₹1200 किराए के एक कमरे से IPL के 5.20 करोड़ तक का सफर: 14 दिसंबर को डेब्यू करने वाले मंगेश यादव को RCB ने 30 लाख से खरीदा, ड्राइवर पिता–गृहिणी मां के संघर्ष और भारतीय टीम में देखने का सपना

ये मंगेश यादव का घर है। 14 दिसंबर को डोमेस्टिक क्रिकेट में डेब्यू करने वाले ऑलराउंडर मंगेश की अब किस्मत खुल गई। उन्हें रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु यानी आरसीबी ने 5.20 करोड़ रुपए में खरीदा। आईपीएल 2026 के ऑक्शन में उनकी 30 लाख बेस प्राइस से साढ़े 17 गुना ज्यादा की बोली लगी।

23 साल के ऑलराउंडर मंगेश मध्य प्रदेश के लिए घरेलू क्रिकेट खेलते हैं। ऑक्शन के दूसरे दिन  की टीम सुबह गांव पहुंची। उनके माता-पिता और कोच से बात कर करियर के बारे में जाना।

कमरा इतना छोटा कि कुर्सी रखने तक की जगह नहीं करीब 9 बजे। बस स्टैंड पर चाय की दुकान पर एक शख्स से पूछा– मंगेश का घर कहां है?

मेरी बात सुनते ही दो लड़के बोले– वो तो हमारा दोस्त है। चलिए, आपको उसके घर लेकर चलते हैं। बस स्टैंड से मंगेश का घर करीब आधा किलोमीटर दूर है। मैं उनके साथ आगे बढ़ा। दोस्त मंगेश की तारीफ करते जा रहे थे। मैं उनकी एक-एक बात ध्यान से सुन रहा था।

करीब 15 मिनट में मंगेश के घर के पास पहुंच गए। यहां एक गली का नाम बजरंग गली है। गली इतनी संकरी और गंदगी भरी है कि एक ही आदमी या तो आ सकता है या जा सकता है। इसी गली में एक मकान में मंगेश का परिवार 1200 रुपए महीने में किराए से रहता है। घर के सामने बहुत सारे जूते-चप्पल रखे हैं। मैं समझ गया कि लोग सुबह से ही बधाई देने आ रहे होंगे।

दोस्त मुझे घर के अंदर लेकर गए। देखकर हैरानी हुई कि इसे मकान कहें या एक कमरा। एक छोटे से कमरे के बगल में छोटी सी कोठरी है। इसी में किचन बना है। इस छोटे से कमरे में ही मंगेश, उसके माता-पिता और तीन बहनें रहती हैं। कमरा इतना छोटा कि कुर्सी रखने तक की जगह नहीं है। कमरे में एक तरफ दीवान रखा है।

इसी संकरी गली में मंगेश यादव का घर है। इतनी छोटी कि इसमें से एक शख्स ही गुजर सकता है।

दीवार पर मेडल, अलमारी में ट्रॉफियां मंगेश की बहनों ने कमरे को सजाया हुआ है। दीवार पर बेल-बूटों की पेंटिंग की है। एक खास बात और नजर आई कमरे में अलमारी हो या टेंट हर जगह ट्रॉफियां ही नजर आ रही हैं। दीवार पर मेडल टंगे हैं। कमरे में आसपास के रहने वाले पांच–छह लोग मौजूद हैं। इतने में लगता है, जैसे भीड़ लगी हो।

घर के हालात शूट कर रहा था। इतने में किचन में गैस पर रखी बड़ी सी तपेली यानी भगोनी पर नजर पड़ी। उसमें चाय बनी थी। मैं समझ गया कि जो भी आ रहा है, ठंड के मौसम में उसे चाय जरूर पिलाई जा रही है। कई लोग मिठाई भी लेकर आए। घर के अंदर इतनी भीड़ है कि समझ नहीं पा रहा कि मंगेश के माता-पिता से बात कैसे करूं। इतने में पड़ोसी फिर मिठाई लेकर आए। उन्होंने माता-पिता को डिब्बा देते हुए कहा-आप दोनों एक–दूसरे को मिठाई खिलाएं। सब आपके धैर्य और मेहनत का फल है। इतना सुनते ही दोनों ने एक-दूसरे का मुंह मीठा कराया।

घर के कमरे में बहनें और मां ने मंगेश की ट्रॉफियां अलमारी में सजा रखी हैं।

पिता बोले- मंगेश फोन पर रो रहा था पिता राम अवध यादव से पूछा कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं। यह सुनते ही उनका गला रुंध सा गया। कहने लगे- वो अभी पुणे में है। मंगलवार की रात करीब साढ़े नौ बजे उसका फोन आया था। रो रहा था, उसकी तो आवाज ही नहीं निकल रही थी। उसे सुनकर हमारा भी दिल भर आया। मैंने उसकी मां को फोन दे दिया। फोन स्पीकर पर था। उसने कहा- मैं सिकेल्ट हो गया हूं। चलो, उसका सपना पूरा हो गया।

अवधजी मूलत: उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यहां प्राइवेट फैक्ट्री का ट्रक चलाते हैं। वह कहते हैं 22 साल से ड्राइवरी कर रहा हूं। एक हजार रुपए से नौकरी की शुरुआत की थी। आज भी 10 हजार मिलते हैं। अगर, ट्रक लेकर कहीं बाहर गया, तो भत्ता मिल जाता है, नहीं गए तो नहीं मिलता। इस मकान का किराया ही 1200 रुपए महीना है। 300-400 रुपए बिजली में चला जाता है। मैं चाहता था कि बच्चे ठीक तरह से पढ़ जाएं और नौकरी करें। हैसियत न होते हुए भी उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया। लेकिन, उसकी रुचि तो पढ़ाई से ज्यादा खेलने में थी। हमने उससे ये जरूर कहा कि खेलना, लेकिन पढ़ाई भी होनी चाहिए। मंगेश 12वीं तक पढ़ा है। इसके बाद पढ़ाई छोड़ दी।

हमने कहा- अब तो बेटा करोड़पति बन गया है। क्या सोचा है, नया मकान बनवाएंगे क्या? पिता कहते हैं कि नहीं हमें कुछ नहीं चाहिए। बस, इतना चाहते हैं कि वो खेले। वो एक बार भारतीय टीम में खेले तब जाकर सपना पूरा होगा।

मंगेश के पिता राम अवध यादव पेशे से ड्राइवर हैं। मां रीता यादव हाउस वाइफ हैं।

मां बोलीं- स्कूल फीस तक जमा नहीं कर पाते थे मां रीता यादव ने बताया कि पहले मुझे मिठाई खिलाई। उनसे पूछा खुश तो हैं न आप?

रीता यादव कहती हैं, रातभर नींद नहीं आई। उसका बचपन याद आता रहा। इसी गांव में 10 अक्टूबर 2002 में उसका जन्म हुआ था। कितनी परेशानी में पाला है उसे। हमारे घर के हालत तो कभी ठीक ही नहीं रहे। पैसों की कमी तो हमेशा से बनी रही। बड़ी मुश्किल से उसका एडमिशन प्राइवेट स्कूल में कराया था, लेकिन फीस छह-छह महीने नहीं भर पाते थे। मंगेश के पापा तो गाड़ी चलाते, थोड़ी बहुत बचत करके जैसे-तैसे फीस जमा कर देते थे। घर चलाना है, तीन बेटियां हैं हम ही जानते हैं हमारा गुजर-बसर कैसे होता है। मंगेश को जैसे-तैसे गांव में 12वीं तक पढ़ाया। उसके बाद वो क्रिकेट खेलने नोएडा चला गया।

कमरे से लगी हुई छोटी सी किचन है। इसी में घर का अन्य सामान रखा है।

गिफ्ट प्राइज ग्राउंड कर्मियों को देता था मंगेश के कोच उत्सव बैरागी ने बताया कि मंगेश बाएं हाथ का गेंदबाज के साथ ऑलराउंडर क्रिकेटर है। वो नोएडा जाने से पहले हर दिन प्रैक्टिस के लिए बोरगांव से 70 किमी दूर छिंदवाड़ा आता-जाता था।

मंगेश की खास बात यह थी कि उसे जब टूर्नामेंट में प्राइज मिलते थे, तो वो उन्हें ग्राउंड कर्मचारियों को दे देता था। केवल वह ट्रॉफी लेकर घर जाता था। 2022 में छिंदवाड़ा में सांसद कप में भारतीय क्रिकेटर यूसुफ पठान, पूर्व सीएम कमलनाथ और तत्कालीन सांसद नकुल नाथ ने उसे रेसर साइकिल दी। साइकिल को भी मंगेश ग्राउंड में काम करने वाले कर्मचारी को दे दी।

मंगेश का कहना था कि ग्राउंड को सुरक्षित रखने का काम कर्मचारी करते हैं, इसलिए उनकी मेहनत सबसे बड़ी है।

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