
कंटेंट क्रिएटर मिषा अग्रवाल की हाल ही में हुई मृत्यु ने सोशल मीडिया के मानसिक प्रभावों पर एक दर्दनाक लेकिन ज़रूरी चर्चा को जन्म दिया है। उनके परिवार के अनुसार, मिषा ने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उनके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स की संख्या घटने लगी थी — जिसे उन्होंने अपने करियर के अंत के रूप में देखा। मिषा का पूरा जीवन सिर्फ एक लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमता था: एक मिलियन फॉलोअर्स तक पहुँचना। उनके फ़ोन की लॉक स्क्रीन पर भी यही लक्ष्य लिखा हुआ था, जो उन्हें हर दिन याद दिलाता था कि उन्हें क्या हासिल करना है।
मिषा ने अपनी पहचान और आत्म-मूल्य पूरी तरह से इंस्टाग्राम पर आधारित कर लिया था — लाइक्स, फॉलोअर्स और वर्चुअल प्रशंसा पर। लेकिन जब उनके फॉलोअर्स कम होने लगे, तो उनके मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ा। अप्रैल से ही उनके परिवार ने महसूस किया था कि वह गंभीर अवसाद में चली गई थीं, और खुद को असफल व बेकार मानने लगी थीं।
यह कहानी एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न उठाती है:
हमारी आत्म-छवि सिर्फ स्क्रीन पर दिखने वाले नंबरों से इतनी जुड़ी हुई कब हो गई?
मिषा की त्रासदी सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है — यह सामाजिक भी है। यह हम सभी से यह सोचने का आग्रह करती है कि कैसे जुड़ाव के लिए बनाए गए प्लेटफ़ॉर्म खतरनाक बन सकते हैं जब आत्म-मूल्य को एल्गोरिदम से मापा जाने लगे, जब ध्यान (attention) मुद्रा बन जाए, और जब लोकप्रियता में थोड़ी गिरावट भी जीवन का उद्देश्य खो देने जैसा लगने लगे।
सोशल मीडिया अपने आप में बुरा नहीं है, लेकिन जब इसकी लत आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने लगे, तो यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। मिषा की कहानी एक करुणपूर्ण याद दिलाती है कि अब समय आ गया है कि हम मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हों, डिजिटल साक्षरता बढ़ाएँ और ऐसी संस्कृति बनाएं जहाँ असली जीवन की पहचान व भावनाएँ, ऑनलाइन दिखावे से ज़्यादा महत्वपूर्ण हों।