गाँधी जी की प्रासंगिकता

       

साफ़ माथे की पोथी

गाँधी जयंती की पूर्व-संध्या पर अपनी इस- किंचित प्रतीक्षित- पुस्तक को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए मुझे संतोष हो रहा है।

“गाँधी की सुंदरता” यानी क्या? वैसा इसलिए क्योंकि गाँधी जी सुंदर थे, उनका जीवन बहुत सुंदर था। खादी उसी सुंदरता का आभरण है। कुबेरनाथ राय ने गाँधी जी के यहां शीलदृष्टि के साथ ही रसदृष्टि भी पाई है। उन्होंने कहा है कि रबींद्रनाथ के यहां विदग्ध सुंदरता की तृषा है, किंतु गाँधी जी के यहां जो सरल है, प्रशान्त है, वही सुंदर है। मैं कहता हूं, गाँधी-तत्व के मृदुल सौंदर्य को समझने में थोड़ा समय लगता है, किंतु एक बार इसे जानने के बाद और कुछ रुचिकर नहीं लगता। रबींद्रनाथ सुंदरता के उपासक थे, गाँधी सत्य के। तब गाँधी के यहाँ सुंदरता का शोध करना एक ऐसा काव्य-न्याय है, जिसकी ओर मैं देखता हूं, अभी बहुतेरे नहीं गए हैं। एक लेखक के लिए नए पथ का अन्वेष भी कम रोमांचक नहीं होता।

पुस्तक का उपशीर्षक कहता है- “महात्मा में मानुष की खोज”। इसका क्या अर्थ हुआ? मैं कहूंगा सत्यनिष्ठा में सुंदरता को देखना ही प्रकारांतर से महात्मा में मानुष को देखना बन जाता है। गाँधी जी कभी भी एक मानुष से कम नहीं हो सकते थे, साथ ही वो कभी भी एक मानुष से अधिक भी नहीं थे। वो एक मनुष्य होने की गरिमा, सुंदरता, वेदना और महत्ता को पूरी तरह जीते थे। यही वो चीज़ है, जो महात्मा के मानुष-बिम्ब को हमारे सामने प्रकट करती है। और हमें यह प्रेरणा देती है कि एक दुर्बल-सी देह में भी विराट संकल्प रूपायित हो सकता है। हम जैसे हैं, हमेशा उससे बड़े बनने का यत्न कर सकते हैं।

बहुतेरे मित्र पूछेंगे, गाँधीजी पर हज़ारों पुस्तकें हैं, तब यह एक और क्यों? मैं कहूंगा, वैसा इसलिए क्योंकि गाँधी जी पर एक नई और ताज़गीभरी समझ हमारे समय की ज़रूरत बन गई है। क्योंकि गाँधी जी को लेकर हमारी भावना अहर्निश दुष्प्रचार से भोथरी हो गई है। हमारे सामने परिप्रेक्ष्य गड्डमड्ड हो चुके हैं। आज सोशल मीडिया ऐसे करोड़ों लोगों से भरा पड़ा है, जो गाँधी के बारे में अधिकार से निर्णय सुनाते हैं, जबकि उन्होंने गाँधी का लिखा कुछ नहीं पढ़ा, ना ही उनके जीवन और उनके समय को जाना और समझा है। इंटरनेट पर सस्ता प्रोपगंडा ही अब सत्य का प्रतिरूप मान लिया गया है। मैं अपनी इस पुस्तक के माध्यम से इस प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिकार करना चाहता हूं। मैंने बहुत तीव्रता से यह अनुभव किया है कि गाँधी जी को लेकर एक नया, समकालीन और सुसंगत नैरेटिव बुनना आज देश के लिए बहुत ज़रूरी हो गया है। मैं देश के युवाओं, विशेषकर छात्रों से आग्रह करूंगा कि वो एक सौ साठ पन्नों की इस छोटी-सी पुस्तिका को पढ़कर गाँधी जी और उनके जीवन-मूल्यों को सिलसिलेवार तरीक़े से जानें और स्वराज्य, सत्याग्रह और सर्वोदय जैसे प्रतिमानों के बारे में एक उजली, कुशाग्र और प्रबुद्ध समझ बनाएं। यह गाँधी-विचार में प्रवेश की प्राथमिकी भी है। यह गाँधीजी के अनेक आयामों पर यथेष्ट गम्भीरता, प्रामाणिकता और सुस्पष्टता से व्याख्यान करती है और हमारे सामने उनके उचित परिप्रेक्ष्यों को प्रकट करती है। इस छोटी-सी पुस्तक में गाँधी को समझने की सिलसिलेवार कुंजियाँ निहित हैं।

साथ ही यह स्पष्ट करूं कि पुस्तक का स्वर रचनात्मक है। गाँधीवादी चिंतक अनुपम मिश्र अकसर साफ़ माथे के समाज की बात करते थे। मैं कहूंगा यह पुस्तक साफ़ माथे की पोथी है। यह गाँधी जी के माध्यम से किसी को सिद्ध-असिद्ध करने का यत्न नहीं करती। देखता हूं, बहुतेरे मित्र गाँधी जी को सामने रखकर अपनी उद्देश्यपूर्ति करते हैं और दाख़िल-ख़ारिज की नीति को आगे बढ़ाते हैं। जबकि मेरा स्पष्ट मत अब बन गया है कि वाम-दक्षिण की नूराकुश्ती में फंस चुकी भारतीय चेतना की मुक्ति गाँधीमार्ग में ही है, जो कि इन दोनों मार्गों से श्रेष्ठ, उदात्त, सम्यक् और पवित्र है। वास्तव में, आज गाँधीजी पहले से और प्रासंगिक हो गए हैं। आधुनिक मनुष्य की बहुतेरी समस्याओं के केंद्र में तमस, अधीरता और विक्षोभ है, और गाँधीजी की अहिंसक जीवनशैली के पास इनमें से बहुतेरी समस्याओं के उत्तर हैं।

मनुष्यता के सम्मुख मुंहबाए खड़े संक्रांति-काल में यह पुस्तक आ रही है। यह तभी यशस्वी होगी, जब इसमें निहित का हम साक्षात् कर सकेंगे और अपने जीवन को पहले से अधिक स्वस्तिकर बना सकेंगे। मैं इसकी सफलता की मंगलकामना करता हूं, क्योंकि यह प्रकारान्तर से गाँधी-तत्व की व्याप्ति का प्रयोजन होगी, और वही इसके लेखक के समस्त उद्यमों का सार है। महत्व मेरा नहीं, महात्माजी के पुण्य का ही है। मैं केवल उसका एक विनम्र प्रवक्ता भर हूँ।

गाँधी जी को बांचना, उन्हें सुनना-गुनना, उन पर विचार करके लिखना एक अर्थ में एक ऋषि-ऋण से मुक्त होना है। मुझसे जितना हो सका, मैंने किया है। पुस्तक लोकार्पित हो रही है, अब इस बात को आगे लेकर जाना लोक का दैव-दायित्व है। शुभमस्तु।

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