“धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री 5 मई से बद्रीनाथ में 21 दिन की साधना पर: एक महीने रहेंगे सार्वजनिक जीवन से दूर; बोले—कुछ लोग कहेंगे ‘बाबा लौट के मत आना’, पहले सेवादारों को ‘लौंडियाबाजी’ पर लगाई थी फटकार”

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक महीने के लिए सार्वजनिक संपर्क से दूर रहेंगे। वे मई में बद्रीनाथ के बर्फीले पहाड़ों पर 21 दिनों की विशेष साधना करेंगे। इस अवधि में वे किसी भी नेटवर्क में नहीं रहेंगे, न ही धाम पर उपस्थित होंगे और न ही कथा या दिव्य दरबार का आयोजन करेंगे।

धीरेंद्र शास्त्री ने अपनी ‘साधना यात्रा’ के पीछे की वजहों के बारे में बताया

धीरेंद्र शास्त्री का कहना है कि वर्तमान समय में स्वयं को साधना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि जीवन में भटकाने वाले कई नए रास्ते सामने आते रहते हैं, इसलिए आत्म-तप और आत्म-साधना पर ध्यान देना आवश्यक है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने अपनी इस ‘साधना यात्रा’ के पीछे की वजहों के बारे में बताया।

बता दें, रविवार को दरबार में अपने सेवादारों और चेलों को जमकर फटकार लगाई थी। उन्होंने कहा था कई लोग सेवा की भावना से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से धाम से जुड़े हैं। आधे से ज्यादा सेवादार इसलिए बन गए, क्योंकि यहां ज्यादा माल-पानी है। कुछ लौंडे यहां लौंडियाबाजी के चक्कर में चेले बन गए। धाम में बालाजी की वजह से बच्चे-बच्चियां खिंचे चले आते हैं।

धीरेंद्र शास्त्री- गुरु प्रेरणा से हमें साधना की आज्ञा लगी है। यह समय आत्म-चिंतन के लिए है, जिसमें हम भगवान का ध्यान करेंगे और स्वयं पर कार्य करेंगे। साधना का वास्तविक अर्थ ही खुद को साधना है, इसलिए यह बहुत आवश्यक है। मई के महीने में हम बद्रीनाथ के पहाड़ों में समय व्यतीत करेंगे।

हमने कुल एक महीने का संकल्प लिया है, जिसमें लगभग 21 दिन तक साधना चलेगी और शेष 5 दिन बद्रीनाथ भगवान की चर्चा (कथा) सुनाएंगे। “हम 5 मई को यहां से निकल जाएंगे और 6 मई से हमारी 21 दिनों की साधना प्रारंभ हो जाएगी।

इस एक महीने की यात्रा में हम आत्म-चिंतन करेंगे कि भगवद प्राप्ति के मार्ग को और कैसे प्रशस्त किया जाए। साथ ही, सनातन धर्म के कार्य को और व्यापक कैसे बनाया जाए और समाज की कुरीतियों को मिटाने के लिए हमें और क्या कार्य करने चाहिए, इस पर भी विचार करेंगे।बदलाव क्या आएंगे उसके बाद? क्या लगता है?

धीरेंद्र शास्त्री- ऐसा तो अभी पता नहीं, अभी तो प्रारंभ नहीं हुआ है तो बदलाव का कुछ कह नहीं सकते कि क्या बदलाव आएगा, पर इतना हमें पता है कि हर साधना के बाद जीवन में बहुत नए-नए विचार प्राप्त होते हैं और आत्मबल प्राप्त होता है।

भगवत उस चेतना से जुड़ने के बाद बहुत पॉजिटिव एनर्जी महसूस होती है। वैसी भी है और ऊर्जा बढ़े ताकि हम लोगों को और मार्गदर्शन दे सकें और इस ऊर्जा से लोगों को प्रकाशित कर सकें। इसके लिए इस साधना में जा रहे हैं। अब क्या बदलाव होगा, ये आने के बाद बताएंगे।

धीरेंद्र शास्त्री- बागेश्वर धाम से चूंकि हम पूर्ववत ही सेवा से मुक्त हैं, यहां की जो व्यवस्थाएं हैं, उन व्यवस्थाओं में स्वयं बालाजी और यहां एक समिति है ‘श्री बागेश्वर जन सेवा समिति’ जिसमें सचिव हैं, कोषाध्यक्ष हैं, वो पूरी टीम यहां सेवा करती है।

हमारा तो वैसे भी केवल ‘दरबार’ की भूमिका है यहां, बहुत ज्यादा भूमिका नहीं है। दरबार की भूमिका है तो दरबार इन दिनों स्थगित रहेगा, पर बालाजी का दरबार खुला रहेगा और बालाजी के दर्शन और लोगों की जो पीड़ा, कष्ट है, वो यहां दर्शन करने से, परिक्रमा करने से और यहां की पेशी करने से दूर होंगे।

धीरेंद्र शास्त्री- कुछ भी नहीं, वर्तमान में बहुत ज्यादा समाज में, संसार में विचित्र-विचित्र चीजे चल रही हैं। मोबाइल से दूरी का मतलब यह है कि किसी भी प्रकार से साधना भंग न हो और वहां पर वैसे भी नेटवर्क नहीं रहेंगे।

धीरेंद्र शास्त्री- अज्ञातवास को तो नहीं जोड़ा जा सकता हमारी इस साधना से। पता नहीं कितना समाज पर और कितना संसार पर प्रभाव पड़ेगा, कुछ लोग तो यह भी कहेंगे, कमेंट करेंगे कि ‘बाबा जा रहे हो, लौट के मत आना’। (हंसते हुए) तो समाज में तो तरह-तरह के लोग हैं, तो सब पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।लेकिन यह जरूर है कि यह जो वैश्विक स्थिति वर्तमान में निर्मित हो रही है, वह भारत में निर्मित न हो, उसके लिए हम आत्म-चिंतन करेंगे।

धीरेंद्र शास्त्री- हमारे कुछ कहने से वहां पर प्रभाव तो नहीं पड़ना है, पर ‘सनातन’ ही शांति का रास्ता है और वर्तमान में अमेरिका को और जितने भी विश्व के शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि हैं, उनको एक बात समझनी चाहिए कि ‘युद्ध’ रास्ता नहीं है, ‘प्रेम’ रास्ता है। युद्ध से विनाश होगा, प्रेम से प्रकाश होगा और विकास होगा।

तो हमें लगता है कि बैठकर सामंजस्य करना चाहिए। और अब इसमें भारत सरकार और भारत के प्रमुख लोग, हमें लगता है भारत के पास सही समय है विश्व शांति और विश्व गुरु बनने की भूमिका निभाने का, कि सबको प्रेम के एक प्लेटफॉर्म पर बिठाकर प्रेम की भाषा से सबको शिक्षा दी जाए कि युद्ध नहीं, प्रेम चुना जाए।

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