MP में भ्रष्टाचार पर सजा डिमोशन — तहसीलदार बने पटवारी, टीआई बने एसआई… एक्सपर्ट की राय- दोषी पाए जाने पर डिमोशन करना गलत फैसला — देखें VIDEO

मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार और लापरवाही बरतने वाले 4 सरकारी कर्मचारियों का पिछले दिनों डिमोशन किया गया। एक केस में तहसीलदार को पटवारी बना दिया, दूसरे केस में बाबू को चपरासी और तीसरे में टीआई को सब इंस्पेक्टर। अब ये तीनों मामले सुर्खियों में हैं। इन पर सवाल भी उठ रहे हैं।

दरअसल, इन सभी के खिलाफ दोष साबित हो चुका था। एक्सपर्ट मानते हैं कि इनके खिलाफ बर्खास्तगी की कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि डिमोशन की। ऐसा कर अधिकारियों ने कर्मचारियों को एक तरह से बचाने का काम किया है। कार्रवाई करने वाले अफसरों से बात की तो उन्होंने कहा- वैधानिक तरीके से कार्रवाई की गई है।

आखिर किसी कर्मचारी का किन हालात में डिमोशन हो सकता है, किस नियम के तहत डिमोशन की कार्रवाई की जा सकती है? इसे लेकर रिटायर्ड अधिकारियों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट…

इन 4 कर्मचारियों का हुआ डिमोशन

इन चारों मामलों के बारे में सिलसिलेवार जानिए

1. आगर-मालवा के नायब तहसीलदार को पटवारी बनाया

ये कार्रवाई अरुण चंद्रवंशी के खिलाफ की गई है। वे आगर-मालवा में नायब तहसीलदार थे। चंद्रवंशी के खिलाफ आरोप था कि उन्होंने बीजागरी गांव में नियमों के खिलाफ करीब 400 लोगों के गरीबी रेखा के राशन कार्ड एक-एक साल की अवधि के लिए बनाए थे। मामले की शिकायत लोकायुक्त से की गई थी।

लोकायुक्त ने जांच में इसे सही पाया। इसके बाद आगर-मालवा कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने अरुण चंद्रवंशी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनका पटवारी पद पर डिमोशन किया।

जब अरुण चंद्रवंशी से बात की तो उन्होंने कार्रवाई को गलत बताया। चंद्रवंशी ने कहा- मैंने अपने विवेक के मुताबिक फैसला लिया था। सभी लोगों को एक साल के लिए राशन कार्ड बनाकर दिया था। ये जिंदगी भर के लिए नहीं था। ये उन लोगों को जारी किए गए थे, जिनकी वाकई में स्थिति खराब थी।

2. इंदौर में टीआई को डिमोशन कर बनाया एसआई

ये कार्रवाई इंदौर के विजयनगर थाने के टीआई रहे रविंद्र गुर्जर के खिलाफ की गई है। पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने उन्हें डिमोशन कर सब इंस्पेक्टर बना दिया है। अब उन्हें सजा के बतौर तीन साल तक सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करना होगा। इसी मामले में एसआई संजय धुर्वे के दो और कॉन्स्टेबल लोकेंद्र सिंह सिसौदिया का एक इंक्रीमेंट रोका है।

दरअसल, 15 जून 2023 को विजय नगर थाने के तत्कालीन पुलिसकर्मी लोकेंद्र सिंह और मुकेश लोधी ने ऑनलाइन सट्टा खेलने के आरोप में स्कीम नंबर 54 से तीन युवक और एक नाबालिग को पकड़ा था। उन पर केस दर्ज न करते हुए उन्हें पैसे लेकर छोड़ दिया था। इस दौरान रविंद्र गुर्जर विजयनगर थाने के टीआई थे।

मामले की शिकायत पर जांच हुई। जांच में टीआई, एसआई संजय धुर्वे और कॉन्स्टेबल लोकेंद्र सिंह को दोषी करार दिया गया। इस रिपोर्ट के बाद कमिश्नर संतोष सिंह ने डिमोशन की कार्रवाई की है।

विजयनगर थाने के तत्कालीन टीआई रविंद्र गुर्जर को डिमोशन कर एसआई बनाया गया है।

3. बुरहानपुर में क्लर्क को डिमोशन कर बनाया चपरासी

ये कार्रवाई बुरहानपुर के खकनार में सहायक ग्रेड-3 के पद पर काम कर रहे क्लर्क सुभाष काकड़े के खिलाफ की गई। तत्कालीन कलेक्टर भव्या मित्तल ने सुभाष काकड़े को परियोजना अधिकारी कार्यालय नेपानगर में प्यून के रूप में नियुक्ति दी है। दरअसल, काकड़े के खिलाफ आंगनबाड़ी सहायिका की भर्ती में रिश्वत मांगने की शिकायत की गई थी।

ये शिकायत जनसुनवाई के दौरान की गई थी। शिकायत को देखते हुए जुलाई 2024 में सुभाष काकड़े को सस्पेंड कर दिया था। उनके खिलाफ विभागीय जांच की गई। जांच में उन्हें दोषी पाया गया और पक्ष रखने का भी मौका दिया गया था, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

तत्कालीन कलेक्टर भव्या मित्तल का कहना है कि सुभाष काकड़े के खिलाफ हमें कार्रवाई करने के अधिकार थे, इसलिए सरकार को रिपोर्ट नहीं भेजी। ऐसे मामलों में डिपेंड करता है कि नियुक्ति अथॉरिटी कौन है?

 

4. फर्जी मार्कशीट लगाने वाली शिक्षिका का डिमोशन

अगस्त 2023 में गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल बरही में पदस्थ मिडिल स्कूल टीचर मीना कोरी का अफसरों ने प्रायमरी टीचर के पद पर डिमोशन कर दिया। अपर संचालक लोक शिक्षण संभाग जबलपुर की तरफ से कलेक्टर को कार्रवाई करने की सिफारिश की गई थी।

दरअसल, मीना कोरी ने अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की बीए की फर्जी मार्कशीट लगाकर प्रायमरी टीचर से मिडिल स्कूल टीचर के पद पर प्रमोशन हासिल किया था। इस मामले की शिकायत की गई थी। जिला शिक्षा अधिकारी कटनी ने जांच कराई, जिसमें आरोप सही पाए गए।

कार्रवाई से पहले मीना कोरी को 15 दिन के भीतर अपना पक्ष रखना था, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया।

किस नियम के तहत होती है डिमोशन की कार्रवाई

एक्सपर्ट बोले- दोषी पाए जाने पर डिमोशन करना गलत फैसला

रिटायर्ड आईएएस अजय गंगवार कहते हैं कि यदि कोई कर्मचारी लगातार गलतियां करता हो, उसकी संबंधित पद पर काम करने की क्षमता न हो तो डिमोशन की कार्रवाई की जाती है। उसे क्षमता के अनुसार कार्य दिया जाता है। जो केस सामने आए हैं, इनमें सभी के खिलाफ दोष साबित हो चुका है।

ऐसे में उनके खिलाफ डिमोशन की कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी, बल्कि उन्हें बर्खास्त करना उचित था। इन सभी पर रिश्वत लेने, सट्टेबाजी में शामिल होने और फर्जी मार्कशीट बनाकर प्रमोशन लेने के अपराध साबित हो चुके थे।

भ्रष्टाचार साबित है, तो आपराधिक केस होना चाहिए

रिटायर्ड डीजीपी एन के त्रिपाठी कहते हैं कि विभागीय सजा का काफी असर पड़ता है। यदि किसी गलत व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई होती है, तो अच्छा काम करने वालों का मनोबल बढ़ता है। गलत काम करने वालों को एक मैसेज जाता है। यदि कार्रवाई नहीं होती, तो मैसेज जाता है कि अच्छा काम करो या खराब दोनों का मूल्य बराबर है।

ये कार्रवाई सोच समझ कर की जाना चाहिए। जिसने जितनी गलती की है, उसी के अनुपात में कार्रवाई होनी चाहिए। अगर किसी के खिलाफ भ्रष्टाचार साबित हो गया है, तो उस पर आपराधिक केस होना चाहिए।

एन के त्रिपाठी

रिटायर्ड, आईपीएस

कर्मचारी संगठन बोले- फैसला हर अधिकारी पर लागू हो

कर्मचारियों पर डिमोशन की कार्रवाई से कर्मचारी संगठन नाराज हैं। तृतीय वर्ग कर्मचारी संगठन के प्रदेश महामंत्री उमाशंकर तिवारी का कहना है कि यदि कोई कर्मचारी काम नहीं कर रहा है, तो उसे सजा जरूर मिलना चाहिए। मगर, ये फैसला ऊपर से नीचे तक हर अधिकारी पर लागू होना चाहिए।

भारतीय प्रशासनिक सेवा, वन सेवा, राज्य प्रशासनिक सेवा अधिकारी भी फर्जीवाड़े में शामिल पाए जाते हैं, तो उनका भी डिमोशन होना चाहिए। कानून और नियम सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए। ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त में अभी भी कई अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी सरकार ने नहीं दी है। वहीं, छोटे कर्मचारियों को डिमोशन कर उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है।

लोकायुक्त-ईओडब्ल्यू में 274 अधिकारी-कर्मचारियों पर आरोप साबित, अभियोजन की मंजूरी नहीं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *