
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 मई को यानी की आज नए संसद भवन का लोकार्पण किया। इस इमारत में देशभर के अलग-अलग हिस्सों में तैयार की गईं मूर्तियां और कलाकृतियां दिखाई देंगी. खास बात यह है कि इसमें इंदौर भी शामिल है. दरअसल, इंदौर में बनाई गई अशोक स्तंभ की दुर्लभ प्रतिकृति भी नए संसद भवन में लगाई गई है. इसे इंदौर के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकार स्वर्गीय दीनानाथ भार्गव ने डिजाइन किया है. उन्होंने ही संविधान का पहला पेज डिजाइन किया था, जिस पर अशोक स्तंभ बना हुआ है.

हालांकि, दीनानाथ भार्गव का निधन 2016 में हो गया था. लेकिन, उनके परिवार के लोग आज बहुत खुश हैं कि उनके पिता की बनाई दुर्लभ प्रतिकृति नए संसद भवन में लगाई गई है. उन्हें इस भवन के उद्घाटन समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया है. दीनानाथ की बहू सापेक्षी सौमित्र भार्गव का कहना है कि ये हमारे लिए ही नहीं, बल्कि पूरे इंदौर के लिए बहुत गर्व की बात है, कि हमारे ससुर की बनाई ये प्रतिकृति नए संसद भवन में लगाई गई है.
सापेक्षी ने कहा कि एक बात जरूर निराश करने वाली है कि हमें इस उद्घाटन कार्यक्रम के लिए आमंत्रित नहीं किया गया. हम लोग चाहते हैं कि उनके नाम पर कला भवन, यूनिवर्सिटी का नाम रखा जाए. उन्होंने इतना बड़ा काम किया है, लेकिन उनका नाम कहीं पर भी नहीं है. वहीं, दीनानाथ भार्गव के बेटे सौमित्र भार्गव का कहना है कि नया संसद भवन बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक काम किया है. उस भवन में मेरे पिता की बनाई अशोक स्तंभ की प्रतिकृति लगाई गई है. ये हमारे लिए बहुत गौरव की बात है. यदि उनके रहते ये होता, तो ये उनके लिए गौरव का क्षण होता. आज वो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मेरी सरकार से मांग है कि उनका नाम भी अमर हो, ऐसा न हो कि वो इतिहास के पन्नों में दबकर रह जाएं.

उन्होंने कहा कि हम लोगों को इतने बड़े कार्यक्रम के लिए आमंत्रण तक नहीं हैं, जबकि उनकी बनाई प्रतिकृति वहां लगाई गई है. वे बताते हैं कि हमारे पापा ने इसे 20-21 साल की उम्र में बनाया था. जब उनकी शादी भी नहीं हुई थी. वे कोलकाता के शांति निकेतन में कला का अध्ययन कर रहे थे. देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ये काम शांति निकेतन को सौपा था. शांति निकेतन में गुरू नंदलाल बोस ने इस काम की जिम्मेदारी हमारे पापा को दी थी.
सौमित्र ने कहा कि इस अशोक स्तंभ को बनाने के लिए पापा तीन महीने तक कोलकाता के चिड़ियाघर में रहे रहे थे, जिससे वे शेरों के हाव-भाव साथ ये देख सकें कि वे कैसे उठते- बैठते और खड़े होते हैं. इतने अध्ययन के बाद ही पापा ने अशोक स्तंभ की ये प्रतिकृति बनाई थी. बहरहाल,दीनानाथ भार्गव के परिवार के सदस्यों के पास उनके डिजाइन किए गए अशोक स्तंभ की मूल कलाकृति की एक प्रतिकृति अभी भी मौजूद है.
उनके इंदौर के घर में उनके परिजन आज भी इसे सहेज कर रखे हुए हैं. परिजनों के मुताबिक भार्गव ने इस प्रतिकृति को देश की आजादी के बरसों बाद 1985 के आस-पास पूरा किया था. सोने के वर्क के इस्तेमाल से तैयार इस प्रतिकृति में दिखाई दे रहे तीनों शेरों का मुंह थोड़ा खुला है. उनके दांत भी नजर आ रहे हैं. इसमें नीचे की ओर सुनहरे अक्षरों में सत्यमेव जयते लिखा हुआ है. ऐसी ही प्रतिकृति लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर की शोभा बढ़ा रही है.