
खतरे में शहर और खामोश क्राइसिस मेनेजमेंट कमेटी
शहर को अनलॉक किए जाने के बाद नहीं हुई कमेटी की बैठक
दस दिन में बढ़ गए देढ़ हजार से ज्यादा मरीज और 43 की मौत
इंदौर, प्रदीप जोशी। कोरोना संक्रमण का प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रकोप झेलने वाले इंदौर शहर एक बार फिर खतरे के मुहाने पर आ गया है। बीते दस दिनों में दो हजार से ज्यादा नए मरीज सामने आए है वही संक्रमण से 43 मरीज दम तोड़ चुके है। खास बात यह है कि त्यौहारों के नाम पर शहर को प्रतिबंधों से मुक्त करवाने वाले नेता अपनी अपनी सियासत में व्यस्त हो गए है। जबकि हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते नजर आ रहे है। सियासतदारों के इसी अंदाज ने आम लोगों को भी चिंता मुक्त करने का काम कर दिया। अब ना तो कोरोना से डर रहे है और ना ही बचाव के तरीकों को अपनाने के प्रति गंभीरता दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल जिले की क्राईसेस मेनेजमेंट कमेटी के सामने खड़ा है। त्यौहारों का हवाला देकर इसी कमेटी ने शहर को अनलॉक करवाया था। पूरा माह बीत गया मगर कमेटी की बैठक नहीं हुई। अनलॉक के बाद हालात क्या है, सुधार के लिए क्या कदम उठाए जाए इस पर अब किसी को चिंता नहीं है।
लगातार बढ़ रहा संक्रमण का खतरा
इंदौर मे अगस्त माह मे कोरोना पॉजिटिव मरीजों की संख्या एक आठवीं बार दो सौ पार पहुंची है। बीते दस दिनों में दो हजार से ज्यादा नए मरीज मिलने के साथ ही दस दिनों के भीतर 43 मरीज दम तोड़ चुके है। नये मरीजों और होने वाली मौतों को मिला कर इंदौर में शुक्रवार तक 12 हजार 720 कोरोना पाजीटिव मरीज हो चुके है। इस रोग से अब तक 389 लोग जान गवा चुके है।
औपचारिकता निभा रहा प्रशासन
त्यौहारों की आड़ में पूरे शहर को अनलॉक करवा दिया गया नतीजा यह रहा कि संक्रमण उन इलाकों में भी फैल गया जो अब तक अछूते थे। आज शहर का अस्सी फीसदी हिस्सा कोरोना संक्रमण की चपेट में है। लॉक डाउन के अंतिम चरण में नेताओं ने जिस तरह से हस्तक्षेप शुरू किया उसके बाद प्रशासन ने भी अपने स्तर पर फैसले करना बंद कर दिए। आज प्रशासन की भूमिका महज औपचारिकता निभाने जैसी नजर आ रही है। स्थानीय नेताओं को महत्व दिए जाने के आदेश भी शासन स्तर से ही मिले है यही कारण है कि शहर में कोरोना संबंध सभी नितीगत फैसले क्राईसेस मेनेजमेंट कमेटी के अधिकार क्षेत्र में डाल दिए गए।
राजनीति का शिकार बनी कमेटी
केंद्र सरकार द्वारा संक्रमण की रोकथाम के लिए जब राज्यों को अधिकार दे दिए गए तभी जिलों में क्राईसेस मेनेजमेंट कमेटियों का गठन किया गया था। इंदौर में गठित इस कमेटी ने शुरूआती दौर में तो पूरी गंभीरता दिखाई मगर बाद में नेताओं के हक में टकराव शुरू हो गया। इसी टकराव के चलते संघ की तरफ से कमेटी में समन्वयक की भूमिका निभाने वाले डॉ निशांत खरे बाहर हो गए। उनके बाहर होने के बाद सत्ता और प्रशासन के बीच समन्वय भी खत्म हो गया। नेताओं के हितों के टकराव का असर यह रहा कि बार बार फैसले बदलना पड़े। हाल यह हो गए कि कमेटी के लोग बैठक के बाद सार्वजनिक घोषणा कर देते जिसकी जानकारी अधिकारियों को मीडिया से जरिए प्राप्त होने लगी। वैसे भाजपा के एकाधिकार होने के कारण कांग्रेसी विधायकों ने पहले दिन से दूरी बना ली थी।
संडे लॉक डाउन भी बन गया मजाक
शहर को अनलॉक करने की घोषणा के साथ ही संडे को पूर्ण लॉक डाउन रखने का फैसला किया गया था। बीते चार संडे से यह लॉक डाउन मजाक बन कर रह गया है। बाजार जरूर बंद रहते है मगर सड़कों पर भीड़ और खुले आम लोगों की आवाजाही, पिकनिक स्पॉटों पर बेखौफ तफरीह आम बात हो गई है। ना तो लोगों को पुलिस और प्रशासन का खौफ है और ना ही संक्रमण का कोई डर उनके मन में रह गया है।