क्या शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं? पंडित दिनेश गुरुजी

   

क्या शिवलिंग रेडियोएक्टिव होते हैं?

हाँ १००% सच है!!

भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है।

▪️ शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें।

▪️ महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

▪️ क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता।

▪️ भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।[1]

▪️ शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

▪️ तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

▪️ ध्यान दें कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

▪️ जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।

▪️ आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गये हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडु का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79°E 41’54” Longitude की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

▪️ यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिवलिंगों को प्रतिष्टापित किया गया है।

जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है,
आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है,
हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है,
पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम् में है और अतं में
अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है!

वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

▪️ भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

▪️ इन मंदिरों का करीब पाँच हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं थी। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जानें।

▪️ केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं।आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, यह आज तक रहस्य ही है।

श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।
तिरुवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है।
अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है।
कंचिपुरम् के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और
चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

▪️ अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच लिंगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीकी थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है। माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं। इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है। संभवतया यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हों जो 81.3119° E में पड़ता है!? उत्तर शिवजी ही जाने।

कमाल की बात है “महाकाल” से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच सम्बन्ध देखिये

उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी भी है रोचक-

▪️ उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

▪️ उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

▪️ उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

▪️ उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी

▪️ उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

▪️ उज्जैन से त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

▪️ उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

▪️ उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी

▪️ उज्जैन से घृष्णेश्वर – 555 किमी

हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था ।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले ।

और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये।

? हर हर महादेव?जय मां शारदा?
मां शारदा ज्योतिषधाम अनुसन्धान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी
9977794111

 

 

महिलाओ के लिए विशेष

यदि बार-बार अनावश्यक डाक्टर के पास दौडने से बचना चाहती है तो अवश्य पढ़ें
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यदि आप कमर दर्द ,रक्त विकार ,स्नायु विकार ,असमय बुढ़ापा ,झुर्रियो ,त्वचा के रूखापन ,मानसिक तनाव ,संतान हीनता ,गर्भाशय-योनी विकार ,मानसिक व्याधि ,भुत प्रेत भय वायव्य बाधा ,उत्साह हीनता ,ऊर्जा की कमी ,संवेदन हीनता ,ओज-तेज-प्रभावशालिता में कमी ,आदि का सामना कर रही है तो सीधा सा अर्थ है की आप में ऋणात्मक ऊर्जा अर्थात पृथ्वी की उर्जा अर्थात काली की उर्जा अर्थात मूलाधार की उर्जा की कमी हो रही है जो आप में नैसर्गिक रूप से पाया जाता है अधिक मात्रा में ,जो आपकी मूल प्रकृति है ,,ध्यान दे आप प्रकृति की नैसर्गिक ऋणात्मक प्रतिकृति है ,आपका शरीर ,मानसिक संरचना ,उर्जा प्रणाली इस प्रकार की बनी होती है की आपमें ऋणात्मक ऊर्जा [प्रकृति की ]अधिक होती है ,अधिक अवशोषित होती है फलतः आपको अधिक जरुरत भी होती है ,,ऐसा नैसर्गिक रूप से है इसे आप चाहकर भी नहीं बदल सकती ,|,भावनाओं की अधिकता ,कोमलता ,सौंदर्य प्रियता ,बच्चो के पोषण – उत्पत्ति की क्षमता ,मासिक अवस्था केवल आपमें ही होती है पुरुष में नहीं ,क्योकि पुरुष धनात्मक उर्जा का प्रतिनिधित्व करता है ,उसमे धनात्मक ऊर्जा की मात्रा अधिक होती है आपमें ऋणात्मक की ,जिनका एक निश्चित संतुलन होता है ,संतुलन बिगड़ने से दोनों में समस्याए उत्पन्न होती है ,,आपके समस्त गुण और प्रतिक्रियाये -क्रियाए इन्ही पृथ्वी तत्वीय ऊर्जा से प्रभावित होती है ,,इनकी कमी से उपरोक्त समस्याओं के साथ ही आपकी सम्पूर्ण कार्यप्रणाली अव्यवस्थित हो जाती है ,जिससे कमशः समस्याए उत्पन्न होने लगती है ,,अतः आपको अपने मूल उर्जा को बनाए रखना चाहिए ,इससे आप उपरोक्त समस्याओं से बच सकती है ,कम तो यह अवश्य ही हो सकती है ,इससे आपको डाक्टरों का चक्कर भी कम लगाना पड़ेगा भविष्य में ,इसके लिए आप निम्न उपाय कर सकती है ,,

[१]अपने बाल बढाकर रखे ,उन्हें संवार कर रखे ,,बाल वातावरणीय तरंगों के ग्रहण करता है यह तरंग अवशोषित करते है जो संवेदन शीलता और दूसरों को परखने की क्षमता बढाने के साथ ही आत्मविश्वास में वृद्धि करते है ,सौंदर्य तो यह बढाते ही है।

[२]पावों में चांदी के पायल जरुर पहने [अन्य धातु के नहीं ],यह आपमें पृथ्वी से ऊर्जा ग्रहण की मात्रा बढाते है ,फलतः संतुलन बनता है।

[३]सुबह -शाम कच्ची मिटटी की जमीन पर कुछ देर नंगे पाँव अवश्य चले ,यह पृथ्वी से तरंगे ग्रहण करने के लिए उपयोगी है जो अनेक रोगों, मानसिक तनाव -विकार को दूर करता है ,सौंदर्य -तेज-उत्साह बढता है ,यदि यह संभव नहीं है टी काली मिटटी घर में लाकर उसे पावो से १० मिनट पानी डालकर आट की तरह गुथे ,यह भी संभव नहीं है तो उस मिटटी का पेस्ट बनाकर पावो में लगाकर सूखने दे ,फिर धो डाले।

[४]कमर में कला धागा पहने ,यह रक्षा के साथ उर्जा संतुलन में भी कारगर होता है ,कमर की समस्याओं में भी लाभप्रद है।

[५]पृथ्वी अथवा काली की उर्जा से परिपूर्ण रसायनों-वनस्पतियों का पेस्ट बनाकर मूलाधार पर गोल टीका लगाए ,,यह संभव नहीं है तो निम्न उपाय करे।

[६]काली माँ की पूजा करे ,साधना करे ,यह संभव न हो तो भोजपत्र पर बना अभिमंत्रित -प्राण प्रतिष्ठित काली यन्त्र चांदी के ताबीज में [यन्य धातु में नहीं ]गले में धारण करे जो किसी वास्तविक काली साधक द्वारा बनाया और अभिमंत्रित किया गया हो ..

उपरोक्त उपाय पर ,विवरण पर यदि ध्यान दे तो आपकी बहुत सी समस्याए कम हो जायेगी और आपके स्वस्थ रहने -निरोगी रहने की मात्रा बढ़ जायेगी ,उत्साह-जीवनी उर्जा बढ़ जाने से आप सुखी हो सकती है।
माँ शारदा ज्योतिषधाम अनुसन्धान संस्थान इंदौर
पंडित दिनेश गुरुजी ज्योतिष वास्तु,पितृदोष विशेषज्ञ
9977794111

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