अग्निहोत्र – सौभाग्य को आकर्षित करने का सरल उपाय

 

अग्निहोत्र – सौभाग्य को आकर्षित करने का सरल उपाय

अग्निहोत्र एक वैदिक यज्ञ है। इस यज्ञ का वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। वैदिक काल में अग्निहोत्र का बड़ा नाम था। नियमित रूप से अग्निहोत्र करना तेज और समृद्धि की वृद्धि करता है, किसी भी प्रकार की गहरी नकारात्मकता और दुर्भाग्य से घिरे लोगों ने अवश्य रूप से अग्निहोत्र को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। दरिद्रता, अवसाद , अकारण भय, गंभीर स्वास्थ्य समस्या और सामाजिक बदनामी से बचने का सटीक उपाय है अग्निहोत्र।

हिन्दू धार्मिक ग्रंथों आदि में इस यज्ञ का उल्लेख मिलता है। यह दो प्रकार का होता है-

नित्य

काम्य

अग्नि-स्थापन करके आजीवन प्रातःकाल और सायंकाल नियमपूर्वक हवन करना ‘नित्य’ और किसी कामना के लिए निर्दिष्ट समय तक हवन करना ‘काम्य’ है। अग्निहोत्र अपने परिसर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाकर उसे दोष रहित करता तो है ही साथ ही वायुमंडल को भी पवित्र करता है।

ठीक स्थानीय सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय, गाय के घी की कुछ बूंदों से सने दो चुटकी कच्चे चावल (अक्षत) अग्नि में डाले जाते हैं । तांबे के एक अर्ध पिरामिड आकार के पात्र में अग्नि प्रज्वलित की जाती है । अग्नि में दो बार आहुति डालते समय, दो सरल वेद मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ।

अग्निहोत्र की सामग्री को अग्नि में आगे दिए गए मंत्रोंच्चारण के साथ आहुति दी जाती है ।

सूर्योदय के समय

सूर्याय स्वाहा सूर्याय इदम् न मम

प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम

सूर्यास्त के समय

अग्नये स्वाहा अग्नये इदम् न मम

प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदम् न मम

मंत्र के उच्चारण से व्यक्ति के मन में शरणागत भाव की निर्मिति तथा जागृति में सहायता होती है । मंत्र का उच्चारण इस प्रकार करें कि वह पूरे घर में गुंजायमान हो । उच्चारण स्पष्ट तथा लय में होना चाहिए । मंत्र में आए शब्द सूर्य, अग्नि तथा प्रजापति सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पर्यायवाची हैं । शरणागत भाव की जागृति इन मंत्रों के उच्चारण से होती है ।

अग्नि प्रज्वलित करना

अग्निहोत्र के लिए आवश्यक सामग्री

चुटकी अखंड अक्षत

गाय का घी

निश्चित माप का अर्ध पिरामिड के आकार का ताम्रपात्

गाय के गोबर के उपले

अग्नि का स्रोत (माचिस)

अग्निहोत्र के लिए जिस दिन भी अग्निहोत्र करना हो उसके पहले सूर्योदय और सूर्यास्त का ठीक समय पंचांग के माध्यम से पता कर ले तब सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय के ५-१० मिनट पहले, अग्निहोत्र पात्र में उपले के टुकडे को आगे बताएनुसार रखें ।

सर्वप्रथम, एक चौकोर उपले का टुकडा हवनपात्र के तल में रखें, उस टुकडे का आकार इतना हो कि वह तल में अच्छे से बैठ जाए ।

हवनपात्र के अगले तथा पिछले भाग में दो छोटे टुकडे रखें ।

इन दो टुकडों के ऊपर, दो लंबे टुकडे हवनपात्र के बांए तथा दांए बाजू में खडे करके इस प्रकार रखें कि उन सबके मध्य थोडा स्थान हो ।

२ टुकडे आडे तथा अगले दो टुकडे सीधे रखते हुए १ अथवा २ परतें सजाएं । इस प्रकार हवनपात्र के केंद्र में एक रिक्त स्थान बन जाएगा ।

उपले का एक और टुकडा लेकर उसमें घी लगाएं । इसे घी के दीये के ऊपर रख जलाएं और हवनपात्र में उपलों के मध्य में रख दें । आवश्यकता हो तो कर्पूर अथवा घी में डूबी कपास की बाती का उपयोग कर सकते हैं । अग्नि प्रज्वलित करते समय घी की कुछ बूंदें उपले पर डाल सकते हैं । आवश्यक हो तो, टुकडों को जलाने के लिए हाथ पंखे का उपयोग किया जा सकता है । अग्नि को कभी भी मुंह से न फूंके । अग्निहोत्र के समय अग्नि पूर्णतः प्रज्वलित रहनी चाहिए ।

घी से सने दो चुटकी स्वच्छ तथा अखंड अक्षत अपने बांए हथेली अथवा एक छोटे पात्र में लें ।

आहुति देना

प्रातःकालीन अग्निहोत्र

अपनी आंखें घडी के कांटें पर रखें, जैसे ही सूर्योदय का समय होता है, पहला मंत्र बोलना प्रारंभ करें सूर्याय स्वाहा ।

स्वाहा कहने के साथ ही अक्षत का पहला भाग अग्नि को आहुति दें और सूर्याय इदं न ममका उच्चारण करते हुए मंत्र के प्रथम पंक्ति को पूर्ण करें । अक्षत को दाहिने हाथ का अंगूठा, मध्यमा तथा अनामिका से (हथेली ऊपर की दिशा में)अग्नि में आहुति दें तथा बांए हाथ को अपनी छाती पर रखें ।

मंत्र की दूसरी पंक्ति का उच्चारण करते हुए अक्षत का दूसरा भाग प्रजापतये स्वाहा कहने के उपरांत अग्नि में आहुति दें तथा मंत्र को प्रजापतये इदं न मम कहते हुए पूर्ण करें ।

जब तक हवन सामग्री पूर्णतः जल न जाए, बैठकर अग्नि पर ध्यान एकाग्र करें । प्रातःकाल का अग्निहोत्र यहीं समाप्त होता है ।

संध्याकालीन अग्निहोत्र

संध्याकाल में अग्निहोत्र के समय से पूर्व, प्रात:काल के अग्निहोत्र की राख को हवनपात्र से निकालकर ध्यानपूर्वक अलग पात्र में रखें ।

प्रात:काल की प्रक्रिया को दोहराते हुए, पुनः हवनपात्र में उपले के टुकडे से अग्नि प्रज्वलित करें । साथ ही घी से सने अक्षत को दो समान भागों में दो बार आहुति देने के लिए तैयारी करें ।

ठीक सूर्यास्त के समय अग्निहोत्र के सूर्यास्त के मंत्र अग्नाय स्वाहा कहने के साथ ही अक्षत का पहला भाग अग्नि को आहुति दें और अग्नाय इदं न ममका उच्चारण करते हुए मंत्र के प्रथम पंक्ति को पूर्ण करें ।

इसी प्रकार मंत्र की दूसरी पंक्ति का उच्चारण करते हुए अक्षत का दूसरा भाग प्रजापतये स्वाहा कहने के उपरांत अग्नि में आहुति दें तथा मंत्र को प्रजापतये इदं न मम कहते हुए पूर्ण करें।

जब तक हवनसामग्री पूर्णतः जल न जाए, बैठकर अग्नि पर ध्यान एकाग्र करें । संध्याकाल का अग्निहोत्र यहीं समाप्त होता है ।

अन्य तैयारी

अग्निहोत्र के स्थान को स्वच्छ तथा व्यवस्थित रखें ।

प्रातःकाल में अग्निहोत्र के समय से पूर्व स्नान करना सर्वोत्तम होगा । संध्याकाल में स्नान करना संभव न हो तो अग्निहोत्र करने से पूर्व हाथ, पैर तथा मुख धो लें ।

अग्निहोत्र की विभूति (भस्म)अलग पात्र में रखी जा सकती है । इसमें औषधीय गुण हैं तथा इसका उपयोग आपके किचन गार्डन तथा कृषि के लिए एक प्रभावी तथा अत्यंत उपयोगी खाद के रूप में किया जा सकता है । इस विभूति को व्यर्थ समझकर कचरे के डिब्बे में न फेंके । आप इसे झील, नदी अथवा जलाशय में प्रवाहित कर सकते हैं । यह जल को सूक्ष्म-स्तर पर स्वच्छ तथा शुद्ध करता है । यहां तक कि किसी आवश्यक कार्य के लिए जाते समय मस्तक पर इसे लगा कर जाना आप की आकर्षण शक्ति और सकारात्मकता को बढ़ाता है, जिससे कार्य सिद्ध होने की संभावनाएं प्रबल होती है।

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