मप्र की सड़कों पर 21 साल बाद एक बार फिर सरकारी बसें चलने वाली है। सरकार ने इसे ‘जनबस’ नाम दिया है। राज्य परिवहन निगम की जगह सरकार ने यात्री परिवहन एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी बनाई है जो 25 जिलों में बसों का संचालन करेगी।
18 नवंबर को कंपनी के संचालक मंडल की बैठक में 6 हजार से ज्यादा रूट को मंजूरी दी गई है। इन रूट पर 10 हजार 879 बसें दौड़ेंगी। इस सेंट्रलाइज्ड सिस्टम की शुरुआत अप्रैल 2026 से आर्थिक राजधानी इंदौर से की जाएगी।
इसके बाद सिलसिलेवार तरीके से बाकी जिलों में भी बसें चलना शुरू होंगी। अप्रैल 2027 तक सभी संभाग और जिलों में यह नी व्यवस्था लागू होगी। ये व्यवस्था न केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहेगी, बल्कि इसका मुख्य फोकस ग्रामीण, दूर दराज के इलाके और आदिवासी एरिया को जिला मुख्यालयों और बड़े शहरों से जोड़ना है। सरकार पूरी व्यवस्था की मॉनिटरिंग करेगी और निजी ऑपरेशन बसों का संचालन करेंगे।

कैसी होगी नई व्यवस्था और प्रबंधन? मुख्यमंत्री मोहन यादव की अध्यक्षता में 18 नवंबर को हुई कंपनी की बैठक में इस योजना की रूपरेखा तय की गई। इसके तहत स्टेट ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी के अधीन 7 सरकारी कंपनियां प्रदेश की परिवहन व्यवस्था का जिम्मा संभालेंगी। ये वही कंपनियां हैं जो वर्तमान में विभिन्न शहरों में लोकल सिटी बसों का संचालन कर रही हैं।
नई व्यवस्था में इन्हें ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ एक जिले से दूसरे जिले के बीच बस ऑपरेट करने का जिम्मा भी सौंपा जाएगा। बसों का रूट निर्धारण सरकार ने अपने स्तर पर किया गया है, लेकिन उनका संचालन निजी ऑपरेटरों के माध्यम से होगा। सरकार और प्राइवेट ऑपरेटरों के बीच एक कॉन्ट्रैक्ट होगा, जिससे पूरी व्यवस्था सरकार की निगरानी में रहेगी

7 क्षेत्रीय कंपनियों को मिलेगा किराया तय करने का अधिकार इस नई प्रणाली में मौजूदा शहरी बस कंपनियों को अपने-अपने संभागों में बसों के संचालन का अधिकार दिया गया है। ये कंपनियां ही यात्री किराया भी तय करेंगी, जिससे स्थानीय जरूरतों के अनुसार दरों का निर्धारण हो सकेगा।इन कंपनियों को प्रारंभिक तौर पर सरकार की ओर से 1-1 करोड़ रुपए की राशि दी जाएगी।
प्रशासनिक ढांचा और निगरानी नई व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए एक त्रि-स्तरीय मॉनिटरिंग सिस्टम बनाया गया है।
- अध्यक्ष:राज्य सरकार द्वारा कंपनी का अध्यक्ष नियुक्त किया जाएगा।
- डायरेक्टर:संभागीय मुख्यालय स्थित कंपनी का डायरेक्टर उस जिले के कलेक्टर या विकास प्राधिकरण के सीईओ को बनाया जाएगा।
- कार्यकारी संचालक:कंपनी मुख्यालय के नगर निगम आयुक्त या विकास प्राधिकरण के सीईओ कार्यकारी संचालक की भूमिका निभाएंगे।
- संचालक मंडल:जिलों के लोक निर्माण विभाग और ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग के मुख्य अभियंता भी संचालक मंडल में शामिल रहेंगे।
इसके अलावा, हर जिले में एक सलाहकार समिति होगी, जिसमें जिले के प्रभारी मंत्री, कलेक्टर और अन्य जनप्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति समय-समय पर होल्डिंग कंपनी को अपनी सलाह देगी और बस संचालकों के हितों का भी ध्यान रखेगी।

यात्रियों और ऑपरेटरों के लिए क्या है खास?
- ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों पर फोकस: जनबस के जरिए उन दूरदराज इलाकों तक बसें पहुंचाई जाएंगी, जहां अब तक परिवहन एक बड़ी चुनौती थी।
- तकनीक का उपयोग: यात्रियों और बस ऑपरेटर्स के लिए एक डेडिकेटेड मोबाइल ऐप विकसित किया जाएगा। वहीं, कंपनियों की मॉनिटरिंग के लिए एक सेंट्रलाइज्ड डेशबोर्ड भी होगा।
- कार्गो सुविधा: बसों का उपयोग सिर्फ सवारी ढोने के लिए नहीं, बल्कि माल परिवहन (कार्गो) के लिए भी किया जाएगा, जिससे ऑपरेटरों की आय बढ़ेगी।
- बुनियादी ढांचा: हर जिले में आधुनिक बस स्टैंड, बस डिपो और बस स्टॉप बनाए जाएंगे। यह काम सरकार और निजी कंपनियां मिलकर करेंगी।
- परमिट में प्राथमिकता: नई योजना के तहत अनुबंधित बसों को परमिट देने में प्राथमिकता दी जाएगी, जबकि बसों पर प्रभावी नियंत्रण सरकार का ही रहेगा।

ई-बसों का संचालन भी कंपनियां करेंगी इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ई-बसों का संचालन है। केंद्र सरकार की नेशनल ई-बस स्कीम के तहत देश के 88 शहरों में साढ़े छह हजार से ज्यादा ई-बसें चलाई जानी हैं, जिनमें से 582 बसें मध्य प्रदेश को मिली हैं। इन बसों का संचालन भी इन्हीं क्षेत्रीय कंपनियों के अधीन होगा।
इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, उज्जैन और सागर में 472 मिडी ई-बस (26 सीटर) और 110 मिनी ई-बस (21 सीटर) चलाई जाएंगी। ई-बसों का किराया मौजूदा सिटी बसों से काफी कम होगा, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ घटेगा।

केंद्र सरकार करेगी फंडिंग ई-बसों को चलाने और उनके रखरखाव का जिम्मा “ग्रीन सेल मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड” कंपनी को सौंपा गया है। केंद्र सरकार इसके लिए 12 साल तक ऑपरेशनल एंड मेंटेनेंस कॉस्ट भी प्रदान करेगी, जिससे राज्य सरकार पर वित्तीय बोझ कम होगा।
साथ ही ई-बसों के लिए 58 करोड़ रुपए की लागत से डिपो का निर्माण किया जाएगा। इसमें 60% राशि (लगभग 34 करोड़) केंद्र सरकार देगी और 40% (लगभग 24 करोड़) राज्य सरकार वहन करेगी।
