्षद हैं। अधिकांश पार्षद, चाहे वह पक्ष हो या विपक्ष, अध्यक्ष की कार्यप्रणाली से नाराज चल रहे थे। यह नाराजगी 20 अगस्त 2024 को अविश्वास प्रस्ताव के रूप में सामने आई थी।

विरोध को देखते हुए सरकार ने कानून ही बदल दिया अपनी ही पार्टी के नेताओं के मंसूबों को भांपकर सरकार ने कानून में बदलाव करते हुए अविश्वास प्रस्ताव की मियाद दो साल से तीन साल कर दी। एक साल बाद यानी 2025 में तीन साल की मियाद भी खत्म हो चुकी है। ऐसे में सरकार ने एक बार फिर कानून में संशोधन की तैयारी कर ली है।

एक अध्यादेश लाकर अविश्वास प्रस्ताव लाने की मियाद अब चार साल कर दी जाएगी। इससे जुड़ा बिल विधानसभा के शीतकालीन सत्र में लाया जाएगा।

2. संगठन भी डायरेक्ट इलेक्शन के पक्ष में बीजेपी संगठन भी चाहता है कि मेयर और अध्यक्ष को सीधे जनता चुने न कि पार्षद। जब कमलनाथ सरकार ने चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराने का प्रस्ताव पास किया था, तब बीजेपी ने इसका विरोध किया था। संगठन का मानना है कि भले ही निकाय में पार्टी के पार्षदों की संख्या कम हो, लेकिन मेयर और अध्यक्ष यदि पार्टी का होता है तो ये शहर के डेवलपमेंट के लिहाज से मुफीद है।

दूसरी तरफ जानकारों का मानना है कि बीजेपी बजाय पार्षदों के, अध्यक्ष और मेयर के इलेक्शन पर ज्यादा फोकस करती है। इससे जनता के बीच एक अलग मैसेज जाता है। पिछले 20-25 साल के चुनावी इतिहास को देखें तो बीजेपी नगरीय निकायों के मेयर-अध्यक्ष के चुनाव आसानी से जीत जाती है। वहीं, कांग्रेस को लगता है कि उनके लिए डायरेक्ट इलेक्शन जीतना संभव नहीं है।

विधायकों के दबाव में हुए थे इन-डायरेक्ट इलेक्शन कमलनाथ सरकार गिरने के बाद तत्कालीन शिवराज सरकार ने नगर पालिका एक्ट में आंशिक संशोधन करते हुए केवल मेयर के इलेक्शन डायरेक्ट कराए थे। सूत्र बताते हैं कि नगर पालिका-परिषद अध्यक्षों के इन-डायरेक्ट इलेक्शन का फैसला शिवराज सरकार ने विधायकों के दबाव में लिया था।

नगर पालिका-परिषद अध्यक्ष जनता के जरिए सीधे चुने जाते हैं तो वे विधायक से ज्यादा पावरफुल हो जाते हैं। वे विधायकों के दबाव में नहीं रहते। शहरी क्षेत्र के विधायकों को अपने क्षेत्र में विकास कामों के लिए उन पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी तरह का मामला मेयर के साथ भी है।

अब जानिए, क्या हैं डायरेक्ट इलेक्शन के फायदे और नुकसान

  • राइट टू रिकॉल का अधिकार: डायरेक्ट इलेक्शन में जनता को राइट टू रिकॉल का अधिकार मिल जाता है। यदि लोगों को लगता है कि अध्यक्ष जनता के हित में फैसला नहीं ले रहा है तो इस अधिकार का इस्तेमाल कर उसे कुर्सी से हटाया जा सकता है।
  • बिना दबाव के फैसले ले सकते हैं: डायरेक्ट इलेक्शन में पार्षदों की भूमिका न के बराबर होती है। पार्षद अध्यक्ष पर बेवजह का दबाव नहीं बना पाते।
  • जिस पार्टी का अध्यक्ष, उसे फायदा: नगर पालिका में सारे फैसले पीआईसी (प्रेसिडेंट इन काउंसिल) लेती है। ये राज्य की कैबिनेट की तरह काम करती है। जिस पार्टी का अध्यक्ष है, सत्ता उसी के हाथ होती है, भले ही उस पार्टी के पार्षदों की संख्या कम है।
  • खरीद-फरोख्त का कम खतरा: डायरेक्ट इलेक्शन से पार्षदों की खरीद-फरोख्त का खतरा न के बराबर होता है। इन-डायरेक्ट इलेक्शन में निर्दलीय पार्षदों की अहमियत बढ़ जाती है। वह अपने वोट का सौदा करने की स्थिति में होते हैं।
  • अध्यक्षों के निरंकुश होने का खतरा: इसका एक नुकसान ये है कि अध्यक्ष निरंकुश भी हो सकते हैं। वे मनमाफिक फैसले ले सकते हैं। हालांकि, उन्हें हटाने के अधिकार राज्य सरकार के पास होते हैं, लेकिन इसके लिए ठोस शिकायत और सबूत की जरूरत होती है।

बीजेपी पार्षद बोले- ये अच्छा फैसला नगर पालिका और परिषद के अध्यक्षों के डायरेक्ट इलेक्शन के सरकार के फैसले को लेकर नर्मदापुरम की बीजेपी पार्षद शिल्पा गौर ने कहा- ये अच्छा निर्णय है। मैं दूसरी बार पार्षद चुनी गई हूं। इस कार्यकाल में हम लोगों ने अध्यक्ष का चुनाव किया। इस व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ गया है। हमें पता है कि कई पार्षदों ने अध्यक्ष को चुनने के लिए पैसे लिए हैं। यदि डायरेक्ट इलेक्शन होंगे तो अध्यक्ष जनता की सुनेंगे और काम भी होंगे।

क्या पार्षदों की अहमियत कम हो जाएगी? ये पूछने पर शिल्पा गौर ने कहा कि ऐसा नहीं होगा। जनता के कामों के लिए पार्षद चुने जाते हैं। जब पार्षदों के काम होंगे तो वो तो खुश रहेंगे ही, उनके वार्ड की जनता भी खुश रहेगी।

कांग्रेस बोली- बीजेपी को लोकतंत्र में भरोसा नहीं

कांग्रेस ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है। नर्मदापुरम नगर पालिका के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता अनोखीलाल राजोरिया कहते हैं- ये सही बात है कि पार्षद यदि अध्यक्ष को चुनते हैं तो खरीद-फरोख्त की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन अध्यक्ष निरंकुश हो जाता है।

सरकार को ऐसी व्यवस्था करना चाहिए कि अध्यक्ष निरंकुश न हो। सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव की मियाद 4 साल करने का जो फैसला किया है, वो ठीक नहीं है। इससे निरंकुशता बढ़ेगी।

वहीं, कांग्रेस के पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल का कहना है कि बीजेपी सत्ता का विकेंद्रीकरण करने के बजाय केंद्रीकरण करने में जुटी है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक शीर्ष पदों पर बैठे नेता सारी ताकत अपने पास रखना चाहते हैं। अब बीजेपी नगर पालिका और परिषद अध्यक्षों के लिए भी यही व्यवस्था कर रही है, ताकि पार्षद झुनझुना बजाते रहें। जब अध्यक्ष प्रत्यक्ष रूप से चुनकर जाएगा तो वह पार्षदों की नहीं सुनेगा

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