
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार में मंत्री पद नहीं मिलने पर गोपाल भार्गव का दर्द छलका है। उन्होंने कहा, ‘मंत्री-मुख्यमंत्री बनना मेरे हाथ में नहीं है। इसका निश्चित फॉर्मूला अब तक पता नहीं चला। सीनियरिटी के बलबूते उम्मीद थी कि फिर अवसर मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव सागर जिले की रहली विधानसभा क्षेत्र से नौवीं बार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। वे प्रदेश में सबसे सीनियर विधायक हैं। सीएम पद के दावेदार भी माने जा रहे थे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के फॉर्मूले ने उन्हें आउट कर दिया। सीएम क्या, मंत्री पद तक नहीं मिला। वे 2003 से लगातार मंत्री रहे हैं। कमलनाथ सरकार में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। गोपाल भार्गव से बात की तो उन्होंने क्या जवाब दिए, पढ़िए…
सवाल: मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ है। क्या कहना है?
भार्गवः शानदार मंत्रिमंडल है। सभी मंत्री साथी जो सीनियर हैं, वह तो अनुभवी हैं ही, जो नए मंत्री बने हैं या अपेक्षाकृत कनिष्ठ हैं, वह भी जल्द ही सरकार की कार्यपद्धति सीख जाएंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि बेहतर काम करेंगे। हम लोग मंत्री परिषद में नहीं हैं, लेकिन राज्य के हित में काम करेंगे।
सवाल: आप सबसे सीनियर हैं। क्या कारण रहे कि आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया?
भार्गवः कारण मैं नहीं बता सकता। यह तो पार्टी तय करती है। पार्टी नेतृत्व ने जो ठीक समझा, वह किया है। इसके बारे में क्या फॉर्मूला था, क्या विषय था, मैं अपनी तरफ से कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। हमारा नेतृत्व ही मंत्री परिषद में नाम तय करता है।
सवाल: आप मुख्यमंत्री नहीं बने, मंत्री नहीं बने, कहां चूक हो गई?
भार्गवः मुझसे चूक नहीं हुई और न पार्टी से चूक हुई है। मेरी जिम्मेदारी सिर्फ विधायक बनने तक थी। लोगों के वोट लेने तक की थी। पार्टी ने टिकट दिया, तो मेरा प्रयास था कि कैसे अच्छे से अच्छे वोटों से चुनाव जीतूं, यह तो मेरे हाथ में हो सकता है। मंत्री बनना, मुख्यमंत्री बनना यह मेरे हाथ में नहीं हो सकता। इसका निश्चित फॉर्मूला आज तक पता नहीं चला। मैं कुछ कह भी नहीं सकता।
गोपाल भार्गव की चुनावी यात्रा
■ 1984
पहली बार रहली विधानसभा से विधायक बने। तब से लगातार नौ बार चुने गए।
■ 2003
भाजपा सरकार में पहली बार मंत्री बने। तब से लगातार मंत्री रहे हैं।
■ 2018
कांग्रेस की सरकार में नेता प्रतिपक्ष बने।
सवाल: प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री का दावेदार बताया जा रहा था लेकिन मंत्री भी नहीं बनाया, जनता निराश है?
भार्गवः दो लाख वोटर हों, पौने दो लाख वोट डले हों और 73 हजार वोटों से चुनाव जीता हो तो इसका अर्थ है कि लोगों की इच्छा थी कि हम बड़े पद पर पहुंचें, लेकिन किसी कारण से संभव नहीं हो पाया। स्वभाविक रूप से कोई विधायक रहता है, तो उस विधायक के क्षेत्र की जनता सोचती है कि वह मंत्री बने। मंत्री रहते हैं तो सोचते हैं कि वह आगे बढ़कर उपमुख्यमंत्री या मुख्यमंत्री बनें।
लेकिन कभी-कभी जो सोचते हैं, वह संभव नहीं हो पाता। हम राजनीतिक लोग हैं। राजनीतिक लोग हर बात के लिए तैयार रहते हैं। जैसे- सीमा का सैनिक तैयार होता है हर घटना के लिए, ऐसे ही मेरे जैसे राजनीतिक लोग होते हैं। जिन्होंने जिंदगी का दो तिहाई समय राजनीति में निकाला है। हम लोग तो राजनीति के प्लेयर हैं। जनता जरूर इच्छा करती है। पार्टी ने इतना कुछ किया है, इतना दिया है।
सवाल: क्या पहले से पता था कि आपका नाम मंत्रिमंडल में शामिल नहीं है?
भार्गवः मुझे लग रहा था कि सबसे वरिष्ठ विधायक हूं। भारी बहुमत से नौवां चुनाव जीता। तमाम एंटी इनकम्बेंसी को झुठलाते हुए जीता। इतने वर्षों का सरकार में रहने व विभिन्न विभागों को चलाने का अनुभव था। नेता प्रतिपक्ष भी रहा। इस कारण स्वभाविक रूप से लगता है कि हो सकता है पार्टी पुनः अवसर दे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ये तय करता है कि अन्य लोगों को भी अवसर देना चाहिए, तो उनको मिला।
सवाल: संगठन में पद मिलने की बात है या फिर लोकसभा चुनाव में जिम्मेदारी?
भार्गवः पार्टी जो कुछ काम देगी, वह करेंगे। लोकसभा चुनाव में पार्टी से मिलने वाली जिम्मेदारी को निभाउंगा। शुरू से काम करते आए हैं। जब देश में भाजपा के दो सांसद थे, तब भी हमने प्रचार किया। जब भी गांव जाते थे तो लोग ताने देते थे कि ये आ गए भाजपाई, जनसंघी। तब भी काम किया। आज दो से बढ़कर 302 हैं, तब भी हम प्रचार करते हैं।
अब भार्गव के वो बयान पढ़िए, जिसमें उन्होंने मंत्री और सीएम बनने की इच्छा जताई



