कोरोना से हारना नहीं हराना है -अतुल शेठ।

विश्व मे जहा भी कोरोना से लडाई जीती है या उसे रोकने में सफल रहे हे, वहा टेस्टिंग बढाकर ओर उससे,कोरोना की उपस्थिति को जानकर,उसकी कोन्टेक हिस्टरी जानकर, वहा कोरोना ढुढकर निकाला हे। इसे कोरोना से दौड में आगे निकलकर, रोकना कह सकते हे।अभी हम उसके पीछे पीछे दोड रहे हे।

कोरोना महामारी का इलाज, टेस्टिंग पहली पायदान हे। फिर हिस्टरी, फिर ट्रेसीग ओर इलाज हे। जिसके द्वारा, केवल अभी,इस मानव द्वारा फैलने वाले वायरस बिमारी को रोका जा सकता हे। बिमार का टेस्ट, इलाज नही हे इस महामारी का।टेस्ट से बिमार ढुढना, इलाज हे।

130 करोड़ की आबादी में 11% लोगों का कोरोना पॉजिटिव आना उसमे से 87% ठीक हो गये वो भी बिना proper दवा के , 0.3 % यानी 30000 लोगो की मृत्यु हुई , ये विस्फोट है या काम-धंधे को बंद करने का प्लान..!!

100 मे से 1 के नुकसान की आशंका मे 99 को भूखे नहीं मारा जा सकता..!!

कोरोना को जितनी हवा देनी थी दे ली…अब रोजी-रोटी का सोचो…नहीं तो बहुत जल्द कोरोना से “को” हट जाएगा और केवल “रोना” ही बचेगा..!!

डर के आगे ही जीत है….

यह धारणा पूरी तरह अवैज्ञानिक है कि ऑड-इवन या राइट-लेफ्ट से कोरोना फैलेगा या रुकेगा..इससे कोरोना फैले ना फैले अवसाद,हिंसा,प्रतिहिंसा,बेरोजगारी,महंगाई, लूट-खसौट, चोरी-डकैती निश्चित फैलेगी..!! इसकी चेन तो साल, दो साल नहीं टूटेगी तो क्या आप किसी को कोई काम ही नहीं करने देंगे..??

मुश्किल यह है कि, जो प्रशासनिक अधिकारी फैसले लेते हैं, उन्हें एक तारीख को वेतन मिल जाता है…घूमने को ड्राइवर सहित कार है…घर के काम के लिए नौकर है..!!

वे उन लोगों का दर्द,परेशानी क्या जानें जिन्हें सुबह तय समय पर पानी भरना है, दूध,सब्जी लेकर आना है…

दुकान ,कारखाने में दिन भर में आने वाले दस-बीस लोगों को भी एक मीटर के फासले पर खड़े रखना है…अपने कर्मचारियों की आधी – पूरी तनख्वाह देना है…अपने कर्ज चुकाने हैं.!!

बिजली, पानी ,पेट्रोल,किराए के पैसे समय पर अदा करने हैं..!!

नेतृत्व हां में हां मिलाकर खुश है, अपना पल्ला झाड़ रहा है..!!

दुनिया की 777 करोड़ की आबादी में 6 माह में केवल सवा करोड़ लोग संक्रमित हुए हैं और 5.60 लाख मौत हुई है..इस तरह संक्रमण 0.16 प्रतिशत है और मौत का प्रतिशत नगण्य…केवल भारत में सड़क दुर्घटना से सालाना “डेढ़ लाख” मौत और विभिन्न बीमारियों से “70 लाख” मौत होती है..!!

कृपया, अब कोरोना का रोना बंद कर अपनी स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर करने, दवा जल्द विकसित करने और लोगों में साहस व आत्म विश्वास बढ़ाने पर जोर दीजिए ..!!

लोगों से कहिए कि, अपने काम – धंधे करें और एहतियात बरतें..!!

आम जनता दूध पीता बच्चा नहीं है, जो पूरे समय मुंह में Spoon डालकर रखें,.अपनी चमड़ी बचाने के लिए लोगों को बेमौत मरने,पागल हो जाने,खुदकुशी करने के लिए सामान न जुटाया जाए.!!

देश में पहले ही बेरोजगारी कम नही है लेकिन जिनके पास भी थोड़ा बहुत रोजगार बचा है कम से कम उनके तो मत छीनों….

अगर जल्दी ही इस बारें में गंभीरता से नहीं सोचा गया तो विश्वास माने कोरोना का तो पता नहीं परंतु इसके कारण फैली बेरोजगारी भूखमरी के चलते इतने मरेगे की हम सोच भी नहीं सकते ..
इन्दौर मे अभी कोरोना सेम्पल जिनके लिए जाते हे,उसकी रिपोर्ट 2 से 5 दिन मे आती है।और जो +टीव आते हे उसे 3 से 6 दिन मे अस्पताल लेने के लिए एम्बुलेंस आती है। इस दौरान जो +टीव हे ,अन्य लोगो को भी ये बिमारी दे चुका होता हे। इसके बदले होना ये चाहिए की सेम्पल लेते ही उसे कोराइन्टाइन करा जाए, ओर वो-टीव आता है तो ही उसे छोड़ जाय।इससे कोरोना चेन को बढने से रोकने मे ज्यादा मदद मिलेगी।ओर यही प्रोटोकोल भी हे। कोरोना से लडाई लम्बी चलनी हे,कब तक चलेगी,साल दो साल,कोइ नही जानता। इसलिए हम सब को इससे लडना भी हे ओर जीनाभी हे। डरना नही हे। अतुल शेठ।

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